कांग्रेस यूपी में कमजोर रही है। 1989 में जनता दल से हारने के बाद कांग्रेस की यूपी में सरकार नहीं बनी है। यद्यपि दिल्ली में सरकारें रहीं, लेकिन यूपी में जातीय राजनीतिक ध्रुवीकरण के चलते कांग्रेस की जमीन खो गई। इसके साथ ही यूपी में कुशल और संघर्षशील नेतृत्व के अभाव से भी कांग्रेस जमीन पर नहीं खड़ी हो पाई। यहां तक कि खुद कांग्रेस के बड़े सुविधा भोगी नेताओं ने विपक्षी दलों के नेताओं से दुरभि संधि कर कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डाला। यह स्थिति कांग्रेस पर दक्षिण भारतीय वर्चस्व को बनाये रखने के लिये भी उपयुक्त थी, जिसने कांग्रेस को लंबे समय तक पनपने से रोके रखा।

राहुल जी के सक्रिय होने के बाद उनको स्वीकारने में देश ने वक्त लिया, लेकिन वे जूझते रहे और अब आकर जहां उन्होंने लंबे संघर्ष के बाद अपनी स्वीकार्यता स्थापित की। वहीं देश ने भी उनको ध्यान से सुनना शुरू कर दिया है। ऐसे में श्रीमती प्रियंका गांधी जी ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश लिया है।

लेकिन श्रीमती प्रियंका जी ने कठिन और संघर्ष का रास्ता चुना है। AICC महासचिव पर नियुक्त किये जाने के बाद उन्हें छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश या राजस्थान का प्रभारी नहीं बनाया गया है, जहां पर कांग्रेस की सरकारें हैं और वहां उन्हें काम करने में सहूलियत होती, बल्कि उन्हें पूर्वी यूपी का प्रभारी बनाया गया है, जिस प्रदेश में कांग्रेस के मात्र सात विधायक और दो सांसद हैं। उनके रास्ते में कोई फूल नहीं बिछे हैं उन्होंने कांटों का ताज पहना है।

मेरी शुभकामनाएं हैं, पूरे समर्पण भाव से कांग्रेस के लिये श्रीमती प्रियंका गांधी जी, श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जी एवं श्री राहुल जी के नेतृत्व में अपना बेहतर से बेहतर योगदान मैं देने का प्रयास करूंगा और आशा करूंगा कि सभी कांग्रेस के साथी, सहयोगी एवं समर्थक भी ऐसा ही करेंगे।

पीयूष रंजन यादव

सदस्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी

पूर्व जिलाध्यक्ष जिला कांग्रेस कमेटी सम्भल

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