शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

प्रेमचंद वैचारिक प्रतिबद्धता के लेखक थे। उनका लेखन समाज में व्याप्त रूढ़ियों और दोगलेपन की धज्जियां आज भी उड़ता है। वह स्वस्थ प्रगतिशील थे, आज के बौद्धिक बीमार लेखकों को उनसे सीखना चाहिए।

प्रेमचंद का लेखन पुरस्कारों या तमगों का मोहताज नहीं था, उन्होंने अपने लेखन के लिए सजाएँ पाईं, उनकी किताबें जप्त हुईं, उन्हें जुर्माने झेलने पड़े। वह मनुष्यता के पक्षधर एक सच्चे लेखक थे। उन्हें भारत की जनता ने अपना लेखक माना। हिंदी में यह लोकप्रियता दूसरे लेखक हो नहीं मिली।

आज के साहित्यिक को इस पर विचार करना चाहिए। वह सतत विचारशील लेखक थे। उन्होंने साहित्य का मायर बदला था।

वह लिखते हैं-

“हम साहित्‍य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्‍तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्‍य खरा उतरेगा, जिसमें उच्‍च चिन्‍तन हो, स्‍वाधीनता का भाव हो, सौन्‍दर्य का सार हो, सृजन की आत्‍मा हो, जीवन की सच्‍चाइयों का प्रकाश हो— जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं, क्‍योंकि अब और ज्‍यादा सोना मृत्‍यु का लक्षण है।”

आज जब हम प्रेमचंद की जयंती मना रहे हैं तो इस पर विचार होना चाहिए कि आज का हमारा साहित्य इस कसौटी पर कितना खरा उतरता है। आज ज्यादातर साहित्यकार मठाधीशी शिकार हैं, जनता पर लिखना उनकी मजबूरी है, वह साहित्यिक गठजोड़ की राजनीति करते नजर आते हैं।

पुरस्कारों के लिए दिन-रात ठेकेदारों के तलवे सहलाते हैं। वह जानते हैं लेखक की यश और कीर्ति का आधार तमगे हैं जो सत्ता के दलालों से यारी कर के हासिल किए जा सकते हैं। दरअसल आज के ज़्यादातर लेखक दलालों की चाटुकारिता कर चरण वंदना करने में व्यस्त हैं उन्हें असल में जनता के सुख-दुखों की रत्ती भर भी परवाह नहीं। देश भर में प्रेमचंद की जयंती धूमधाम से मनाई गई।

शैलेन्द्र कुमार शुक्लहिंदी के मास्टर चित्र पर माल्यार्पण कर रहे हैं और साहित्यिक जन लड्डू खा रहे हैं। प्रेमचंद की दो चार कहानियों के नाम जो वह जानते हैं ज़ोर-शोर से ले रहे हैं और ‘गोदान’ और ‘कफन’ ‘गबन’ कर रहे हैं। उनको प्रेमचंद के विचारों से कोई लेना-देना नहीं। वह एक बार भी अपने मन में नहीं सोचते आखिर यह सब उन्होंने क्यों लिखा और लिखते हुये इतने संघर्ष क्यों झेले। उनके लिए प्रेमचंद नहीं उनकी जयंती काम की चीज है।

विश्वविद्यालय स्तर पर प्रेमचंद सेमिनार करने के सबसे सहज साधन हैं। उन पर अटकल-पच्चू लिख कर शोध-आलेख बहुत जल्दी तैयार हो जाता है। एपीआई बढ़ाने में प्रेमचंद बड़े काम की चीज हैं। गोदान और कफन पर रट्टा मारू विद्वान घंटा भर बोलने की आदत डाल चुके हैं। मतलब यहाँ भी प्रेमचंद कमाई का ही साधन बन कर रह गए हैं। उनकी विचारधार पर बहस करना और आज के साहित्य को उस कसौटी पर कसना उनके लिए बेमतलब की चीजें हैं।

आज प्रेमचंद को समझना कुछ सचेतकों कि ज़िम्मेदारी है। अगर हम उन्हें एक प्रगतिशील परंपरा में खड़ा कर देखें और मूल्यांकन करे तो आज के समाज के हिंदी लेखकों, साहित्यिकों, मास्टरों को हम कहाँ पाते हैं, यह सोचने समझने का जरूरी तथ्य है।

Premchand's writings not obedient to badges