फर्जी खतरा धर्म पर
फर्जी खतरा धर्म पर
इमरान रिज़वी
संसार भर में पाए जाने वाले सब धर्मों में अगर सबसे ज्यादा खतरे में कोई धर्म हैं तो वो इस्लाम और हिंदुत्व हैं। ये कभी एक लाउडस्पीकर के बजने या उतरने से खतरे में लड़ जाते हैं, कभी दो प्यार करने वालों के प्यार या शादी से इन्हें खतरा पैदा हो जाता है तो कभी-कभी तो एक दूसरे को छू लेने से भी इन्हें खतरे में पड़ते पाया जा सकता है। ये खतरा विशेषकर चुनावों के समय ज्यादा संभावित रहता है, विशेषकर वोटिंग की एक रात पहले गावों देहातों में इस्लाम खतरे में आ जाता है और उलेमा कौंसिल का नाकारा प्रत्याशी 46 हज़ार वोट पा जाता है, तो कहीं किसी कथित नीच जात मान लिए गए अपने जैसे हाड़ मांस के इंसान द्वारा गाँव के कुँए से पानी भर लेने के कारण धर्म को संकट उत्पन्न हो जाता है। ये संकट उन दलितों की जी भर पिटाई या अपमान से शीघ्र दूर होते भी देखे जा सकते हैं। उस पर दोनों के तुर्रे ये कि इनके धर्म विशुद्ध रूप से ईश्वरीय धर्म हैं, जहाँ एक की नज़र में धर्म केवल इस्लाम का नाम है उससे इतर कहीं धर्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती, वहीँ दूसरा अपने धर्म के सनातन होने का दावा ठोंकता है। ये कोई नहीं सोचता कि अगर तुम्हारा धर्म या मज़हब सच्चा है तो फिर इसे किसी छोटी या बड़ी बात से खतरा क्यों पैदा हो जाता है,और अगर खतरे वाली बात में कोई दम है तो फिर अपने अपने धर्म को डायरेक्ट एकमात्र रजिस्टर्ड खुदा/ईश्वर का धर्म होने का दावा छोड़ दो....
तुम्हारे धर्मों को खतरा हो या ना हो मेरी बला से लेकिन तुम लोगों की इन नादानियों की वजह से इंसानियत पर अकसर संकट आते रहते हैं, कभी खून खराबे की शक्ल में तो कभी सालों पुराने समय से साथ रह रहे दो पड़ोसियों के आपसी संबंधों की बलि के रूप में। ये दोनों अपने ही देश में रह रहे अन्य धर्मावलम्बियों को देख कर सीख भी नहीं लेते। भारत में और भारत के अलावा देशों में अन्य धर्म के करोड़ों लोग मज़े में रह रहे हैं, उन्हें कभी अपने धर्म पर खतरा नज़र नहीं आता। अपने बच्चों को बेहतरीन तालीम देते हैं, और खुद अपनी मेहनत और काबिलियत से बड़े बड़े एम्पायर खड़े करते हैं। मुट्ठी भर यहूदियों को ही देख लें। अपनी तमाम बुराइयों के बावजूद आज अपनी शिक्षा और योग्यता के दम पर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था पर उनका क़ब्ज़ा है, लेकिन ये दोनों आपस में लड़कर ही खुश है, कहीं मसलकों के नाम पर मुस्लिम मुस्लिम से तो कहीं जाति के नाम पर हिन्दू-हिन्दू से भिड़ा हुआ है। जहां ये दोनों फैक्टर प्रभावी नहीं है वहां ये दोनों आपस में ही सर फुटव्वल मचाये हुए हैं, अगर यही सब चलता रहा तो सभ्य संसार में कहाँ ठहर पाएंगे हम ?


