फेल छात्र नहीं, शिक्षक और संस्थान होते हैं
फेल छात्र नहीं, शिक्षक और संस्थान होते हैं
दिल्ली विश्वविद्यालय: पतन की पड़ताल भाग-1
डॉ. प्रेम सिंह
संकट में संस्थान
दिल्ली विश्वविद्यालय भारत के बड़े और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक है। इसकी स्थापना 1922 में हुई थी। स्थापना के वक्त इसके तहत केवल तीन कॉलेज - सेंट स्टीफेंस कॉलेज (स्थापना 1881), हिंदू कॉलेज (स्थापना 1899) और रामजस कॉलेज (स्थापना 1917 ), दो संकाय - कला और विज्ञान - तथा 750 छात्र थे। तब से अब तक दिविवि ने लंबी यात्रा तय करते हुए देश के अग्रणी विश्वविद्यालय का मुकाम हासिल किया है। आज दिविवि के तहत करीब 80 कॉलेज, 16 संकाय, 86 विभाग हैं, जिनमें करीब डेढ़ लाख नियमित छात्र स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई करते हैं। दिविवि स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग (एसओल), जिसे पहले स्कूल ऑफ कोरेसपोंडेस कहा जाता था, के माध्यम से करीब तीन लाख छात्रों को पत्राचार से स्नातक और स्नाताकोत्तर की शिक्षा प्रदान करता है। अनौपचारिक शिक्षा ग्रहण करने वाले इन सब छात्रों के लिए पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराए जाने के अलावा अध्यापन की भी व्यवस्था है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यह अकेला विश्वविद्यालय है जो अपने पाठ्यक्रम, अध्यापन और परीक्षा की गुणवत्ता के चलते पूरे देश के छात्रों के आकर्षण का केंद्र है। दिविवि से स्नातक करना सम्मान की बात मानी जाती है और यहां से हासिल की गई डिग्री की देश-विदेश में सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा है।
पिछले कुछ सालों से दिल्ली विश्वविद्यालय दोहरे संकट का सामना कर रहा है। पहला, खुद दिविवि का आंतरिक संकट है, जिसके तहत न केवल उसकी महत्वपूर्ण संस्थाएं (अकादमिक मामलों में सर्वोच्च विद्वत परिषद और निर्णयों के लिए सर्वोच्च कार्यकारी परिषद) अपनी निर्धारित भूमिका और महत्व खोते जा रहे हैं। इसका असर विभागीय परिषदों, विभिन्न संकायों की बैठकों और काॅलिजों की स्टाफ काउंसिलों पर भी पड़ा है। कुलपतियों द्वारा अहम फैसले अलोकतांत्रिक ढंग से, जल्दबाजी में, असहमति का निरादर करते हुए लिए जाते हैं। शिक्षक संगठन डूटा और छात्र संगठन डूसू का दिविवि में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। शिक्षकों और छात्रों के हितों के लिए संघर्ष करने वाले इन संगठनों का भी अवमूल्यन हुआ है। जब समाज के अन्य क्षेत्रों में स्वतंत्र सोच और असहमति के लिए जगह सिकुड़ती है तो लोग विश्वविद्यालयों की तरफ देखते हैं और वहां से प्रेरणा पाते हैं। दिविवि में ऐसा माहौल बन चुका है कि कुलपति ही नहीं, बहुत-से शिक्षक भी विश्वविद्यालय के अर्थ और अवधारणा के प्रति जागरूक प्रतीत नहीं होते।
दिविवि के इस आंतरिक संकट को न तो नवउदारवादी दुष्प्रभावों के मत्थे मढ़ा जा सकता है, न नेताओं और नौकरशाही के हस्तक्षेप के। यह कहना तसल्ली की बात नहीं मानी जा सकती कि राजनीतिक हस्तक्षेप करके नेता कमजोर लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठा देते हैं; मंत्रालय व यूजीसी के नौकरशाह बेजा दखलंदाजी करते हैं; कई बार उन्हें कुलपति बना कर थोप दिया जाता है; और ऊपर से थोपे गए लोग विश्वविद्यालय की संस्थाओं और नियम-कायदों को धता बता कर मनमाने ढंग से सरकार का एजेंडा लागू करते हैं। सीधी बात यह है कि अगर दिविवि का निर्धारित आंतरिक ढांचा हर स्तर पर मजबूत हो तो ऊपर से थोपे गए किसी व्यक्ति की मनमानी ज्यादा देर नहीं चल सकती। शिक्षकों की भूमिका विश्वविद्यालय के आंतरिक ढांचे के अंतर्गत सबसे महत्वपूर्ण होती है। सभी संस्थाओं और गतिविधियों में वे शामिल होते हैं। अगर शिक्षक मजबूत और अपनी भूमिका के प्रति गंभीर होंगे तो आंतरिक ढांचा कमजोर नहीं हो सकता और ऊपर से थोपे गए कमजोर या अवांछित लोग समय काट कर या समय से पहले विदा हो जा सकते हैं। शिक्षकों की मजबूती से सबक लेकर नेता और नौकरशाह अपना रवैया बदलने के लिए बाध्य भी हो सकते हैं। यह तर्क कि कुलपतियों व नौकरशाहों का विरोध करने से शिक्षकों के काम रुक जाते हैं, कतई वाजिब नहीं कहा जा सकता। शिक्षकों का मूलभूत काम अध्यापन है, अगर वही बिगड़ रहा हो तो उनकी अपनी तरक्की और परियोजनाएं लेने का काम आगे बढ़ता भी रहे तो छात्रों को उससे कोई फायदा नहीं होता। यह चर्चा हमने इसलिए की है कि राजनीतिक और नौकरशाही के हस्तक्षेप से पैदा होने वाली विश्वविद्यालय के नियमन संबंधी समस्याओं को ही कुछ विद्वान उच्च शिक्षा का संकट बता देते हैं।
दिविवि का दूसरा संकट उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और उपलब्धता को लेकर है। अभी तक दिविवि में राष्ट्रीय स्तर पर लागू 10+2+3 के तहत बीए, बीएससी, बीकॉम के ऑनर्स और प्रोग्राम की पढ़ाई होती है। पाठ्यक्रम का स्वरूप ऐसा है कि उत्तीर्ण छात्र विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग सकते हैं अथवा/ और स्नातकोत्तर/ शोध के लिए आगे पढ़ाई जारी रख सकते हैं। इनमें से कोई न कोई कोर्स पढ़ने के लिए बहुत-से विदेशी छात्र भी दिविवि आते हैं। दिविवि के कुछ कॉलेज मेडिकल, इंजीनियरी (दिविवि के इंजीनियरिंग कॉलेज को कुछ वर्ष पहले अलग कर दिया गया), नर्र्सिंग, होम साइंस, एप्लाइड साइंस, बीएड व बीएलएड, पत्रकारिता आदि व्यावसायिक कोर्स कराते हैं। अलग संकायों में प्रबंधन और लॉ भी पढ़ाए जाते हैं। स्नातक अथवा स्नातकोत्तर पढ़ाई करते हुए भारतीय और विदेशी भाषाओं के सर्टिफिकेट व डिप्लोमा कोर्स भी उपलब्ध हैं। इच्छुक छात्र कुछ भाषाओं में स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री भी कर सकते हैं।
इन कोर्सों की गुणवत्ता और उपलब्धता निरंतर बढ़ती रहे, इसके प्रयास होते रहना जरूरी है। वैसे प्रयासों को ही उच्च शिक्षा में सही सुधार कहा जाएगा। लेकिन नवउदारवादी नीतियों के तहत ‘सुधार’ की वकालत करने वाले उच्च शिक्षा के हर कोर्स को राजगारोन्मुख/ बाजारोन्मुख बनाने पर तुले रहते हैं। दूसरे, उनका आग्रह होता है कि दिविवि का पाठ्यक्रम और परीक्षा व्यवस्था ऐसी हो कि यहां के छात्र पढ़ाई के दौरान और पढ़ाई के बाद विदेश, विशेषकर अमेरिका में अपनी पढ़ाई सुभीते से जारी रख सकें। दूसरे शब्दों में, वे नकल को सुधार का नाम देते हैं। दिविवि में तीन साल पहले थोपे गए समेस्टर सिस्टम और इस अकादमिक सत्र से थोपे गए चार साला स्नातक प्रोग्राम (एफवाईयूपी) की यही सच्चाई है। और यही दिविवि में उच्च शिक्षा का असली संकट है।
सेमेस्टर प्रणाली और एफवाईयूपी के तहत उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को ही चोट नहीं पहुंचाई गई है, शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों के बीच व्यवस्थित तरीके से भेदभाव की नींव डाली गई है। एक वाक्य में, यह प्रोग्राम पूरी तरह से छात्र विरोधी है। विशेष तौर पर सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को दो साल बाद डिप्लोमा लेकर विश्वविद्यालय से बाहर निकलना होगा। जिस तरह से स्कूल में अलग-अलग स्ट्रीम लेने वाले सभी छात्रों को 11 फाउंडेशन कोर्स अनिवार्य रूप से पढ़ने हैं, हो सकता है उनमें बहुत-से बिना डिप्लोमा के ही बाहर हो जाएं। इस प्रोग्राम के तहत शारीरिक तौर पर विकलांग छात्रों की पढ़ाई बुरी तरह बाधित होगी। कोर्ट ने भी इस बाबत दिविवि को आगाह किया है। उच्च शिक्षा की प्राप्ति के रास्ते में पहले से ही कई तरह की बाधाओं से घिरी विशेष तौर पर गांव-कस्बों की लड़कियों और मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय, जो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काफी पिछड़ा है, के लिए उच्च शिक्षा का रास्ता और दुर्गम हो जाएगा। ऑनर्स की डिग्री हासिल करने के इच्छुक छात्रों का एक साल अतिरिक्त लगेगा, जिसका उनके अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। हालांकि उन्हें भी जो ज्ञान मिलेगा वह तीन साला ऑनर्स कोर्स से कमतर होगा। यह प्रोग्राम भेदभाव की नींव पर स्थित है, यह इसीसे स्पष्ट हो जाता है कि एसओएल में पढ़ने वाले करीब 3 लाख छात्रों को इसके लायक नहीं समझा गया है। विद्वत परिषद के पूर्व सदस्य और एसओएल के शिक्षक रहे वीपी जैन ने ठीक ही इन लाखों छात्रों को आधुनिक एकलव्यों की संज्ञा दी है।
कुलपति का यह कहना कि पहले या दूसरे साल में पढ़ाई छोड़ देने वाले 30 प्रतिशत छात्रों पर रोक लगेगी गैर-जिम्मेदाराना और भ्रामक है। अब दो साल बाद उन्हें अनिवार्य रूप से कॉलेजों से बाहर कर देने की व्यवस्था कर दी गई है। जबकि जरूरत इस बात की है कि दाखिला लेने वाला एक भी छात्र न पढ़ाई छोड़े, न फेल हो। क्योंकि फेल छात्र नहीं, शिक्षक और संस्थान होते हैं। दरअसल, इस प्रोग्राम का संदेश साफ है - जो कमजोर हैं, वे डिप्लोमा लेकर छोटी नौकरी की तलाश करें ताकि बड़ी नौकरियां बड़े लोगों के बच्चों को मिलती रहें। इस प्रोग्राम से सबसे ज्यादा अन्याय इस साल दाखिला लेने वाले साधारण हैसियत के छात्रों के साथ हुआ है। उनमें और उनके अभिभावकों में असमंजस और अनिश्चितता की स्थिति है कि दिविवि की डिग्री का उनका सपना पूरा होगा या नहीं?
यह छात्रों के प्रति हद दर्जे की गैरजिम्मेदारी है कि एफवाईयूपी 24 दिसंबर 2012 को विद्वत परिषद की तीन दिन के नोटिस पर बुलाई गई विशेष बैठक में पहली बार रखा गया और पारित हो गया। अगले दिन कार्यकारी परिषद में भी यह औपचारिकता पूरी कर ली गई। विरोध का कोई मूल्य था ही नहीं। विद्वत परिषद और कार्यकारी परिषद के जिन चुने गए सदस्यों ने इस प्रोग्राम का समर्थन किया, वे अगर वैसा न भी करते तब भी वह पारित होता। सूचना के अनुसार उसके कुछ दिन पहले नवंबर में ‘उत्सवप्रिय’ कुलपति ने एफवाईयूपी पर चर्चा करने के लिए विशेष तौर पर बुलाए गए 10 हजार छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों का एक मेला लगाया था! 5 मार्च 2013 को विभिन्न विभागों को 15 दिनों में नया पाठ्यक्रम तैयार करके देने के लिए कहा गया जिसे एक महीना और बढ़ाया गया। उसी तरह से आनन-फाानन में समाज विज्ञान और विज्ञान संकायों की बैठकें आयोजित की गईं और कोर्स कमेटी वगैरह की औपचारिकताएं निभाई गईं।
इस मामले में सबसे ज्यादा चिंता की बात है कि पाठ्यक्रम आधा-अधूरा है और छात्रों के लिए पाठ्य सामग्री नहीं है; न शिक्षक। पिछले करीब 4 साल से दिविवि में शिक्षकों की नियुक्तियां बंद हैं, जबकि 4 हजार पद खाली पड़े हैं। गोया सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षकों की नियुक्तियां रोके रखना जरूरी हो! नए पाठ्यक्रम को पढ़ाने के लिए शिक्षकों को कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। कुलपति और उनके समर्थकों की बस एक ही टेक है - ‘अमेरिका में ऐसा होता है’। वे यह भी सुनने और सोचने के लिए तैयार नहीं हैं कि अमेरिका सहित किसी भी पूंजीवादी देश में शिक्षा संबंधी बदलाव जैसा गंभीर काम इस फूहड़ ढंग से करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
ऐसे में यह स्वाभाविक है कि विवादास्पद एफवाईयूपी को लेकर पिछले कुछ महीनों से लगातार बहस चल रही है। बहस एकतरफा है, जो इस प्रोग्राम का विरोध करने वाले शिक्षकों, छात्रों, शिक्षाविदों, विद्वानों और नागरिक समाज के गणमान्य व्यक्तियों की तरफ से चलाई जा रही है। प्रोग्राम को लागू करने वाले - दिविवि के कुलपति व उनकी टास्क फोर्स और दोनों मानव संसाधन मंत्री - किसी भी तर्क का जवाब न देकर महज ताकत के ‘तर्क’ से अपने फैसले पर अडिग हैं। राष्ट्रपति, जो दिविवि के विजिटर हैं, और प्रधानमंत्री, जो संसद के सर्वोच्च नेता हैं, पूरे प्रकरण में चुप्पी साधे हुए हैं। जबकि देश के कई प्रतिष्ठित विद्वान उन्हें पत्र लिख चुके हैं और मिल कर यह प्रोग्राम कम से कम इस साल स्थगित करने की प्रार्थना कर चुके हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का यह रुख दर्शाता है कि यूपीए सरकार उच्च शिक्षा में नवउदारवादी एजेंडा लागू करने का निर्णायक फैसला कर चुकी है। सरकार का फैसला यह है कि नवउदारवादी एजेंडे के तहत जिस तरह अर्थव्यवस्था पहले से आर्थिक रूप से मजबूत लोगों को और मजबूत बनाने के लिए बनाई जाती है, शिक्षा व्यवस्था को भी उसी तरह बनाना है। पिछले दो दशकों में यह काम स्कूली और व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था में काफी तेजी से किया गया है। अब सार्वजनिक क्षेत्र के उच्च शिक्षा संस्थानों की बारी है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में यह एजेंडा अच्छी तरह से रखा गया है। इस प्रोग्राम के हिमायती मानव संसाधन राज्यमंत्री शशि थरूर ने खुद कहा है कि चार साला स्नातक प्रोग्राम नहीं होने के चलते यहां के छात्रों को अमेरिका में दिक्कत का सामना करना पड़ता है। बताने की जरूरत नहीं कि यहां के कौन-से और कितने छात्र आगे पढ़ने अमेरिका जाते हैं?
जारी...........
एफवाईयूपी


