बड़े भाग भैंसा तन पावा, नमो भागवत योगी गावा
बड़े भाग भैंसा तन पावा, नमो भागवत योगी गावा
राम नरेश गौतम
अजब किस्सा है भारत सरकार का। यह देश विदेशियों को तो बीफ (बैल-भैंस का मांस) बेचना तो पसंद करता है, लेकिन उसके अपने नागरिक बीफ खाएं, इस पर ऐतराज है। लगता है सरकार की मंशा है कि बैल-भैंसों को बचाकर सरकार उनसे ट्रैक्टर खिंचवाया जाए, क्योंकि हल से खेती का न तो अब जमाना रहा और न ही जरूरत।
अब तुलसीदास की 'रामचरित मानस' में लिखी चौपाई 'बड़े भाग मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सद ग्रंथहिं गावा' को 'बड़े भाग भैंसा तन पावा, नमो भागवत योगी गावा' होना चाहिए। क्योंकि भगवा चादर में पैर पसार कर सो रहे भारत देश में अब मनुष्य होना दुर्भाग्यशाली है। अब भारत में बैल-भैंस होना सौभाग्य का दूसरा नाम है।
अच्छे डील डौल वाले युवराज जैसे भैंसों, बैलों की कीमत ही नहीं करोड़ों में है, बल्कि सामान्य बैंलों, भैंसों की देखरेख भी मनुष्यों से अधिक है।
भारत में केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे कुछेक राज्यों को छोड़ दिया जाए तो शेष संपूर्ण भारत में बैंलों-भैंसों को किसी भी प्रकार का शारीरिक, मानसिक क्षति पहुंचाने वाला व्यक्ति जेल जाने का भागी बनेगा। हरियाणा जैसे राज्यों में तो यदि धोखे से भी आपके द्वारा 'मातृ-समान गाय के पति पितृ-समान बैल महाराज' की जान चली जाती है तो आपको भी बैल महाराज की तरह स्वर्ग भेज दिया जाएगा।
इंसान को जान से मार देने के आरोप में संभव है कि आप बेदाग बच जाएं, मगर बैल-भैंसा को मारने पर आपको जेल की चक्की पीसने से 'राम'जेठमलानी भी नहीं बचा सकते।
बीफ अर्थात बैल-भैंसे का मांस निर्यात करने वाले संगठित कारोबार पर तो केंद्र सरकार पाबंदी नहीं लगाती है, अलबत्ता बैल-भैंस का मांस बेचकर दो जून की रोटी का इंतजाम करने वाले छोटे व्यापारियों पर शिकंजा कसा जा रहा है। उत्तरप्रदेश से इसकी शुरुआत की गई है। कहा जा रहा है कि जिन बूचडख़ानों को बंद किया जा रहा है, वे अवैध हैं। अगर मान भी लिया जाए कि वे अवैध हैं, तो क्या लोगों की जीविका का साधन जारी रखने के लिए उनको वैध नहीं बनाया जा सकता। मगर नहीं, सरकार ऐसा नहीं कर रही है।
हद तो तब हो गई जब एक परिवार ने विवाह समारोह में बीफ परोसने के लिए भैंसा काटने की अनुमति मांगी तो उत्तरप्रदेश प्रशासन ने उन्हें बस मुर्गा काटकर ही काम चलाने की सलाह दे दी।
लोग क्या खाएं, क्या पहनें, किसके साथ घर से बाहर जाएं अब यह भी सरकारें तय करने लगी हैं।
मीडिया के मुंह पर 'मोदी मैजिक' ब्रांड का ताला पड़ा हुआ है। ताला लगा है या खुद लगा लिया गया है, समझना मुश्किल नहीं। कहने को तो भारत में संचार साधन तथाकथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्र के हथियार से युक्त हैं, लेकिन पंूजीवाद और राष्ट्रवाद जैसे कलंक की काली छाया के घेरे में हैं। सरकार के खिलाफ बोलें तो राष्ट्रद्रोही कहलाएं और नीतियों के खिलाफ बोलें तो उदारवाद के विरोधी का तमगा लग जाए।


