बढ़िया लोग सिविल सोसायटी हो गए हैं क्योंकि घोंघा प्रसाद का भ्रष्टाचार मिटाना है
बढ़िया लोग सिविल सोसायटी हो गए हैं क्योंकि घोंघा प्रसाद का भ्रष्टाचार मिटाना है
जुगनू शारदेय
सच बोलना तो अच्छा माना ही जाता है । 1967 तक झूठ तो असंसदीय शब्द भी था । जॉर्ज फर्णांडिस ने इसे संसदीय बनाया । कुछ लोग यह मान कर चलते हैं कि सरकार इसी संसदीय झूठ शब्द पर चलती है । झूठ बोलना भी और सच को समझना भी एक कला है । जिन्हें इसकी समझ होती है तो वह या तो कपिल सिब्बल हो जाते हैं या सिविल सोसायटी हो जाते हैं । बचे खुचे लोग इस समझ कला के मध्यमार्गी रामदेव कहलाते हैं । भारत यानी इंडिया की बड़ी सी असली नकली सी सरकार झूठ और मध्यमार्ग पर ही चलती है । यह सरकार जब कांग्रेस के कब्जे से बाहर थी तो एक बिहारी ( सौ बीमारी - अब पुरानी बात हो गई ) नीतीश कुमार ने भारत सरकार से सरकार संचालन का गुर सीखा । नतीजतन आज बिहार बढ़ता बिहार है , बदलता बिहार है । विरासत में बुद्ध हैं । बौद्ध गया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद सीधे बनारस के पास सारनाथ पहुंचे और वहीं उन्होने अपना ज्ञान बांटा । आज के गंगा इस पार वाले बिहार में फिर लौट कर नहीं आए । हां , आज के गंगा पार वाले उत्तर बिहार में जरूर गए । बुद्ध बहुत ही ज्ञानी थे । विरासत में आज के बिहार के अफसरों को अपना ज्ञान दे रहे हैं । आज के बिहार के अफसरों के भी अफसर हैं भूटान - चीन पलट बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार । जाहिर है वैसी हालत में बिहार के मुख्य सचिव ही दूसरे ज्ञानी हैं । इनका ज्ञान पंचतंत्र की बहुत सारी कहानियों से मिलता जुलता है । चूंकि बिहार में कोई गुलजार नहीं है । होते तो बिहार का राष्ट्रज्ञान लिखते तीर से टंग कर कमल खिला है ।
बिहार में एक बड़ा भारी गुण है । यह अपनी तरक्की पर इतराता है । यहां अपनी का मतलब शुद्ध निजी उन्नति है । अपनी तरक्की पर इतराने के बाद दूसरे की तरक्की से जलता है । इसी जलन के कारण तरह तरह की असली जालबट्टा तुड़ीबाजी को भूल कर मुख्य मंत्री भी अंग्रेजी का ज्ञान बघार देते हैं कि जिसका हिंदी अनुवाद तिल का ताड़ या राई का पहाड़ होता है । यह राई का पहाड़ है बियाडा यानी बिहार इंडस्ट्रियल एरिया प्राधिकार के भूखंडों का बंटवारा । इससे उन छुटभैयों को बड़ी तकलीफ हो रही है जो इसे सिंगुर - नंदीग्राम बनाना चाहते थे । फिर भी कुछ घोंघा प्रसाद वसंतलाल अदालत की शरण में गए ही हैं । जनता की शरण में जाना और उसे सच्चाई बताने से ये लोग घबराते हैं । जैसे महाज्ञानी नीतीश कुमार 2005 में जब फुटपाथ प्रसाद थे तो अक्टूबर - नवंबर 2005 में होने वाले चुनाव में गद्दी लाल बनने के लिए जुलाई - अगस्त में गांव गांव भटके । तब से यह उनका विजयी फारमूला हो गया है कि चुनाव के पहले गांव गांव भटको । अपने लालू जी पटना - दिल्ली के बीच भटकते हुए अटकते रहते हैं । अखबार में छप जाए और टेलीविजन में उवाचित हो जाए तो लक्ष्य पूरा । आखिर टेलीविजन ने ही तो खेला खेल बियाडा का । ऐसा लगा कि भारत ने अपनी क्रिकेट की भूमि पाकिस्तान को दे दी । वैसे भी क्रिकेट की भूमि खेल कूद की नहीं विज्ञापन की होती है । हम जैसे कुछ लोग जो अब वरिष्ठ कहे जाते हैं उन्हें लगता है कि जमाना बदल रहा है । सत्य वचन !
अजीब जमाना आया है । ऐसा लगता है कि अदालत और सीबीआइ ही सत्य के रखवाले हैं । हालांकि अब सिविल सोसायटी भी सत्य के लिए लड़ रही है । यहां सिविल सोसायटी का मतलब समाज नहीं होता है । बल्कि कुछ कुछ वैसा ही होता है जैसा अंग्रेजों के जमाने में सिविल लाइंस होता है। अब तो बहुत बढ़िया बढ़िया लोग सिविल सोसायटी हो गए हैं क्योंकि घोंघा प्रसाद का भ्रष्टाचार मिटाना है और वसंत लाल का भ्रष्टाचार बढ़ाना है । तो बुद्ध - महावीर और बाद में जिनका नाम जोड़ना चाहें ,उनका नाम जोड़ कर , जैसे बिहार में कह सकते हैं नीतीश - सुशील की विरासत की धरती पर अफसरी विरासत के प्रतीक बिहार के मुख्य सचिव अनूप मुखर्जी की बियाडा के बंदरबांट पर अपने मुख्य मत्री को दी गई रपट । इससे यह साबित हो जाता है कि बियाडा उद्यमी को हतोत्साहित करने में विशेषज्ञ । महाज्ञानी नीतीश कुमार समझ लें कि आपके ऐसे ही महायानी अफसर ही बिहार को प्रदूषण से मुक्त रखेंगे । न उद्योग होगा , न प्रदूषण होगा । अगर किसी को बिहारी हिंदी समझ में न आए तो क्षमा चाहता हूं क्योंकि यहां पुरानी सचिवालय / नई सचिवालय लिखा जाता है । तो मुख्य सचिव के प्रतिवेदन का वाचन करें । इस वाचन से यह साफ होता है कि अपनी 24 नवंबर 2005 को बनी सरकार में नीतीश कुमार ने उद्योग को बहुत महत्व नहीं दिया था । कारण भी बहुत साफ था कि उनके पूर्व की श्रीमत्ती सरकार और श्री सरकार ने ऐसी व्यवस्था बनाई थी कि लोग बिहार में उद्योग लगाने के बजाए अपहरण उद्योग में शामिल हो जाते थे । फिर भी श्रीमत्ती सरकार ने 1974 में बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकार को में अनेक औद्योगिक विकास प्राधिकारों - सरकारी संस्थानों उर्फ दुकानों को 2003 में मिला कर एक कर दिया । आप समझ सकते हैं कि बिहार में औद्योगिक चेतना 1974 में आई । उसका पुनरजागरण 2003 में हुआ । और 2007 में महाजागरण महाज्ञानी नीतीश कुमार के कार्य़काल में हुआ क्योंकि बियाडा विनियमावली 2007 बनी । विनियमावली की हिंदी आपको समझ में आती हो तो आप महान हैं । अभी मेरा बकवास लेखन उद्योग समाप्त नहीं हुआ है सो हिंदी पत्रकारिता की शैली में बताते चलें कि ' 2006 में निदेशक पर्षद द्वारा 18 वीं बैठक में भू आंवंटन की शक्ति प्रबंध निदेशक को प्रत्यायोजित ( इसका मतलब जानने वाले महान हैं ) कर दी गई । तदोपरांत बियाडा के सभी कार्य़कलापों को एक साथ रख कर वित्त , विधि एवं कार्मिक विभाग की सहमति से तत्कालीन प्रधान सचिव उद्योग विभाग श्री आर के सिंह ( अभी सिंह भारत के गृह सचिव हैं और बिहार में सड़क - पुल निर्माण इन्ही की देन है ) द्वारा तत्कालीन राज्य मंत्री ( स्वतंत्र प्रभार ) श्री गौतम सिंह से अनुमोदन प्राप्त कर उक्त नियमावली 2007 अधिसूचित की गई । '
बहरहाल , इससे इतना सिद्ध होता है कि प्रथम नीतीशीय शासन में उद्योग का कोई महत्व नहीं था । नीतियां बन रही थीँ और बिहार के लिए नया कारोबार मल्टीप्लेक्स - मॉल की नींव प्रचारात्मक स्तर पर प्रकाश झा डाल रहे थे । आदतन नीतीश कुमार कागजी नीतियां बना रहे थे । उसके कारण कुछ लोग बिहार में उद्योग लगाना चाह रहे थे । उद्यमी को कितना पापड़ बेलना पड़ता है और कितनी सुविधा मिलती है - यही तो है मुख्य सचिव की रपट में । मुख्य सचिव ने सिर्फ 7 उद्यमियों की जांच की क्योंकि इन सातों ने शिल्पा शेट्टी की तर्ज पर बिहार लूट लिया । य़ूपी लुटने वाले कुछ बिहार वासी भी हैं - पर वह किस्सा किसी और ब्रेकिंग न्यूज में ।
तो पहली कहानी सुश्री रहमत फातिमा अमानुल्ला की । काफी समझदारों ने बिहार के अफसर अफजल अमानुल्लाह और मंत्री परवीन अमानुल्लाह की बेटी को बेटा बना दिया है । तो कहानी यह कि 21 अप्रैल 2010 को इस बिटिया ने पाटलीपुत्र औद्योगिक क्षेत्र में जमीन मांगी और 29 दिसंबर 2010 को उसे जमीन आवंटित कर दी गई । औद्योगिक विकास में कितना समय लगता है बिहार में कि आला अफसर कि बिटिया को भी जमीन 9 माह में मिली । आगे का किस्सा अब मुख्य सचिव की रपट की जुबानी : " आवंटित भूमि पर लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग का कब्जा होने के कारण आवंटी को भूमि पर कब्जा न हो सका …"
आगे की कहानी में कोई सनसनी नहीं है । बस इतना कि बियाडा इतना अनजान रहा कि लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग जिस भूखंड पर था , वह एक उद्यमी को दे दिया गया । इसे सनसनी बनाया गया । क्यों ? यह तो सनसनी बनाने वाले जानें । इसका मतलब यह न समझिए कि मुख्य सचिव ने अपनी जांच पड़ताल में कोई मेहनत की या यह समझ पाए कि उनका उद्योग विभाग सही ढंग से गलत काम करता है । मेसर्स देवलोक विवरेज का रिश्ता जदयू सांसद जगदीश शर्मा के पुत्र से जोड़ा गया । इनके प्रसंग में कोई विलंब नहीं हुआ । जुलाई 2010 में आवेदन किया गया और नवंबर 2010 को " आवंटित भुमि पर ( उद्यमी ने ) दखल कब्जा ले लिया ।
अब आइए चेन्नई की कंपनी निधि इंडस्ट्रीज का । इनके बारे में कहा गया कि यह मुख्य मंत्री के सचिव एस सिद्धार्थ के करीबी या रिश्तेदार हैं । इन्हें चार दिनों के अंदर 2009 में इंडस्ट्रियल ग्रोथ सेंटर गिद्धा में 15 एकड़ जमीन दी गई । यह जानलेवा एस्बेस्टस कॉरुगेटेड शीट बनाते हैं । 2011 से उत्पादन भी हो रहा है । यहां इमके बारे में मुख्य सचिव लिखते हैं कि " मेरे निदेशानुसार मुख्य सचिव के विशेष कार्य़ पदाधिकारी सतीश सिंह ठाकुर ने (उद्यमी ) भीमराजा से बातें की । भीमराजा ने बताया कि वह आंध्र प्रदेश से आते हैं एवं एस सिद्धार्थ एवं एन विजयलक्ष्मी से कोई रिश्ता नहीं है ।"
फिर एक बेटी का मुद्दा । यह बेटी है मानव संसाधन मंत्री प्रणव कुमार शाही की बेटी उर्वशी शाही का मैत्रेय एजुकेशन ट्रस्ट । यहां भी सात दिन में भूमि आवंटित हो जाती है । राज्य की नीति है कि ' औद्योगिक क्षेत्र के पूरे क्षेत्रफल का 20 प्रतिशत तक की भूमि शैक्षणिक संस्थानों को आवंटित की जा सकती है । ' मजे की बात यह है कि यह जमीन बार बार आवंटित होती रही और बार बार उद्यमी भागते रहे । इसके सिलसिले में मुख्य सचिव ने यह भी माना कि " यह भी कहा जा रहा है कि टी आई सायकिल को आवंटित भूमि इस संस्था मैत्रीय कालेज को दे दी गई । वस्तुस्थिति यह है कि यह भूखंड न तो टी आई सायकिल को कभी आवंटित किया गया एवं न ही टी आई सायकिल से कोई आवेदन प्राप्त हुआ है । "
मतलब बहुप्रचारित कि बिहार में सायकिल बनाने का कारखाना खुलने जा रहा है , गलत है । कारा महानिरीक्षक आनंद किशोर से जोड़ा गया मदर टेरेसा मेडिकल ट्रस्ट को । अगस्त 2010 को इस ट्रस्ट ने जमीन मांगी जो दिसंबर 2010 में दी गई । आनंद किशोर ने कहा कि वह उद्यमी को नहीं जानते हैं । यह बिहार में ही संभव है कि दिल्ली का पटपड़ गंज प्रतापगंज हो जाए तो यहां एक उद्यमी डॉक्टर बी डी सिंह का रिश्ता भाजपा खाता के पूर्व मंत्री और विधान परिषद सदस्य अवधेश नारायण सिंह से जोड़ा गया । यह भी एक प्रकार का शैक्षणिक संस्थान ही लगता है क्योंकि नाम है ' मदर्स सोसायटी फार एजुकेशन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट । यहां भी उद्यमी ने कहा कि वह अवधेश नारायण सिंह को नहीं जानते हैं । लेकिन ट्रायडेंट फाउंडेशन के एक ट्रस्टी रविरंजन को अवधेश कुमार सिंह के दामाद हैं ।
इसमें कोइ शक नहीं है कि बियाडा का पूरा विवाद बेमतलब है लेकिन मुख्य सचिव की रपट भी उतनी ही बेमतलब है । आखिर सवाल है कि एक उद्यमी रहमत फातिमा अमानुल्लाह के मामले में देरी क्यों हुई और उद्यमी को पटना छोड़ कर बिहटा क्यों जाना पड़ा।


