बिहार: पहले अपना 'राजनीतिक-शत्रु' तो घोषित करें जीतनराम मांझी
बिहार: पहले अपना 'राजनीतिक-शत्रु' तो घोषित करें जीतनराम मांझी
दोस्त या 'राजनीतिक-शत्रु' के रूप में भाजपा के साथ मांझी का क्या रिश्ता होगा, जनता को उन्हें बताना चाहिए।
लम्बे समय तक 'सत्ता-सुख' भोग चुके जीतनराम मांझी (जिन्हें हाल ही में जदयू ने निष्काषित किया) ने 'हिन्दुस्तान अवामी मोर्चा' का ऐलान किया है। दलितों के नाम पर राजनीति करने वाले 'ब्राह्मणवादी पुरूष' बाबू जगजीवन राम सरीखे कई लोग पहले भी नई पार्टी बना चुके फिर बाद में उचित राजनीतिक मोलभाव करके गद्दी हथियाने दूसरी पार्टियों में विलय कराते चले गए। जीतनराम मांझी भी वही पुराने नुस्खे; वही पुराने कार्ड आजमाने की कोशिश में उतर आएं है। बिहार में दलित आंदोलन को धारदार बनाकर निर्णायक शक्ति के रूप में उभारने के लिए बहुत जरूरी है कि जीतनराम मांझी सबसे पहले अपने प्रमुख 'राजनीतिक शत्रु' का ऐलान करें।
यह सवाल उठना लाजिमी है कि दोस्त या दुश्मन के रूप में भाजपा के साथ मांझी का रिश्ता क्या होगा, जनता को उन्हें बताना चाहिए। इसी आधार पर 'सामाजिक-न्याय' की शक्तियां गोलबंद हो सकती है और जाहिर है, हिन्दुस्तानी अवामी मोर्चा को सहानुभूतिपूर्वक समर्थन देने के बारे में जनता सोच सकती है। इसके उलट, अगर मांझी ने अपना राजनीतिक शत्रु नीतीश कुमार और जदयू को बनाया तो इसका सीधा मतलब यह होगा कि मांझी अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की 'बिहार में सत्ता प्राप्ति परियोजना' का ही हिस्सा बनने जा रहे हैं। हालांकि, जीतनराम मांझी के आरोप सही लगते हैं कि बिहार में नीतीश कुमार के करीबी नेता 50-50 लाख रुपये लेकर डीएम व एसपी का ट्रांसफर करते आए हैं। निर्माण के क्षेत्र में हजारों करोड़ का घोटाला चल रहा है। इन सबको नीतीश कुमार अपनी आँखों के सामने होते हुए देखते चले आ रहे हैं। गुड-गवर्नेंस के नाम पर क़ानून-व्यवस्था को अपनी सरकार की पहली प्राथमिकता बताने और "जीरो टॉलरेंस" के आधार पर डीएम/एसपी को निर्देश देने वाले नीतीश कुमार 'हत्या व आतंक' का सरगना अनंत सिंह' ( जिन पर १५० से भी ज्यादा आपराधिक मुकदमा पहले से ही दर्ज है) और ऐसे दर्जनों अपराधी व माफिया विधायकों तथा मंत्रियों के नाम पर अक्सर चुप्पी साध लेते हैं।
बहरहाल, यह राजनीतिक नहीं बल्कि प्रशासनिक (गुड गवर्नेंस) मुद्दा है जिसे कुमार अपनी राजनीतिक दृढ इच्छा-शक्ति के जरिये चाहें तो छुटकारा पा सकते हैं। बिहार में गुड-गवर्नेंस का हाल ये है कि एक शहरी मध्यवर्गीय परिवार को (भागलपुर में) सिलेंडर में गैस भरवाने के लिए तीन सौ पचास लोगों के साथ लाईन लगाकर सुबह छह बजे से लेकर दोपहर दो बजे खड़ा रहना पड़ता है। खुले बाजार में एक-दो किलो खुदरा गैस खरीदने के लिए भी बारह बजे के बाद ही दुकानदार बुलाता है। सरकार मीडिया में शोर मचाती रहती है कि गैस की होम डिलीवरी सेवा उपलब्ध कराया जा रहा है किन्तु; कब और कहाँ ?
अखिलेश चंद्र प्रभाकर


