निमेष रिपोर्ट में आरोपित पुलिस अधिकारियों का ब्योरा देते हुये
रिहाई मंच ने की उनके खिलाफ कार्यवायी की माँग
सभी आतंकवादी मामलों की हो अग्रिम विवेचना
मुजफ्फनगर दंगों के जाँच के लिये रिहाई मंच का जाँच दल आज होगा रवाना
लखनऊ/21 सितम्बर 2013। मौलाना खालिद मुजाहिद और तारिक कासमी की फर्जी गिरफ्तारी की पुष्टि करने वाली निमेष कमीशन की रिपोर्ट में साफ लिखा है ‘मामले में सक्रिय भूमिका निभाकर विधि विरूद्ध कार्य करने वाले अधिकारी, कर्मचारीगण को चिन्हित कर उनके विरूद्ध विधि के अनुसार कार्यवाही करने की संस्तुति की जाती है (पेज 235)।’ इसके बावजूद सपा सरकार ने अब तक निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर कोई कार्यवाही नहीं की है। इसलिये रिहाई मंच ने तय किया है कि निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर अमल करवाने के लिये प्रदेश सरकार के खिलाफ आन्दोलन जारी रखेगा। इतना ही नहीं रिहाई मंच 121 दिनों के ऐतिहासिक धरने के बाद अब अपने आन्दोलन को पूरे सूबे में चलायेगा। इस दौरान मंच आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों को छोड़ने के वादे से मुकरने वाली और खालिद मुजाहिद के हत्यारे पुलिस तथा आईबी अधिकारियों को बचाने में लगी सपा सरकार के खिलाफ यात्रा निकालेगा और जगह-जगह सम्मेलन तथा सभाओं का आयोजन करेगा। ये बातें रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने आज प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में कहीं।

रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि निमेष कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर मामले में शामिल एक पूर्व आईपीएस अधिकारी समेत चार आईपीएस अधिकारियों और छः पीपीएस अधिकारियों ने अपने मातहत 32 पुलिस कर्मचारियों के सहयोग से तारिक और खालिद को यूपी कोर्ट ब्लास्ट मामले में फँसाकर जेल भेज दिया। जिनमें से खालिद की हत्या भी इन्हीं पुलिस वालों ने एक साजिश के तहत करा दी। इन अपराधिक और साम्प्रदायिक पुलिस अधिकारियों में तत्कालीन डीजीपी विक्रम सिंह (सेवानिवृत), तत्कालीन एडीजी कानून-व्यवस्था बृजलाल (अब डीजी सिविल डिफेंस हेड क्वार्टर), सीतापुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अमिताभ यश (अब डीआईजी, पीएसआए एंड पीएस, लखनऊ), लखनऊ के तत्कालीन एसएसपी अखिल कुमार (अब डीआईजी, विदेश मामलों के मंत्रालय, नई दिल्ली), लखनऊ एसटीएफ के तत्कालीन एएसपी मनोज कुमार झा (अब डिप्टी कमाण्डेंट, पीएसी, सीतापुर), लखनऊ चौक क्षेत्र के तत्कालीन क्षेत्राधिकारी चिरंजीव नाथ सिन्हा (अब डीएसपी, पीटीएस, गोरखपुर), एसटीएफ टीम के तत्कालीन पुलिस उपाधिक्षक एस आनंद (अब एएसपी, एसटीएफ, लखनऊ), फैजाबाद के तत्कालीन नगर क्षेत्राधिकारी राजेश कुमार पाण्डे (अब डीएसपी गाजियाबाद), एटीएस मुख्यालय के पुलिस उपाधीक्षक राजेश कुमार श्रीवास्तव (अब डीएसपी एटीएस, लखनऊ), बाराबंकी के तत्कालीन नगरक्षेत्राधिकारी दया राम सरोज (अब एएसपी ललितपुर) का नाम शामिल हैं। बावजूद इसके प्रदेश सरकार ने इन पर कार्यवायी करने के बजाय उनको प्रमोशन दे कर अपने साम्प्रदायिक नीतियों को खुलेआम अंजाम दे रही है।

तारिक के वकील व मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि निमेष कमीशन रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि किस तरह से पुलिस टीम के लीडर बीके सिंह ने अपने मातहत विरेंद्र नामक अस्त्र धारक और दो कांस्टेबल व टाटा सूमो के ड्राइवर जसवंत सिंह के साथ मिल कर तारिक को प्रताड़ित किया तथा करंट लगाया जाता, नंगा कर मारा-पीटा जाता, पेशाब व शराब पिलायी जाती व मुँह में गंदी चीजें ठूस दी जाती थीं (पृष्ठ-46)। उन्होंने कहा कि इस तरह से निर्दोष मुसलमानों को प्रताड़ित करने वालों को गुजरात के बंजारा और पीपी पांडे की तरह जेल के अन्दर होना चाहिए।

प्रेस कांफ्रेंस को सम्बोधित करते हुये रिहाई मंच के समर्थन में आये इंडियन नेशनल लीग के अध्यक्ष मोहम्मद सुलेमान ने कहा कि निमेष कमीशन की रिपोर्ट को सरकार ने वादा खिलाफी करते हुये बिना कार्रवायी रिपोर्ट के ही मानसून सत्र में रखा है। जो साबित करता है कि सरकार आतंकवाद के नाम पर निर्दोषों को छोड़ने के सवाल पर इमानदार नहीं है। जिसकी तस्दीक मुलायम सिंह यादव और उनके कुनबे द्वारा संसद् और जनता के बीच बार-बार यह झूठ बोलने से भी होता है कि उन्होंने आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को छोड़ दिया है। लेकिन उन्हें समझ लेना चाहिए कि जनता इस झूठ को समझ चुकी है और वह मुलायम और उनके कुनबे का बोझ अब और नहीं ढोना चाहती। उन्होंने कहा कि सभी आतंकी मामलों की अग्रिम विवेचना करायी जाये।

मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडे ने कहा कि निमेष कमीशन की रिपोर्ट के तर्ज पर प्रदेश में हुयी सभी आतंकी घटनाओं में हुयी गिरफ्तारियों पर जाँच आयोग गठित किया जाये क्योंकि सभी मामलों में गिरफ्तारियों पर सवाल उठते रहे हैं और अधिकतर मामलों में वही पुलिस और आईबी अधिकारी शामिल हैं जिन्हें चिन्हित कर सजा देने की संस्तुति निमेष कमीशन की रिपोर्ट ने की है। चाहे वह जून 2007 में बिजनौर के याकूब, नौशाद और नासिर हुसैन, पश्चिम बंगाल के जलालुद्दीन हों या फिर सीआरपीएफ कैंप रामपुर में हुये कथित आतंकी हमले में फँसाये गये जंग बहादुर खान, मोहम्मद शरीफ, गुलाब खान, कौसर फारूकी हों या फिर पिछली मुलायम सरकार में फँसाये गये लखनऊ के शुऐब, फरहान हों या इलाहाबाद के नैनी जेल में बंद डॉ. इरफान, मोहम्मद नसीम, शकील अहमद और मोहम्मद अजीज ऐसे कई मुस्लिम युवक हैं जो इन्हीं पुलिस और आईबी अधिकारियों द्वारा दिखायी गयी फर्जी बरामदगी के आधार पर जेलों में सड़ रहे हैं।

सामाजिक न्याय मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष व रिहाई मंच के नेता राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि रिहाई मंच के दबाव में जिस तरह सत्र के पहले ही दिन सरकार ने निमेष आयोग की रिपोर्ट को जारी किया है वह इस आन्दोलन की व्यापकता और राजनैतिक ताकत को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार दोषी पुलिस अधिकारियों को जेल नहीं भेजती है तो मुलायम के कुनबे का सफाया तय है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दंगों के दोषी अरुण कुमार जिस तरीके से उत्तर प्रदेश छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं, ऐसे में प्रदेश सरकार तत्काल उन्हें निलम्बित कर अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन में लापरवाही का मुकदमा दर्ज करे। क्योंकि अरुण कुमार के कार्यकाल में इससे पहले भी कानपुर में दंगों के दौरान 13 बेगुनाह मुस्लिम नौजवान पुलिस की गोलियों का शिकार हुये थे।

आन्दोलन के समर्थन में आये पीसी कुरील ने कहा कि निमेष कमीशन की रिपोर्ट ने सिर्फ मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार को साफ नहीं किया है बल्कि उसने इस बात को साफ किया है कि इस देश में वंचित समाज चाहे वह दलित हो या फिर मुस्लिम, उसके प्रति व्यवसथा में शामिल ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोग उसे देश द्रोही साबित करके उनका कत्लेआम कर रहे हैं। आज जब निमेष कमीशन की रिपोर्ट सदन के पटल पर आ गयी है तो होना तो यह चाहिए था कि इसने जिस तरीके से बर्बर उत्पीड़न को सामने लाया है उसके आलोक में प्रदेश में मुस्लिम आदिवासी दलित समाज से जुड़े हुये ऐसे गम्भीर केसों पर ऐसे आयोगों का गठन करके प्रदेश के लोकतांत्रिक माहौल को बहाल करे। पर निमेष आयोग पर अमल न करके सरकार ने साफ कर दिया है कि प्रदेश में लोकतांत्रिक सरकार न होकर जंगलराज कायम है।

रिहाई मंच के प्रवक्ताओं राजीव यादव और शाहनवाज आलम ने कहा कि आज रिहाई मंच का जाँच दल मुजफ्फरनगर दंगों की जाँच के लिये रवाना होगा।