हमारा समय और भीष्म साहनी
प्रगतिशील लेखक संघ का आयोजन
सतना। मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ इकाई सतना द्वारा भीष्म साहनी शताब्दी वर्ष के संदर्भ में ‘हमारा समय और भीष्म साहनी’ विषय पर 12 जुलाई 2015 को एक वृहद् आयोजन किया गया। इस आयोजन की मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध कहानीकार, उपन्यासकार, रंगकर्मी तथा इप्टा दिल्ली की अध्यक्ष सुश्री नूर ज़हीर थीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी के जाने-माने कहानीकार महेश कटारे (ग्वालियर) ने की तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में लेखक और एक्टिविस्ट मध्य प्रदेश प्रलेस के महासचिव विनीत तिवारी (इंदौर) उपस्थित थे। इनके अतिरिक्त रीवा से डॉ. चंद्रिका प्रसाद चंद्र, कैलाश चंद्र, डॉ. विद्याप्रकाश तिवारी, नागौद से अरुण नामदेव एवं रामलाल सिंह परिहार उपस्थित रहे। हनुमंत किशोर शर्मा (जबलपुर) ने भीष्म साहनी की रचनाओं पर केन्द्रित आलेख प्रस्तुत किया। अतिथियों का परिचय प्रह्लाद अग्रवाल ने दिया।
इकाई सचिव युवा कवि-कहानीकार अनिल अयान ने स्वागत वक्तव्य दिया। सतना के वरिष्ठ पत्रकार चिन्तामणि मिश्र ने बताया कि हिन्दी और ऊर्दू के जनवादी लेखक भीष्म साहनी ने देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक कुरूपताओं तथा साम्प्रदायिकता की सड़ांध पर प्रखरता और गहराई पर लिखा है। उनकी रचनाएँ आम आदमी के साथ किये जा रहे भेदभाव, शोषण और षड़यंत्र की हकीकत के दस्तावेज हैं। उन्होंने धर्म के आधार पर देश के बंटवारे और उसकी त्रासदी को अपनी आंखो से देखा था और साजिश को भी पहचाना था जिसे राजनीति और धर्म की जुगलबंदी ने अंजाम दिया था।
डॉ. चंद्रिका प्रसाद चंद्र ने भीष्म साहनी के साहित्य और विशेष रूप से उनकी कालजयी रचना ‘‘तमस’’ का सार प्रस्तुत करते हुए उसे समय सापेक्ष रचना निरूपित किया और कहा कि ऐसी रचनायें हर समय प्रासांगिक होती हैं, जिनके चरित्र पाठक के भीतर जगह बनाने मे समर्थ होते हैं। उन्होने उनकी कहानी ‘अमृतसर आ गया’ का भी उल्लेख किया।
विमर्श में भाग लेते हुए प्रसिद्ध कहानीकार श्रीमती सुषमा मुनीन्द्र ने भी मुख्य रूप से भीष्म साहनी की विभिन्न रचनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि जो उनका समय था आज भी उसी प्रकार का समय दिखाई देता है। धार्मिक और सामाजिक साम्प्रदायिकता, जातिवाद, गैरबराबरी तथा महिलाओं के खिलाफ प्रायोजित हिंसा रोज देखने-सुनने मे आती है। अभिव्यक्ति पर लगाये जाने वाले अंकुश से केवल बुद्धिजीवी ही नहीं सामान्य व्यक्ति भी पीड़ित है।
अपने उद्बोधन में विशिष्ट अतिथि विनीत तिवारी ने भीष्म साहनी की रचनाओं तथा उनके समय की राजनीतिक, सामाजिक विसंगतियो का उल्लेख करते हुए कहा कि आज का समय भीष्म साहनी के समय से बहुत दूर का समय न होते हुए भी अनेक किस्म से भिन्न है। इस भिन्नता की आहट को भीष्म जी पहचान रहे थे। तमस के भीतर ही इसका एक संकेत मिलता है कि जब अमन कमेटी बनाकर सांप्रदायिक हिंसा ख़तम करने की अपीलें की जाती हैं तो वही आदमी अमन के नारे लगाता मिलता है जिसने दंगा शुरू करवाया था। उनका इशारा साफ़ है कि सांप्रदायिकता के खिलाफ़ लड़ाई तब तक कामयाब नहीं हो सकती जब तक मुनाफ़े की खातिर दंगे फैलाने वालों से समाज को मुक्त न किया जाए। पूँजीवादी व्यवस्था में सांप्रदायिकता हो या अमन, उसके केन्द्र में मुनाफा रहता है। विनीत तिवारी ने कहा कि आज के बाज़ार की गति को भीष्म जी के समय से समझना मुष्किल है। उनके वक़्त में बाज़ार इतना हावी, क्रूर और अमूर्त नहीं था जितना आज हो गया है। लेकिन फिर भी भीष्मजी के लेखन, अभिनय और जीवन से एक प्यारे, मासूम और इंसानियत पर अडिग विष्वास मज़बूत होता है। यह उनके समूचे रचनाकर्म की ताक़त है।
महेश कटारे ने अपने वक्तव्य में आज के किसानों, मजदूरों और निम्न मध्य वर्ग के लोगो की दयनीय दशा का उल्लेख करते हुए बताया कि सत्ता का चरित्र कुछ इस प्रकार का है कि वह कमजोर वर्गो का हर तरह से शोषण करती है। इसके लिये उसे साम्प्रदायिकता, धर्म और चालाकी से काम लेने में कोई शर्म नहीं लगती। आज देश की परिस्थिति जिस प्रकार की है, उस संदर्भ में भीष्म साहनी की रचनाएँ पढ़ी जानी चाहियें और उनमें निहित संदेशों को ग्रहण करना चाहिये। उन्होंने कहा कि भीष्म साहनी धर्म को राजनीति से अलग करने के पक्षधर थे और मानते थे कि सभी नागरिको को समान अधिकार देते हुए निजी धार्मिक मान्यताओं को उसके नागरिक कर्तव्यों से अलग रखा जाना चाहिये। उनकी कहानी ‘पाली’ और ‘वांगचू’ का विषेष उल्लेख करते हुए उन्होंने भीष्म साहनी की संवेदनशीलता की गहराई से लोगों को परिचित करवाया।
मुख्य अतिथि सुश्री नूर जहीर ने भीष्म साहनी और उनकी पत्नी शीलाजी के साथ के संस्मरणों को आत्मीय ढंग से साझा किया और भीष्म साहनी की रचना प्रक्रिया तथा उनके जीवन के कई अनछुये प्रसंगों को उजागर किया। उन्होंने कहा कि भीष्म साहनी ने नाटक की नई परम्परा प्रारंभ की जिसमें वे नाटक के अंषों को लिख-लिखकर साथियों को सुनाते और राय लेते थे, फिर सोचकर आगे का अंश लिखते थे। उन्होंने उनके नाटक ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ तथा ‘हानूश’ का उल्लेख करते हुए नाटकों में छिपे संदेश के बारे मे बताया।
संस्मरण सुनाते हुए नूर जहीर ने बताया कि उनकी मुलाकात भीष्म जी से तब हुई जब वो 13-14 वर्ष की थीं और वे उन्हें चचा कहकर संबोधित करती थीं। नूर ज़हीर ने बताया कि मेरी माँ रजि़या सज्जाद ज़हीर और भीष्मजी की पत्नी शीलाजी एक ही जगह काम करती थीं और मैं अपनी माँ को लेने शाम को स्कूल से उनके दफ़्तर आ जाती थी और भीष्म चचा शीला चची को। कभी-कभी हमें इंतज़ार करना होता था तो हम वहीं एक कैंटीन ‘दोस्ती’ में बैठकर इंतज़ार करते थे जो कभी-कभी लंबा हो जाता था। लेकिन भीष्म चचा को कभी खीझते या नाराज़ होते नहीं देखा। नौकरी और काम से फारिग होने के बाद शीलाजी और भीष्म चचा एक पल के लिए भी अलग नहीं होते थे।
नूर ने बताया कि जब मेरे अब्बा सज्जाद ज़हीर का मॉस्को में इंतकाल हो गया तब वे लेखकों का एक अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल के अध्यक्ष बनकर गए हुए थे। उसमें भीष्म चचा भी थे। जब वे नहीं रहे तो भारत से ख़बर भेजी गई कि अब जब सज्जाद ज़हीर नहीं रहे तो उस प्रतिनिधिमंडल को भीष्म जी नेतृत्व दें। यह बहुत बड़ा सम्मान था लेकिन भीष्म चचा ने कहा कि नहीं, मैं सज्जाद ज़हीर के पार्थिव शरीर के साथ भारत जाना ज़्यादा ज़रूरी समझता हूँ, और वे आये।
भीष्म साहनी के नाटकों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ नाटक से यह संदेश प्राप्त होता है कि देवताओं का मानवीकरण ज़रूरी है और तत्पश्चात् देवताओं के कार्यों की मनुष्यों द्वारा समीक्षा होनी चाहिये।
कार्यक्रम का संचालन सतना इकाई के अध्यक्ष संतोष खरे ने किया और आभार प्रदेश सचिव मंडल के सदस्य बाबूलाल दाहिया ने व्यक्त किया। उपरांत भीष्म साहनी अभिनीत फि़ल्मों और उनके साक्षात्कारों के विनीत तिवारी द्वारा चुने गए अंषों का प्रोजेक्टर द्वारा प्रदर्षन किया गया जिसमें साथ-साथ टिप्पणियों के माध्यम से उन्होंने बताया कि बलराज साहनी और भीष्म साहनी ने कभी भी मनुष्य की गरिमा से नीचे जाने वाले किरदार नहीं निभाये। उन्होंने भीष्म साहनी व बलराज साहनी के इप्टा व प्रलेसं से जुड़ने और बाद तक जुड़े रहने के खतरे उठाने के अनेक अल्पज्ञात प्रसंगों को सुनाया जिन्होंने सभागार में उपस्थित लोगों को गहराई से स्पर्श किया। इसी अवसर पर वेनेज़ुएला के दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज़ की क्रांति के अनुभवों पर आधारित अंग्रेजी पुस्तक ‘दि ब्ल्यू बुक’ का विमोचन भी महेश कटारे, देवीशरण ग्रामीण, सुश्री नूर ज़हीर, विनीत तिवारी, हनुमंत शर्मा और संतोष खरे द्वारा किया गया। देवीषरण ग्रामीण की नवीन पुस्तक ‘नई राह’ का विमोचन भी सुश्री नूर ज़हीर और महेष कटारे द्वारा किया गया।
कार्यक्रम में सतना इकाई के संरक्षक श्री देवीशरण ग्रामीण एवं सदस्य बाबूलाल दाहिया, रामनारायण सिंह राना, मोहनलाल रैकवार, श्रीमती निर्मला सिंह परिहार, धर्मेन्द्र सिंह परिहार, गोरखनाथ अग्रवाल, रामयश बागरी, अनिल अयान, रामदास गर्ग, राजेन्द्र श्रीवास्तव, मुन्नी गंधर्व, वंदना अवस्थी दुबे, श्रीमती इश्मत जैदी (शिफा), डॉ. वेदप्रकाश सिंह, श्रीमती नीलू जायसवाल, रामशैल गर्ग, विष्णुस्वरूप श्रीवास्तव, आदित्य प्रताप सिंह, शैलेन्द्र सिंह परिहार, र
विशंकर चतुर्वेदी, तेजभान सिंह चौहान, डॉ. राजन चौरसिया, सतेन्द्र पाण्डेय, अरूण त्यागी, छोटेलाल पाण्डेय और बड़ी संख्या में अन्य श्रोता उपस्थित रहे। सतना के साहित्य रसिकों के लिए ये शाम भीष्म साहनी की यादों के साथ यादगार रही।
-संतोष खरे