माँ तुझे सलाम
अपने शौहर की बेवक्त मौत के बाद सिर्फ 27 बरस के सिन में दूसरी शादी से साफ इनकार करने के बाद अपने चार बच्चों की परवरिश और पढ़ाई में अपना जीवन तज देने वाली उस फूल जैसी क़द काठी वाली औरत के पास लोहे का जिगर था
नौकरों और ख़ानसामों के बीच बेगम साहिबा पुकारी जाने वाली वो औरत शौहर की मौत के बाद अपने बच्चों की पढ़ाई और परवरिश के लिए दर दर भटकी।
शौहर की मौत के बाद 1973 में बीए और फिर बीएड करने के दौरान एक प्राईवेट स्कूल में सिर्फ 150 रुपए माहवार की तनख़्वाह पर अपने चार बच्चों का बीड़ा उठाया ये रक़म 1980 में 700 रूपए और 1986 में 1800 रुपए तक पहुँची। इस समय तक लोहे के इरादों वाली ये औरत अपने 4 बच्चों को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ा रही थी जहाँ 350 रुपए के हिसाब से 1400 महीने का ख़र्च देकर ख़ुद 400 रुपए महीने में गुज़रा कर रही थी....इस दौरान एक अकेली औरत पर क्या क्या मरहले गुज़रे होंगे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं...पर अपने बच्चों को सीने से लागाए वो औरत हर मंज़िल का सामना करती गई और जब बच्चों को पढ़ने भेजा तो ख़ुद भूखे रह कर बच्चों का ख़र्च वहन किया...
तनख़्वाह कुछ बढ़ी तो ख़र्चा उसका दो गुना बढ़ा पर उस औरत का हौसला चार गुना बढ़ रहा था...अपने बच्चों को कुछ बना देने की लगन और अपनी ज़िम्मेदारी निभाने का जुनून इस क़दर था कि तंगी के ज़माने में पैसे बचाने के लिए पाँच किलोमीटर पैदल चल कर स्कूल से धर पहुँचती थी
रोज़ रात एक कप दूध के साथ सुलाने और सुबहें की चाय से बच्चों को जगाने वाली उस औरत ने अपनी सेहत के लिए कभी नहीं सोचा।
बारिश की तूफ़ानी रात में कड़कती बिजली की आवाज से सहमें बच्चों को ख़ुद में समेटे और गर्मी की रातों में बिजली जाने पर देर तक जग कर अपने बच्चों पर पंखा झलने वाली वो जाँबाज़ औरत सुबह उठ कर बच्चों का नाश्ता तैयार करती तो दोपहर के लिए दाल और चावल बनाना नहीं भूलती थी...
संघर्ष के दिनों अगर कोई उस औरत के साथ खड़े रहे तो वो थे उसके पिता जो अपने बच्चों में समान शिक्षा पर विश्वास करते थे। दामाद की मौत के बाद अपनी बेटी को बच्चों की परवरिश के लिए पढाई पूरी करने और फिर सरकारी नौकरी हासिल करवाने में एक ज़िम्मेदार बाप की भूमिका उन्होंने निभाई।
बहरहाल समय का पहिया घूमा तो कभी बच्चों की तरक़्क़ी पर ख़ुश हूई तो कभी उनकी की जाती ज़िंदगी की उलझनों में वो भी बराबर उलझी रहीं... हर बच्चे की परेशानी को दिल पर लिया और जो बन पड़ा किया और नहीं कर पाई तो ग़मज़दा रहीं .....
आज से चंद रोज़ पहले वो खुद्दार औरत दुनिया को विदा कह गई पर दुनिया के सामने रख गई ऐसी नजीर जो ताक़यामत ज़िंदा रहेगी
ना जाने किस मिट्टी की बनी ये औरत मेरी माँ थी....
बहुत कुछ लिखने का दिल है हर लम्हा हर वो पल लिखना चाहता हूँ जहाँ जहाँ से मेरी माँ गुज़री वो...मरहले लिखना चाहता हूँ जिनका सामना मेरी फूल जैसी माँ ने चट्टान बन कर किया... वो महीने के आख़री दिन लिखना चाहता हूँ जब राशन उधार आता था और वो दिन भी जब माँ के चेहरे की शिकन उनकी माली हालात की चुग़ली करती थी...पर उँगलियाँ साथ नहीं दे रहीं शायद मरने के बाद भी उनकी ख़ुद्दारी मेरी उँगलियों पर ग़ालिब है...
मम्मी जो आपके दूध क़र्ज़ नहीं चुका सकते वो आपकी अथक मेहनत का क़र्ज़ कैसे चुकाएँगे...
आपके लिए हर हर्फ़ बौना नज़र आ रहा है मम्मी....खुदा हाफ़िज़ !!!!!!!
सैयदेन ज़ैदी
सैयदेन ज़ैदी, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, उनकी फेसबुक वॉल से साभार।