मुलायम का अखिलेश को दो-टूक : आडवाणी बनने के लिए तैयार नहीं
मुलायम का अखिलेश को दो-टूक : आडवाणी बनने के लिए तैयार नहीं
मुलायम का अखिलेश को दो-टूक : आडवाणी बनने के लिए तैयार नहीं
महॆंद्र मिश्र
नई दिल्ली। नेता जी ने आज सपा की बैठक समस्या सुलझाने के लिए बुलाई थी। लेकिन सुलझने की जगह वह और उलझ गई है। और वैसे भी समस्याएं खुले मंच से नहीं सुलझती हैं।
इतने परिपक्व नेतृत्व का यह बचकाना फैसला ही कहा जा सकता है। क्योंकि सच यह है कि समस्याएं ऊपर से सुलझती हैं। सड़क पर सिर्फ लड़ाइयां होती हैं। लेकिन इस लड़ाई के पहले दौर में एक प्रयास नेता जी ने बंद कमरे की बैठकों में की थी।
हालांकि अखिलेश दिल्ली की उस चर्चित बैठक में शामिल नहीं हुए थे। बाद में कुछ मान मनौव्वल और समझौतों के जरिये चीजों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश जरूर की गईं। लेकिन रामगोपाल के खुले पत्र और शिवपाल की फिर सरकार से बर्खास्तगी की घटना के बाद संघर्ष का दूसरा दौर शुरू हो गया।
और यह सब कुछ सार्वजनिक तौर पर हो रहा था।
ऐसे में मुलायम सिंह का सार्वजनिक बैठक बुलाना और खुले मंच से ऐलान एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है।
इसके जरिये उन्होंने खुले तौर पर अपनी मंशा जाहिर कर दी है। वह अभी आडवाणी बनने के लिए तैयार नहीं हैं। और आखिरी तौर पर कमान उनके हाथ में ही रहेगी। और अखिलेश को जिन लोगों से एतराज है उन्हें भी वो छोड़ने नहीं जा रहे हैं। हां अपनी विरासत के तौर पर वह जरूर अखिलेश को देखते हैं। लेकिन उन्हें भी सबको लेकर चलना होगा। या फिर अनुशासन की हद में रहना होगा।
दरअसल उन्होंने फैसला एक मूल्यांकन पर पहुंचने के बाद किया है।
लगता है कि वह इस नतीजे पर पहुंच गए हैं कि अखिलेश की तमाम अच्छाइयों और उनकी बेहतर छवि और युवा जोश और विकास के एजेंडे के बाद भी वह 2017 का चुनाव जीतने नहीं जा रहे हैं। ऐसे में एक दूसरी राह लेनी होगी। जिसमें सभी लोगों को साथ करना होगा। और एक बड़े गठबंधन की संभावनाओं की तलाश कर उसे खड़ा करना होगा। जो जनता में जीत की उम्मीद नहीं बल्कि भरोसा पैदा कर सके।
यह सब कुछ एक प्रक्रिया में सबको साथ रखते हुए भी हो सकता था। लेकिन शायद अखिलेश अब स्वतंत्र कमान चाहते हैं।
यह बात सही है कि अखिलेश अपनी छवि को लेकर खासे सचेत रहते हैं और इसका उन्हें लाभ भी मिला है। इसके चलते पार्टी के कुछ नेताओं से उनका सीधा अंतरविरोध है। लेकिन यही बात इस झगड़े की जड़ है। यह समझना मामले का सरलीकरण करना होगा।
सत्ता की यह लड़ाई मूल रूप से परिवार के अंदरूनी संघर्ष का नतीजा है।
अखिलेश जो रास्ता अपना रहे थे उसमें मुलायम सिंह और शिवपाल के सामने अस्तित्व का संकट था। पार्टी पर अखिलेश के जरिये चचेरे भाई राम गोपाल का कब्जा होता दिख रहा था, क्योंकि अखिलेश के चाणक्य रामगोपाल ही हैं। और उनकी भी डोर अमित शाह से बंधी हुई थी।
दरअसल यादव सिंह प्रकरण में अपने बेटे अक्षय का नाम आने के बाद रामगोपाल सीधे घिर गए थे। और पूरी तरह से उनका परिवार सीबीआई के चंगुल में था। और उसी दबाव में बीजेपी अब तक समय-समय सपा से मनमुताबिक फैसले करवाती रही है।
बिहार चुनाव में महागठबंधन टूटा तो भी वही कारण था। यूपी में लगातार बीजेपी के सामने सरकार का समर्पण उसी का हिस्सा है। और एक स्थिति के बाद जब नेता जी को लग गया कि इस रास्ते से न तो वह अपना बेटा बचा पा रहे हैं और न ही अपनी पार्टी को कब्जें में रख पाएंगे। उन्होंने सीधे-सीधे रामगोपाल पर निशाने पर ले लिए। और उन्हें पार्टी से अलग कर दिया। इससे वह बीजेपी के तमाम दबावों से मुक्त हो जाएंगे। और उसके खिलाफ एक बड़ा गठबंधन बनाते हुए सत्ता भी हासिल कर सकते हैं।
2017 में अगर नहीं तो 2019 में उसका फायदा उठाया जा सकता है।
अब गेंद अखिलेश के पाले में है।
हालांकि 15 मिनट के अपने भाषण में अखिलेश ने अपनी स्थिति जरूर स्पष्ट कर दी है। और वह है एक स्वतंत्र हैसियत की मांग। जिसमें सरकार चलाने से लेकर अगले चुनाव में टिकटों का बंटवारा दोनों शामिल हैं। अभी कम से कम यह मांग पूरी होती नहीं दिख रही है। और शिवपाल से अखिलेश के गले मिलने के बाद दोनों पक्षों के बीच जो नजारा सामने आया है वह एक दूसरे रास्ते की तरफ भी इशारा करता है।
अनायास नहीं नेता जी को पूरा सम्मान देते हुए अखिलेश का सुर बागी ही था। लेकिन विडंबना यह है कि लोहिया जिस परिवारवाद के खिलाफ लड़ रहे थे। उनकी विचारधारा की दुहाई देने वाले उसी में आकर फंस गए हैं। वह पार्टी के लोकतांत्रिक संचालन में यकीन करते थे। लेकिन यहां परिवार ही पार्टी है। बाकी सब मूकदर्शक।


