‘राजधर्म’ के निर्वहन की चुनौती
‘जिनके घर शीशे के होते हैं, वह दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते।’ हिन्दी फिल्म का यह मसहूर संवाद आज मोदी सरकार पर पूरी तरह चरितार्थ हो रहा है। लोकसभा चुनावों में यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार को अपनी जीत का हथियार बनाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज खुद उसी सत्ता रूपी ‘शीशे’ के घर में बेचैन और परेशान नजर आ रहे हैं। हर विषय पर अपने ‘मन की बात’ रखने वाले प्रधानमंत्री ललित मोदी प्रकरण पर मौन साधे हुए हैं। भाजपा और संघ दोनों ही इस मसले पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ खड़े होने की जिद दिखा रहे हैं। आईपीएल की तर्ज पर ही ललित मोदी भारतीय राजनीति का आनंद ले रहे हैं। एक के बाद एक ट्विट की गुगली से भारतीय राजनीति के पिच पर भ्रष्टाचार के मैच का रोमांच बढ़ाने में लगे हुए हैं।
भ्रष्टाचार के सवाल पर दंभ भरते हुए नरेंद्र मोदी कहा करते थे कि ‘न खाऊंगा और न खाने दूंगा’ की उनकी प्रतिबद्धता अब कहां है? कांग्रेस नीति यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार से परेशान जनता ने शुचिता के विकल्प के रूप में मोदी पर भरोसा जताया। इस वक्त प्रधानमंत्री की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि अपनी सरकार में ईमानदारी और राजनीतिक शुचिता से जुड़ी प्रतिबद्धता को सिद्ध करें। आज फिर एक बार ‘राजधर्म’ के निर्वहन की चुनौती सामने है। जनता नरेंद्र मोदी को एक मजबूत प्रधानमंत्री के रूप में देख रही है, तो फिर ललित मोदी प्रकरण पर यह कैसी मजबूरी?
निजी तौर पर ईमानदार होते हुए भी लोग पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मजबूरी को समझते थे, पर नरेंद्र मोदी के साथ तो ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। ललित मोदी प्रकरण पर प्रधानमंत्री, भाजपा और संघ जिस तरह की चालाकी दिखा रहे हैं, भ्रष्टाचार के मसले पर यही सब चालाकी यूपीए सरकार के दौरान कांग्रेस और उनके रणनीतिकारों ने भी दिखाई।
कांग्रेस और यूपीए सरकार की चालाकियों का परिणाम पूरे देश ने शर्मनाक हार के रूप में देखा। नीति और नैतिकता के आधार पर चाल, चरित्र और चहरे की बात करने वाली भाजपा और उसका सरंक्षक संघ परिवार भ्रष्टाचार के सवाल पर कांग्रेस जैसे ही कुतर्क और उसी जैसी हठधर्मिता का परिचय देनें लगा हुआ है। यह जनता के साथ किए गए वादे के नाम पर खुली धोखाधड़ी है।
लोकतंत्र के इस सच को भी याद रखना होगा कि सत्तामद में लोक की अवहेलना चुनावों में भारी पड़ जाती है। ललित मोदी ने अपने नए ट्विट में प्रधानमंत्री मोदी को काबिल शख्स की संज्ञा दी है। प्रधानमंत्री को लेकर ललित मोदी ने अपने ट्विट में क्रिकेट के रूपक को अपनी भाषा बनाया है, वह वक्रोक्ति लिए हुए है। देश की जनता ने नरेंद्र मोदी की काबलियत पर ही तो अपना भरोसा जताया। जनता प्रधानमंत्री उसी काबलियत के दर्शन करना चाहती है। जहां नीर-क्षीर विवेक की तरह दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए। देश की जनता और विपक्ष इस वक्त प्रधानमंत्री ओर मुंह बायें खड़ी है, ऐसे में प्रधानमंत्री चुप्पी रहस्य को गहरा रही है।
कभी भाजपा के थिंक टेंक रहे गोविदाचार्य ने भी मोदी सरकार पर तंज भरे अंदाज में कहा है कि सरकार बहुमत से नहीं साख से चलती है। गोविंदाचार्य की बात अपनी जगह एकदम सटीक है। इस वक्त प्रधानमंत्री, भाजपा और संघ के सामने साख का सवाल है। वसुंधरा राजे और सुषमा को लेकर भाजपा ने इस्तीफा न लेने की रणनीति तय की है। जबकि खुद ललित मोदी वसुंधरा राजे के सहयोग को स्वीकार कर रहे हैं। बकौल ललित मोादी - ‘नहीं, वो तो खुलकर मदद करने के लिए तैयार हुईं लेकिन दुर्भाग्य से जब मामला ट्रायल में पहुंचा, वे मुख्यमंत्री बन चुकी थीं, इसलिए वे गवाही के लिए नहीं आ सकीं। जो बयान उन्होंने दिया वो अदालत के रिकॉर्ड में हैं।’
भाजपा यह क्यों भूल रही है कि सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे के ललित मोदी से जिस तरह के पारिवारिक रिश्ते उजागर हुए है और उन्हें लेकर मीडिया में जो बहस चल रही हैं और नए तथ्य सामने आ रहे हैं, वह और भी नए सवाल उठा रही हैं। वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत के ललित मोदी के साथ कारोबारी रिश्ते, सुषमा और वसुंधरा की सिफारशी पत्र सब कुछ लिखित-पढ़त में है और दूसरा ललित मोदी ने सियासी जमात में अपने मित्रों और उनसे मुलकात की लंबी फेहरिश्त का भी खुलासा किया है। प्रियंका गांधी और राबर्ट वाड्रा से भी मुलाकात का भी जिक्र किया है। कांग्रेस और प्रियंका ने इस मुलाकात को सिरे से नकार दिया है, तब प्रधानमंत्री के लिए अपने वचन ‘न खाऊंगा और न खाने दूंगा’ की पुष्टि के लिए जांच करानी चाहिए । यह निर्णय प्रधानमंत्री और उनकी सरकार की साख को बढ़ाने का ही काम करेगा।
प्रधानमंत्री को जनता के सामने ललित मोदी प्रकरण पर एक बार तो अपने ‘मन की बात’ रखनी चाहिए। याद रहे कांग्रेस और यूपीए सरकार के लिए कोल स्कैम अभिशाप ही बन गया जो भाजपा और मोदी के लिए वरदान साबित हुआ। कल शीशे के जिस घर में कांग्रेस थी आज उसी शीशे के घर में भाजपा बैठी है। कल जो पत्थर भाजपा के हाथ में आज वही पत्थर कांग्रेस और विपक्षियों के हाथों में है।
विवेक दत्त मथुरिया
विवेक दत्त मथुरिया, लेखक कल्पतरू एक्सप्रेस में सहायक संपादक हैं।