मोदी बनाम राहुल बनाम केजरीवाल बाकी सब कंगाल !
मोदी बनाम राहुल बनाम केजरीवाल बाकी सब कंगाल !
'झाड़ू' से उम्मीद सब करने लगे हैं।
श्रीराम तिवारी
इन दिनों दिल्ली में आम आदमी पार्टी की 'आंशिक' सफलता से बहुत सारे नर-नारी,पढ़े -लिखे युवा-छात्र नौजवान अति उत्साहित हैं। कुछ वे लोग भी गदगदायमान हैं जिन्हें जनता के इन्हीं सवालों को लेकर देश में निरंतर चल रहे प्रगतिशील आंदोलन, वामपंथी ट्रेड यूनियन आन्दोलनों और विभिन्न सामाजिक-आर्थिक सांस्कृतिक -साहित्यिक और देशभक्तिपूर्ण -जनसंघर्षों की जानकरी ही नहीं है। इनके अलावा कुछ वे भारतीय भी 'आप' से ज़रा ज्यादा ही आशान्वित हैं जो सोचते हैं कि भ्रष्टाचार,महंगाई तथा व्यवस्था परिवर्तन के शाश्वत सवालों को केवल अण्णा हजारे नुमा अनगढ़ अनशनों या 'आप' के विचारधाराविहीन राजनैतिक हस्तक्षेपों के प्रयोग से ही हल किया जा सकता है। वर्तमान राजनैतिक प्रहसन और तदनुरूप विडंबनाओं पर व्यंग्य करते हुए मेरे मित्र 'प्रेम -पथिक' ने मोबाइल पर सन्देश भेजा है :-
फूल भी अब शूल से लगने लगे हैं। …
हाथ के नाखून भी चुभने लगे हैं। ...
गंदगी का राज है चारों तरफ तो,
'झाड़ू' से उम्मीद सब करने लगे हैं।
अपने अल्पज्ञान और सामान्य बुद्धि के वावजूद मैनें भी विगत वर्ष- यूपीए सरकार की विनाशकारी आर्थिक नीतियों, कांग्रेस के भ्रष्टाचार और उसकी संगठनात्मक खामियों, भाजपा और नमो के ढपोरशंखी दिशाहीन दुष्प्रचार तथा अण्णा हजारे -स्वामी रामदेव जैसे अगम्भीर और 'टू इन वन' खंडित हस्तक्षेप.कॉम पर निरंतर प्रकाशित भी होता रहा है। अभी भी जस का तस संग्रहीत है। इसका उल्लेख मैं इसलिए नहीं कर रहा हूँ कि उसमें मेरा वह अनुमान या आकलन सही साबित हुआ है जो ये बताता है कि दिल्ली<राज्य> में न तो कांग्रेस की सरकार होगी और न ही भाजपा की। बल्कि इसका उल्लेख इस संदर्भ में प्रासंगिक है कि मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा इस बहुलतावादी देश की जन-आकांक्षाओं को केवल 'दिल्ली मेड' राजनैतिक घटनाओं के आधार पर परिभाषित करने पर तुला हुआ है। कुल मिलाकर लब्बो लुआब वही सामने खड़ा है कि नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी बनाम केजरीवाल बाकी सब कंगाल !
बेशक मीडिया और जन-विमर्श के केंद्र में इन दिनों नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और केजरीवाल शिद्दत से विराजे हैं। देश के राजनैतिक, आर्थिक, सामजिक, जातीय, भाषायी और व्यवस्थागत ढांचे पर विहंगम दृष्टिपात के उपरान्त कोई भी सामान्य बुद्धि का भारतीय नागरिक भुजा उठाकर घोषणा कर सकता है कि ये तमाम सूचना तंत्र पथभ्रष्ट और दिग्भ्रमित हो रहा है या जानबूझकर किया जा रहा है। यह सच है कि देश में गैर कांग्रेसवाद और गैर भाजपावाद का दौर अभी भी जारी है। किन्तु उससे भी बड़ा सच ये है कि इन दोनों ही बड़ी पार्टियों के बिना देश की स्थिरता और पूंजीवादी प्रजातांत्रिक राजनीति चल भी नहीं सकती। उससे भी बड़ा सच ये है कि ये दोनों ही बड़ी पार्टियां-कांग्रेस और भाजपा देश की बर्बादी का कारण हैं। इसलिए जनता इनसे छुटकारा चाहती है। अतः यह स्वयं सिद्ध है कि आगामी लोक सभा चुनाव-2014 में भाजपा,कांग्रेस भले ही लाख कोशिश कर लें किन्तु उनके घोषित चेहरे मोदी और राहुल 'पी एम् इन वेटिंग' ही रहेंगे। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होकर जिस तरह दिल्ली विधान सभा में विपक्ष में सुशोभित है उसी तरह लोक सभा में भी शोभायमान होगी। कांग्रेस की सम्भावनाओं पर तो मनमोहन जी कब का पानी फेर चुके हैं।
अपने हम सोच मित्रों और आलोचकों को यह एतद द्वारा शिद्दत के साथ सूचित किया जाता है, ताकि वक्त पर <मई-2014 के बाद कभी भी> काम आवे, कि आगामी लोकसभा चुनाव मई-2014 में बनने जा रही नई सरकार का नेतत्व् न तो नरेद्र मोदी कर सकेंगे और न ही राहुल गांधी ! केजरीवाल और 'आप' तो कदापि नहीं ! यह भी लगभग तय है कि बड़े-बड़े दलों के नेता शायद ही ये ये पद हासिल कर सकें ! बेशक केजरीवाल का ये कहना कि मैं लोक सभा का चुनाव नहीं लडूंगा कोई मायने नहीं रखता। तात्कालिक रूप से भले ही वे अपने आप को इस लोक सभाई चुनाव एरिना से बाहर समझें। किन्तु जब आगामी लोक सभा चुनाव-2014 में परिस्थतियां उन्हें बाध्य करेंगी तो अपनी सम्भावित विराट भूमिका से वे बच नहीं सकेंगे। खुद न सही किसी और बेहतर चहरे को समर्थन देकर वे अपनी राजनीति जारी रख सकते हैं। सवाल उठता है कि भारत का आगामी प्रधानमंत्री कौन होगा? आसान सा जबाब है कि संसद में जिस 'गठबंधन' का बहुमत होगा उसका सर्वाधिक पसंदीदा उम्मीदवार भारत का प्रधान मंत्री होगा। चूँकि एनडीए, यूपीए को भाजपा और कांग्रेस लीड कर रहे हैं और देश की जनता इनसे छुटकारा चाहती है इसलिए जो इन दोनों गठबंधनों में नहीं हैं वे छोटे-छोटे दल, वाम मोर्चा और 'आप' जैसे नवोदित दल एका कर सकते हैं और देश को बेहतर सरकार और एक अच्छा प्रधानमंत्री दे सकते हैं। केजरीवाल भी विकल्प हो सकते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे चुनाव लड़ेंगे या नहीं, उनके पास नीतियां और कार्यक्रम है या नहीं।
जब बिना चुनाव लड़े ही विनाशकारी नीतियों और पूँजीवादी कार्यक्रमों को लागू कर डॉ. मनमोहन सिंह दस साल तक लगातार भारत के प्रधान मंत्री रह सकते हैं, इंद्रकुमार गुजराल प्रधान मंत्री हो सकते हैं, बिना नीतियों और कार्यक्रमों के चंद्रशेखर प्रधानमंत्री हो सकते हैं, तो'आप'के केजरीवाल, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव देश के प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकते ? वाम मोर्चे बनाम तीसरे मोर्चे के प्रकाश कारात, सीताराम येचुरी, ए वी वर्धन, समाजवादी शरद यादव नीतीश कुमार, मुलायम सिंह प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकते ?जबकि इनके पास शानदार नीतियां और बेहतरीन कार्यक्रम और राजनैतिक अनुभव भी हैं। अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गज बीजद के नवीन पटनायक, बसपा की माया, एएआईडीएमके की जयललिथा या कोई विख्यात हस्ती ब्यूरोक्रेट प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकते ?
बेशक कांग्रेस के राहुल गांधी का प्रधान मंत्री बन पाना अभी तो सम्भव नहीं है किन्तु सैम पित्रोदा - नंदन नीलेकणि या मीरा कुमार को पेश कर कांग्रेस अपनी प्रासंगिकता बरकरार रख सकती है। लेकिन भारतीय मीडिया की यह कोई राष्ट्रीय मजबूरी नहीं है कि केवल मोदी बनाम राहुल की ही नूरा कुश्ती पेश करता रहे या 'आप' के अनुभवहीन नेताओं-मंत्रियों के पीछे हाथ धोकर पड़ा रहे। और भी हैं जमाने में दीदावर जो खिलने को तैयार बैठे हैं। बशर्ते देश की वास्तविक राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, क्षेत्रीय, भाषाई और सांस्कृतिक बहुलतावादी तस्वीर पर मीडिया की नज़रे-इनायत का जज्बा हो।
अण्णा हजारे के नेतृत्व में विगत वर्ष रामलीला मैदान में सम्पन्न अनशन कार्यक्रम तक मैं अरविन्द केजरीवाल को भी 'खलनायक' श्रेणी में ही गिनता था। किन्तु जब अनशनकारियों को लगभग चिढ़ाने वाले अंदाज में कहा गया कि - "हिम्मत है तो राजनीति में आओ! चुनाव लड़कर-जीतकर दिखाओ! केवल रामलीला मैदान या जंतर-मंतर पर नौटंकी से जन-लोकपाल नहीं बनने वाला, केवल 'इंकलाब -जिंदाबाद' या 'भारत माता की जय' के नारे लगाने से क्रांति सम्पन्न नहीं होने वाली। आदर्श की बातें करना और राज-काज चलाना दोनों में जमीन -आसमान का फर्क है”…! वगैरह-वगैरह।


