नई दिल्ली। भारत की कम्युनिस्ट (मार्क्सवादी) ने कहा है कि बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को बिहार की जनता ने हरा कर नरेंद्र मोदी-अमित शाह द्वारा चलाए जा रहे सांप्रदायिक अभियान को खारिज कर दिया है, साथ ही अल्पसंख्यकों के आरक्षण वाले मुद्दे, लोगों के खाने-पीने के मुद्दे को भी बिहार की जनता ने सिरे से नकार दिया है।
माकपा की केंद्रीय समिति की दिल्ली में संपन्न बैठक में कहा गया कि पूरे देश में सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ाई को मजबूत करना चाहिए। संयुक्त वाम भाकपा सहित सीपीआई(एम) और भाकपा (एमएल) द्वारा चलाए जा रहे अभियान का बिहार के लोगों ने स्वागत किया है। भाकपा (एमएल) ने बिहार चुनाव में तीन सीटों पर जीत भी हासिल की।
माकपा केंद्रीय समिति ने पंजाब में बढ़ रहे अशुभ राजनीतिक गतिविधियों, जो कि राज्य में शांति औऱ सदभाव में खलल डाल रही हैं, पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। पार्टी ने कहा कि गुरु ग्रंथ साहिब का अनादर और सिख समुदाय के लोगोँ द्वारा उग्र प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस फायरिंग में दो सिख युवकों की हुई हत्या के आरोपियों को पकड़ने में बादल सरकार नाकाम रही है।
पार्टी ने कहा है कि मोदी सरकार आर्थिक नीतियों पर भी पूरी तरह विफल हो गई है। सरकार ने मंत्रिमंडल की अनुमति लिए बगैर इन क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लाने की घोषणा की है, यह घोषणा ऐसे समय में की है जब संसद का शीतकालीन सत्र अगले सप्ताह से शुरू होने वाला है। इस तरह मोदी सरकार ने मंत्रिमंडल और संसद दोनों की अवहेलना की है।

एफडीआई है लूट का लाइसेंस
सरकार के एकदर्जन से ज्यादा क्षेत्रों में एफडीआई की अनुमति दिए जाने पर पार्टी ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि विदेशी पूंजी को बढ़ाने के लिए यह लूट का लाइसेंस उस समय दिया गया है जब भारत की अधिकतर जनता नए आर्थिक बोझ के नीचे कराह जारी है। आवश्यक वस्तुओं की वृद्धि बेरोकटोक जारी है। भारत के लोगों की पहुंच से 'दाल' की कीमतें बहुत दूर जा रही है औऱ भी कई राशन-पानी की चीजें दिन-प्रतिदिन महंगी होती जा रही है। कृषि संकट गहरा होता जा रहा है। घोषणा की न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ रही है इसलिए किसान उत्पादन लागत को कवर नहीं कर पा रहे हैं। जिसके कारण किसान आत्महत्याओं कर रहे हैं।

जनता का मुख्य भोजन दाल रोटी आम लोगों की पहुंच से दूर
पार्टी का कहना है कि ताजा आंकड़ों में विकास दर पिछले महीने की तुलना में 6.4 फीसदी से औद्योगिक उत्पादन सूचकांक अब 3.6 फीसदी तक गिर गया है। नतीजतन, विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर, नौकरियों की दर 6.9 प्रतिशत से 2.6 फीसदी गिर गया है। सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि इन शर्तों के तहत विदेशी पूंजी में स्वचालित रूप से संतुष्ट नहीं कर सकती। इसका कारण यह है कि भारत में तेजी से घरेलू मांग घट रही है। जनता का मुख्य भोजन दाल रोटी आम लोगों की पहुंच से दूर चला गया है तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी की गई है। रेलवे के किराए भी बढ़ रहे हैं। 'स्वच्छ भारत' के लिए कर लगाया गया है। ग्रामीण रोजगार गारंटी जैसी योजनाओं के माध्यम से थोड़ा जो कुछ भी राहत प्रदान किया जा रहा था, उसमें भी काफी कटौती की जा रही है।