भारतीय जनता पार्टी के नेताओं व उसके मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संगठन की छतरी के नीचे पनपने वाले संगठनों के नेताओं के बीच इस समय घृणा के बोल बोलने की प्रतियोगिता चल रही है। मोदी सरकार के शुरुआती छह महीने इस तरह की बयानबाजियों की भेंट चढ़ गए, इसके बावजूद भाजपा नेताओं का कहना है कि देश में विकास की बयार बह रही है।
हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान इस तरह के नफरत के बोल स्वयं नरेंद्र मोदी ने भी इस्तेमाल किए थे, लेकिन यह समझा गया कि चुनाव प्रचार के दौरान कटुता पैदा हो जाती है और उसका असर चुनाव के बाद देश के माहौल पर नहीं पड़ता। स्वयं प्रधानमंत्री ने भी 15 अगस्त को लाल किले की प्रचीर से अच्छी-अच्छी, मीठी-मीठी बातें की थीं।
कहा जा रहा था कि मोदी के लिए विहिप और बजरंग दल समस्याएं पैदा कर रहे हैं इसलिए निरंजन ज्योति को मोदी ने बढ़ावा दिया क्योंकि वे विहिप को ध्वस्त करना चाहते हैं। लेकिन आगरा का जबरन धर्मांतरण तो विहिप और बजरंग दल का ही उद्योग था। इसलिए यह तर्क गले नहीं उतरा।
वैसे भी मोदी की भाव-भंगिमा से साफ लग रहा था कि वे संसद् के दवाव में क्षमायाचना तो कर रहे हैं, लेकिन उन्हें भी कोई अफसोस नहीं है। जब मोदी यह कह रहे थे कि साध्वी पिछड़ी जाति की हैं, महिला हैं और ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं, इसलिए उन्हें क्षमा कर दिया जाना चाहिए, तब वह एक और राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश ही कर रहे थे।
देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सांप्रदायिक एजेंडा चलाने के विपक्ष के आरोपों पर जब संसद् में बहस हुई तो बहस का जवाब में संसदीय कार्य मंत्री एम वेंकैया नायडू ने कहा कि सरकार का एकमात्र एजेंडा ‘विकास’ है जिसके आधार पर उसने लोकसभा चुनाव लड़ा था। नायडू के इस वक्तव्य के बाद मीडिया में चर्चा शुरू हो गई कि मोदी तो विकास की राजनीति करना चाहते हैं लेकिन उनके सहयोगी ऊट-पटांग बयान देकर उनकी टांगें खींच लेते हैं।
पहली मर्तबा तो यह तर्क ठीक लगता है, लेकिन यह बहुत मासूम तर्क है। जो लोग भाजपा और आरएसएस के संबंधों को जानते-समझते हैं उनको इस खेल को समझने में कोई दुविधा नहीं है। मोदी भी स्वयंसेवक हैं और लाल किले की प्राचीर से उन्होंने जो घोषणा की थी कि वे प्रधान सेवक हैं उस घोषणा में (स्वयं) साइलेंट था। यह सारी पटकथा दरअसल मोदी जी के मातृ संगठन आरएसएस की ही लिखी हुई है और चाहे प्रधान (स्वयंसेवक) मंत्री हों या निरंजन ज्योति अथवा विहिप और बजरंगदल, ये सभी सियासी रंगमंच पर संघ की कठपुतलियां हैं। उपर से दिखाने के लिए भले ही यह संघ परिवार का अंदरुनी विवाद दिखता हो, पर ऐसा है हरगिज नहीं। दरअसल यह एक रणनीति है, जिसके तहत घृणित वक्तव्य दिलवाए जाते हैं और उसके बाद विवाद कराकर सांप्रदायिक उभार करके चुनावी माइलेज लेने के बाद माफी मांग ली जाती है। मसलन साक्षी महाराज ने कहा, 'गोडसे एक देशभक्त था। गांधीजी ने भी देश के लिए कई अच्छे काम किया।' हालांकि विवाद खड़ा होने के बाद साक्षी महाराज अपने बयान से पलट गए। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने गोडसे को कभी भी राष्ट्रभक्त नहीं बताया था।
साक्षी महाराज ने महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे के लिए जो कहा, वह सिर्फ वही कहा जिसकी उन्हें ट्रेनिंग मिली है। और अगर गोडसे संघ-भाजपा का आराध्य नहीं है, तो संघ-भाजपा खुलकर गोडसे के खिलाफ मैदान में क्यों नहीं आते? और इस बात को यूं भी समझा जा सकता है कि वैंकेया नायडू ने सदन में ताल ठोंकते हुए कहा कि उन्हें संघ की पृष्ठभूमि का होने पर गर्व है।.... और यह गर्व सिर्फ नायडू को ही नहीं है, यह गर्व अटल बिहारी वाजपेयी को भी था और मोदी को भी है, विहिप-बजरंग दल को भी है। फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि मोदी के सहयोगी उनकी टांग खींच रहे हैं। जाहिर है सब कुछ पूर्वनियोजित है और कहीं भी किसी भी स्तर पर संघ कबीले में कोई मतभेद नहीं है।
एक बात तो साफ है कि सांप्रदायिक उन्माद फैलाना संघ कबीले का एकमात्र एजेंडा है। तो मोदी जब प्रधान (स्वयं)सेवक हैं तो उनका एजेंडा सांप्रदायिक उन्माद फैलाना न होकर विकास कैसे हो सकता है? मोदी की हैसियत संघ कबीले में आरएसएस से ऊपर नहीं है, और जिस दिन मोदी ने यह गलतफहमी पालने की कोशिश भी की कि वे संघ से ऊपर हो चुके हैं, उसी दिन मोदी की हालत भी बलराज मधोक और आडवाणी जैसी हो जाएगी। इसलिए इस हेट स्पीच के कार्यक्रमों के पीछे मोदी को शामिल न मानना बड़ी भूल होगी।
यहां यह भी याद रखना होगा कि मोदी स्वयं भी प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अभद्र शब्दावली और हेट स्पीच का इस्तेमाल करते रहे हैं। जापान यात्रा के दौरान मोदी ने जो भाषा प्रयोग की वह निरंजन ज्योति की भाषा या सुषमा स्वराज की गीता के संदर्भ में टिप्पणी के नज़दीक ही है और तीनों का मकसद भी एक ही है।
मोदी ने कहा था, "आपको जानकर खुशी होगी कि मैं जापान के पीएम को गिफ्ट में देने के लिए गीता लेकर आया हूं। मुझे पता नहीं इस पर हिंदुस्तान में कितना विवाद होगा। सेक्युलर मित्र मेरे द्वारा गीता देने पर तूफान खड़ा कर देंगे। खैर, उनकी भी रोजी-रोटी चलनी चाहिए। लेकिन मेरे पास इससे बढ़कर देने के लिए कुछ नहीं। दुनिया के पास भी इससे बढ़कर पाने के लिए कुछ नहीं है।"
फिर मोदी स्वयं इस हेटस्पीच की जिम्मेदारी लेने से बचते क्यों हैं? इसको समझने के लिए एक बड़े अंग्रेजी अखबार ने जो खबर दी है उससे समझा जा सकता है कि कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज की पिछले शनिवार को बंद कमरे में एक मीटिंग हुई थी। इसमें इंडिया इंक के कुछ जाने-माने दिग्गजों ने यह सवाल पूछा कि क्या सरकार ग्रोथ तेज करने, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और नए इनवेस्टमेंट को प्रमोट करने के लिए वो कदम उठा रही है, जिनकी जरूरत है। इस मीटिंग की मीडिया को भनक नहीं लगने दी गई थी। मीटिंग में कई तल्ख कमेंट्स आए- ‘इस सरकार ने मायूसी के बाद उम्मीदों का दीया जलाया था, लेकिन अब मुझे लग रहा है कि यह आस टूट रही है।’ ‘मुझे लग रहा था कि शायद यह सरकार बोल्ड फैसले ले सकती है।’ ‘सरकार रियायतों पर जोर दे रही है, क्या उससे ग्रोथ को नुकसान नहीं पहुंचेगा?’ ‘भारत अभी भी ग्रोथ और टैक्स रिफॉर्म के मामले में पीछे है।’
दरअसल जिन औद्योगिक घरानों और कॉरपोरेट घरानों ने मोदी के चुनाव अभियान की फंडिंग की थी अब उनमें बेचैनी पैदा होने लगी है। इसलिए सरकार विवादों को पैदा करके इनकी आड़ में चुपके से कई कानून बदलने और कई कानून रद्द करने का खेल कर रही है। देश और संसद्, निरंजन ज्योति की अभद्र टिप्पणी और आगरा में जबरन धर्मांतरण पर बहस करती रह गई और इस बीच कई कानून समाप्त कर दिए गए पर कहीं कोई चर्चा नहीं हुई। देश की जनता को मालूम भी न पड़ा कि जो कानून समाप्त किए गए उनसे किसका हित साधन हो रहा है या वे कानून किनके हितों की रक्षा कर रहे थे।
और जहां तक विवाद पैदा करके माफी मांगने का सवाल है, तो यह भी सोची समझी रणनीति है। दरअसल उग्र हिंदुत्व और सांप्रदायिक उन्माद संघ का प्रमुख एजेंडा तो है लेकिन उसके इस एजेंडे से देश में कानून व्यवस्था की समस्या भी पैदा हो रही है। इससे कॉरपोरेट घरानों और विदेशी पूंजी में बेचैनी है कि कहीं ऐसा न हो कि इस उग्र हिंदुत्व के चलते कथित विकास कार्य बाधित हो जाएं। क्योंकि कानून व्यवस्था की समस्या पैदा होने पर पूंजी निवेश पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। इसलिए ही संघ दोहरी नीति पर चल रहा है, मोदी को पूंजीपतियों की सेवा में लगाकर विकास का एजेंडा घोषित किया जा रहा है और सांप्रदायिक उन्माद भड़काकर वोट बैंक पक्का किया जा रहा है।
O- अमलेन्दु उपाध्याय
अमलेन्दु उपाध्याय, लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक हैं व हस्तक्षेप.कॉम के संपादक हैं।