ये टूटी हुई शहतीरें बोलेंगी- किसान आन्दोलन और लेखकों की भूमिका
ये टूटी हुई शहतीरें बोलेंगी- किसान आन्दोलन और लेखकों की भूमिका
जनवादी लेखक संघ बाँदा किसान संवाद गोष्ठी - किसान आन्दोलन और लेखकों की भूमिका
आज समूची सभ्यता का संघर्ष बन चुका है, पूँजी के खिलाफ संघर्ष- निलय उपाध्याय
सरकारी नीतियों से किसानों को और जनसंचार से गावों को अलग कर दिया है नव उदारवादी आर्थिक नीतियों ने- उमाशंकर सिंह परमार
जड़ों की ओर लौटने का मतलब जड़ हो जाना नहीं- संतोष चतुर्वेदी
वास्तविक लेखन से ही वास्तविक चेतना को पहचाना जा सकता है-अवनीश मिश्रा
बाँदा। बुंदेलखंड में लगातार पड़ रहे सूखे और क़र्ज़ के कारण हो रही किसानों की मौत के मद्देनज़र जनवादी लेखक संघ बाँदा द्वारा चलाये जा रहे “किसान-संवाद” कार्यक्रम के तहत आयोजित गोष्ठियों की श्रंखला में डीसीडीऍफ़ परिसर बाँदा में परिचर्चा, कविता –पाठ, चित्र-प्रदर्शनी का आयोजन हुआ। परिचर्चा का विषय “किसान आन्दोलन और लेखकों की भूमिका” था। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि निलय उपाध्याय ने की एवं परिचर्चा में युवा कवि/ अनहद सम्पादक संतोष चतुर्वेदी, युवा कवि /आलोचक / पाखी के उपसंपादक अविनाश मिश्रा, वरिष्ठ चित्रकार कुंवर रवीन्द्र, जाने माने प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह, किसान नेता और समाजसेवी पुष्पेन्द्र भाई, बेल्जियम के किसान युगल किम और पीटर, वामपंथी विचारक सुधीर सिंह ने प्रतिभाग किया।
परिचर्चा आरम्भ होने के पूर्व जनवादी लेखक संघ बाँदा के पदाधिकारी केशव तिवारी, नारायण दास गुप्त, प्रदुम्न सिंह ने दिवंगत लोकधर्मी कवि मानबहादुर सिंह की शहादत का स्मरण किया एवं मुख्य अतिथि निलय उपाध्याय ने, जनवादी लेखक संघ बाँदा द्वारा प्रस्तावित “मानबहादुर स्मृति सम्मान” का विस्तृत मसौदा जारी किया। यह पुरस्कार “लोकधर्मी” कविता के लिए किसी कवि की एक रचना को प्रत्येक वर्ष दिया जायेगा। उपस्थित किसानों, लेखकों, एवं पत्रकारों के समक्ष पुरस्कार चयन कमेटी और व्यवस्थापन कमेटी के सदस्यों की घोषणा की गयी।
परिचर्चा का विषय प्रवर्तन करते हुए संचालक एवं जनवादी लेखक संघ बाँदा के सचिव उमाशंकर सिंह परमार ने कहा कि नव उदारवादी आर्थिक नीतियों ने सरकारी नीतियों से किसानों को और जनसंचार से गावों को अलग कर दिया है बाजारवादी सरोकारों के आगे जनसरोकारों की कोई अहमियत नहीं बची है सरकारी और पूँजी नियंत्रित माध्यमो में तो बिलकुल नहीं ऐसे में लेखको और कवियों का दायित्व और बढ़ जाता है की वह अपनी रचनाओं में पूँजी आधारित विभेदों और सजिशों का खुलासा करें। आज जरुरत है कि हम गाँव से लेकर शहरों तक जिल्लत की जिंदगी जी रहे श्रमजीवी समुदाय से उन्हीं की भाषा में उन्हीं के बीच जाकर संवाद करें।
परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए युवा कवि और अनहद सम्पादक संतोष चतुर्वेदी ने निलय की कविता उद्धृत करते हुए कहा कि जड़ों की ओर लौटने का मतलब जड़ हो जाना नहीं है अपितु जो जड़ है उसे चेतन कर देना है। हम यदि गाँव लौटने की बात करते हैं तो हमारा आशय है की मजदूरों और किसानों को विश्व व्यापी लड़ाई के लिए तैयार कर रहे हैं जब तक कविता गाँव के खेतों और खलिहानों तक नहीं पहुंचेगी तब तक कविता भी अपना वजूद स्थापित नहीं कर सकेगी। यदि हम कविता बचाना चाहते हैं तो हमें जड़ों की ओर लौटना होगा हमें फिर अपनी प्रतिबद्धता को पहचानना होगा।
दिल्ली से आये युवा कवि /आलोचक, अविनाश मिश्रा ने कहा की असली कविता वही है जो विशाल जनसमुदाय का प्रतिनिधित्व करती है। हमें प्रतिबद्ध लेखन के साथ-साथ कविता के छद्म को भी पहचानना होगा वो लोग जो स्वभाव से ही अभिजन हैं वो कभी किसानों का वास्तविक खाका नहीं खींच सकते, हमें ऐसी शक्तियों से भी टकराना होगा। वास्तविक लेखन से ही वास्तविक चेतना को पहचाना जा सकता है।
वामपंथी विचारक सुधीर सिंह ने कहा की लेखन ही विश्व व्यापी बाजारवाद से निबटने में सक्षम है अस्तु लेखकों को श्रमजीवी समुदाय के प्रति ही उत्तरदायी होना पड़ेगा।
जनपद बाँदा के प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह ने कहा की खेती का यह संकट केवल बुंदेलखंड और हिन्दुस्तान का ही संकट नहीं है यह संकट विश्वव्यापी है। उन्होंने पंद्रह देशो का उदाहरण देते हुए बताया कि पूरे विश्व में किसान संकट में है। किसी भी देश की आर्थिक नीतियों में खेती पर आधारित समुदायों का रक्षोपाय नहीं है। यह निश्चित है कि पूँजीवाद के खिलाफ जब भी अगली लड़ाई होगी तो वह विश्व व्यापी होगी। यदि लड़ाई विश्व व्यापी नहीं होगी तो किसान की रक्षा भी नहीं होगी। किसान के सरोकारों को विश्व व्यापी रूप लेखक ही दे सकता है अत: लेखकों के वगैर किसानों के संघर्ष की कल्पना बेमानी है।
चूल्हाबंदी किसान आन्दोलन के प्रणेता पुष्पेन्द्र भाई ने कहा कि बड़े-बड़े पूँजीपतियों को शून्य ब्याज में कर्ज मिल जाता है और हमें बिजली भी न देकर पूरा शुल्क वसूल लिया जाता है। आखिर कार किसानों के साथ ये सौतेला व्यवहार क्यूँ। हमारा किसान आत्महत्या करता है तो उसकी आत्महत्या का सही मूल्यांकन भी नहीं होता, उसे किसान के निजी चरित्र से जोड़ दिया जाता है। आज जरूरत है लेखक व्यवस्था के इस सामंती और बुर्जुआ चरित्र का पर्दाफाश करे तभी किसानों के बीच अपना हक लेने की चेतना जाग्रत होगी।
बेल्जियम की महिला किसान किम ने यूरोप में किसानों की घटती संख्या और लोगों की खेती के प्रति कम होती रुचि पर सबको अवगत कराया। उन्होंने बताया वह 15 देशों की यात्रा करके आई हैं किसी भी देश में किसानों की स्थिति ठीक नहीं है।
अंत में बहस का समापन करते हुए अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि निलय उपाध्याय ने कहा कि पूँजी के खिलाफ ये संघर्ष आज समूची सभ्यता का संघर्ष बन चुका एक इस संघर्ष में एक ओर है मनुष्यता और दूसरी ओर अमानवीयता। किसान, मजदूर, प्रकृति, पर्यावरण, गाँव,सब कुछ मिटने की कगार पर है लाभ और मुनाफाखोरी ने हमारी संकृति हमारा वजूद हमसे छीन लिया है। जब सब कुछ छीना जा रहा है तो किसान कैसे बचेगा ?सब ये भूल चुके हैं की किसान का उपजाया ही हम खा रहे हैं अन्न सभी खाना चाहते हैं पर उपजाना कोई नहीं चाहता उपजाना तो दूर किसान की चीखें भी सुनने की हमें फुर्सत नहीं है। यही कारण है कि आज कविता से गाँव ओझल हो रहे हैं, किसान ओझल हो रहे हैं, गाँव का श्रमजीवी मजदूर भी कविता की वस्तु से कट गया है। हमें आत्म मूल्यांकन करना होगा हमें फिर से जमीन में उतरना होगा, जमीन को समेटकर फिर नए सिरे से परिभाषित करना पड़ेगा इन खतरों को पहचानना होगा हमें एक और लड़ाई लड़ना होगा यह लड़ाई होगी सभ्यता की असभ्यता से लड़ाई, पूँजी से श्रम की लड़ाई।
जिस विषय को परिचर्चा के द्वारा किसानों तक पहुंचाया गया उसी विषय को कुंवर रवीन्द्र ने अपने चित्रों द्वारा अभिव्यंजित किया। डीसीडीएफ के हाल में आयोजित “चित्र प्रदर्शनी” का विषय “लोक संवेदना” था जिसे कुंवर रवीन्द्र ने अपने रंगों और तूलिका के स्पर्स से जीवंत कर दिया विभिन्न लोकधर्मी कवि जैसे केशव तिवारी, निलय उपाध्याय, महेश पुनेठा, बुद्धि लाल पाल,संतोष चतुर्वेदी की कविताओं को उकेरते हुए चित्र आगंतुक दर्शकों द्वारा खूब सराहे गए चित्रों का क्रम इस तरह से संयोजित किया गया था की वो बुंदेलखंड के किसानों की करुण गाथा खुद बखुद कह रहे थे। रंगों का तल स्पर्शी आमेलन व्यवस्था और व्यक्ति के बीच सिकुड़ रहे मानवीय मूल्यों के क्षरण को नियाति से हटाकर यथार्थ से जोड़ रहे थे चित्र कह रहे थे की सब कुछ स्वत: नहीं हो रहा यह एक सोची विचारी नीति है। एक अवधारणा है पूँजी के चरित्र को बचाने की, नियति का विचार कहीं न कहीं यथार्थ को झुठलाने की कोशिश है।
कार्यक्रम का दूसरा सत्र “कविता-पाठ” था इस सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि निलय उपाध्याय ने की कविता पाठ में निलय उपाध्याय, अविनाश मिश्रा, संतोष चतुर्वेदी, केशव तिवारी, एवं जनपद बाँदा के युवा कवि नारायण दास गुप्त ने भाग लिया। कविता पाठ का आरम्भ करते हुए युवा कवि अविनाश मिश्रा ने अपनी जेबकतरा कविता सुनते हुए कहा कि “वे हर जगह नहीं हैं /हर जगह हम थे /उन्हें हर जगह होना चाहिए था अपनी दूसरी कविता के एक वाक्यांश “प्रकरण जल्द विस्मृत कर ड़ुए जाते हैं/ सहजताएँ मृत्यु तक रहती हैं“ श्रोताओं द्वारा खूब सराही गयीं इन कविताओं के अतिरिक्त अविनाश ने “छोटा उ बड़ा ऊ” और “अच्छी खबर” नामक कवितायें भी सुनायीं जो जो कविता पाठ के दौरान काफी चर्चित रहीं।
संतोष चतुर्वेदी ने पानी का रंग कविता सुनते हुए कहा कि “पानी का भी अपना एक रंग होता है” कविता के अंत में पानी को चेतना से जोड़कर संतोष ने एक उम्दा प्रतीक गढ़ा अपनी ओलार कविता के द्वारा संतोष ने नगर और गाँव के बीच बढ़ते असंतुलन को कविता में ढालने की कोशिश की। केशव तिवारी ने अपनी कविता “अकाल में खली घर देखकर” सुनते हुए कहा कि “आवाज़ दो कोई न कोई तो बोलेगा/कोई नहीं बोला तो ये/ टूटी हुई शहतीरें बोलेंगी” में अकाल का जो बिम्ब उकेरा वह बुंदेलखंड के आकाल का सच बयां कर गया।उन्होंने अपनी कविता पाठा की बिटिया सुनते हुए आदिवासी समुदायों की गरीबी और जिल्लत से सबको परिचित कराया “लकड़ी के बोझ से अकड़ी गर्दन /पसीने से भीगा सुतवां शरीर /कहाँ रहती हो तुम “।नारायण दास गुप्त ने चित्रकूट दर्शन कविता सुनाया इस कविता के द्वारा उन्होंने धार्मिक पाखंडों पर करार प्रहार किया उनकी दूसरी कविता भविष्य का खेतिहर मजदूर रही जिसमे मजदूरों की कठिन जिन्दगी की विवेचना है। कविता पाठ का समापन करते हुए वरिष्ठ हिन्द कवि निलय उपाध्याय ने “मकई का दाना” कविता सुनाया “सुनो हमें घर ले चलो /हम दाने हैं मकई के/ हम खुशियों से घर भर देंगे /भगा देंगे सबकी भूख”। अपनी कविता “दो रूपये का नोट” द्वारा उन्होंने बाजारवाद की तीखी आलोचना की अपनी एक अन्य कविता में उन्होंने कहा “खेती नहीं करने वालो से चलता है खेती का काम”लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावी और चर्चित रही उनकी कविता “राधिका का भाई” जिसे अपनी अनूठी वाचन शैली के द्वारा उन्होने बिम्ब को इस कदर मूर्त कर दिया की समूचा हाल भावविभोर हो गया “रधिया ने गोबर से लीपा /घर आँगन बासारा और /चहकने लगी /आज भाई आएगा रधिया का/ रधिया अपना आँचल पसार देगी /उस पर बैठेगा भाई “एक गरीब भाई और बहन का आपसी लगाव इस कविता में बड़े भावपूर्ण ढंग से वर्णित किया गया है।
इस अवसर पर जनवादी लेखक संघ बाँदा के सदस्यों के अतिरिक्त जनपद के सभी बुद्धिजीवी, पत्रकार, किसान नेता भी उपस्थित रहे। साथ ही जनपद के कई स्थानीय किसान पूरे समय तक उपस्थित रहे। उनकी उपस्थिति जता रही थी, यदि ऐसे आयोजन होते रहे तो अवश्य ही एक बड़ा किसान आन्दोलन जन्म लेगा। कार्यक्रम का व्यवस्थापन प्रदुम्न सिंह ने किया और सञ्चालन उमाशंकर सिंह परमार ने किया। अंत में जनवादी लेखक संघ के जिला अध्यक्ष केशव तिवारी ने आये हुए अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए आगे भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने का वादा किया और कार्यक्रम समापन की घोषणा की।


