शेष नारायण सिंह
रमा शंकर यादव विद्रोही नहीं रहे। बड़े कवि थे रमाशंकर। मुझसे उनकी मुलाक़ात 1974 में हुयी थी। कादीपुर के संत तुलसीदास डिग्री ( अब पोस्ट ग्रेजुएट ) कालेज में वे बी ए के छात्र थे। मैं वहीं प्राचीन इतिहास पढ़ाता था। जिले के मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता, शीतला प्रसाद गुप्त ने मुझे उनके बारे में बताया था। बताया था कि कस्बे में बाएं बाजू की पार्टियों का कोई छात्र संगठन नहीं था, इसलिए किसान सभा के काम में रमाशंकर उनको सहयोग करते थे। साथ यह भी बताया था कि नौजवान लड़का क्रांतिकारी तो है, लेकिन विचारधारा के स्तर पर सीखने की प्रक्रिया अभी चल रही है। उन दिनों कादीपुर का यह कालेज गोरखपुर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था। ऐसा लगता था कि इतिहास का पाठ्यक्रम सीधे मैकाले के दफ्तर से डिजाइन होकर आया था।
मेरे क्लास में नियम था कि किसी को मेरे लेक्चर के नोट लेने की अनुमति नहीं थी। सबको लेक्चर सुनना पड़ता था और साथ-साथ बहस का माहौल बनाने की कोशिश की जाती थी। उन इलाके में उन दिनों बी ए के किसी छात्र से इतिहास की समझ की बहुत उम्मीद नहीं की जाती थी। सबसे आसान विषय मानकर लोग इतिहास पढ़ते थे। बी ए के बाद किसी नौकरी की उम्मीद में इकठ्ठा हुए उस क्लास में रमा शंकर यादव अक्सर बुनियादी सवाल उठाते थे। साम्राज्यवादी शोषण के हथियार के रूप में राज्य और सरकार, शोषक और शासक वर्ग की पार्टियों का वर्ग चरित्र, उस वक़्त की सत्ताधारी पार्टी, कांग्रेस और अमरीकी पार्टियों में शोषित पीड़ित जनता के खिलाफ एका आदि ऐसे मुद्दे वे क्लास में उठाते थे, जो बहुत सारे अन्य छात्रों की समझ से बहुत दूर के होते थे। रमा शंकर उन दिनों भी कवितायें लिखते थे, लेकिन शायद उपनाम विद्रोही नहीं धारण किया था। इमरजेंसी लगने पर मेरी नौकरी छूट गई और मैं दिल्ली में रोज़गार की तलाश में ठोकर खाने लगा। फिर उनसे बहुत दिनों तक मुलाक़ात नहीं हुयी।

बी ए के बाद रमाशंकर जिला मुख्यालय, सुलतानपुर चले गए, जहां उनके असली दोस्त असरार खान ने उनको अपने साथ ले लिया। असरार ने छात्र राजनीति में एक मुकाम बना लिया था और उन्होंने ही रमाशंकर को वहां खूब सक्रिय किया। बहुत काम किया इन लोगों ने। बाद में जब असरार जेएनयू आये तो रमाशंकर को भी साथ लाये। अपने साथ रखते थे, क्रांतिकारी तेवर दोनों के थे, लेकिन बीच में कहीं रमाशंकर ऐसे लोगों की संगत में पड़ गए, जिसके बाद वे अन्दर से बार-बार टूटे लेकिन हारे नहीं। जितनी बार धोखा खाया, उतने ही मज़बूत होकर बाहर आये। दिल्ली में कई बार उनसे मुलाक़ात होती थी। आखिरी बार तब मिला जब अपनी बेटी से मिलने मैं और मेरी पत्नी जेएनयू कैम्पस गए। मेरी पत्नी उनको बहुत मानती थीं। तब तक विद्रोही वहां के स्थाई निवासी बन चुके थे, छात्रों में लोकप्रिय, और फक्कड़ तबियत। मैंने कहा कि कोई स्थाई व्यवस्था करो, तो जवाब सपाट था। मिडिल क्लास की उन चिंताओं से मुक्त हूँ जिसके लिए आपने अनंत समझौते किये हैं। जेएनयू कैम्पस में यह व्यवस्था स्थाई ही है। भूख से तिलमिलाना तो बहुत पहले छोड़ दिया था, बाकी इस विश्वविद्यालय में कपड़े लत्ते से इज्ज़त मिलने का रिवाज़ तो कभी नहीं था।
आज रमाशंकर के जाने से मुझे बहुत तकलीफ हो रही है। साम्राज्यों के खिलाफ उनकी कवितायें बहुत सशक्त होती थीं। मुझे यह वाली बहुत प्रभावशाली लगी थी, अन्दर तक कुछ कह गयी थी। बड़ी कविता है यह। इसको सुनाकर मुझसे कहा था 1974-75 में आप जो बकवास क्लास में... करते थे, वह सब दिमाग में भरी रहती है। वह यूनान, मिस्र, रोमा के मिटने का जो रुदन आप करते थे उसी का गुस्सा है मेरे दिमाग में। लेकिन यार टीचर तुम बढ़िया थे सेस नरायन।
और ये इंसान की बिखरी हुई हड्डियाँ
रोमन के गुलामों की भी हो सकती हैं और
बंगाल के जुलाहों की भी या फ़िर
वियतनामी, फ़िलिस्तीनी, बच्चों की
साम्राज्य आख़िर साम्राज्य होता है
चाहे रोमन साम्राज्य हो, ब्रिटिश साम्राज्य हो
या अत्याधुनिक अमरीकी साम्राज्य
जिसका यही काम होता है कि
पहाड़ों पर पठारों पर नदी किनारे
सागर तीरे इंसानों की हड्डियाँ बिखेरना।
किसी भी साम्राज्य के प्रति उनका जो गुस्सा था वह मुझे धारदार लगता था। कविता मैं नहीं समझता, लेकिन कविता पढ़ते हुए मैं रमाशंकर यादव विद्रोही के चेहरे को समझता ज़रूर था। यह दूसरी कविता सुनाते हुए, जेएनयू की चट्टानों पर वे बहुत गुस्से में थे।
नदी किनारे, सागर तीरे,
पर्वत-पर्वत घाटी-घाटी,
बना बावला सूंघ रहा हूं,
मैं अपने पुरखों की माटी।
सिंधु, जहां सैंधव टापों के,
गहरे बहुत निशान बने थे,
हाय खुरों से कौन कटा था,
बाबा मेरे किसान बने थे।
ग्रीक बसाया, मिस्र बसाया,
दिया मर्तबा इटली को,
मगध बसा था लौह के ऊपर,
मरे पुरनिया खानों में।
कहां हड़प्पा, कहां सवाना,
कहां वोल्गा, मिसीसिपी,
मरी टेम्स में डूब औरतें,
भूखी, प्यासी, लदी-फदी।
वहां कापुआ के महलों के,
नीचे खून गुलामों के,
बहती है एक धार लहू की,
अरबी तेल खदानों में।
कज्जाकों की बहुत लड़कियां,
भाग गयी मंगोलों पर,
डूबा चाइना यांगटिसी में,
लटका हुआ दिवालों से।
पत्थर ढोता रहा पीठ पर,
तिब्बत दलाई लामा का,
वियतनाम में रेड इंडियन,
बम बंधवाएं पेटों पे।
विश्वयुद्ध आस्ट्रिया का कुत्ता,
जाकर मरा सर्बिया में,
याद है बसना उन सर्बों का
डेन्यूब नदी के तीरे पर,
रही रौंदती रोमन फौजें
सदियों जिनके सीनों को।
डूबी आबादी शहंशाह के एक
ताज के मोती में,
किस्से कहती रही पुरखिनें,
अनुपम राजकुमारी की।
धंसी लश्क रें, गाएं, भैंसें,
भेड़ बकरियां दलदल में,
कौन लिखेगा इब्नबतूता
या फिरदौसी गजलों में।
खून न सूखा कशाघात का,
घाव न पूजा कोरों का,
अरे वाह रे ब्यूसीफेलस,
चेतक बेदुल घोड़ो का।
जुल्म न होता, जलन न होती,
जोत न जगती, क्रांति न होती,
बिना क्रांति के खुले खजाना,
कहीं कभी भी शांति न होती।