अंशुमाली रस्तोगी

नेताओं का व्यस्त रहना बेहद जरूरी है। केवल व्यस्त नेता ही देश और समाज की चिंता कर सकता है। वैसे नेता राजनीति में आते ही व्यस्त रहने के लिए हैं। यहां प्रत्येक नेता अपने-अपने हिसाब से व्यस्त रहने-दिखने का प्रयास करता है। मुद्दे नेताओं की व्यस्तता को साधे रखने में मदद करते हैं। जिस नेता के पास जितने मुद्दे वो उतना ही व्यस्त। कभी-कभी तो उन्हें पार्टी व सरकार की व्यस्तता को दिखाने के लिए मुद्दे दूसरे दलों से उधार भी लेने पड़ते हैं। उधार लिए मुद्दों पर जितनी राजनीति अच्छी होती है, उसी हिसाब से व्यस्तताएं भी बनी रहती हैं।
अन्य देशों की राजनीति के बारे में मेरा ज्ञान जरा कम है, पर अपने देश की राजनीति के बारे में दावे के साथ कह सकता हूं कि यहां मुद्दों की कहीं कोई कमी नहीं। जिधर निकल जाएं उधर दो-चार मुद्दे हाथ आ ही जाएंगे। चूंकि हम एक लोकतांत्रिक मुल्क हैं इसलिए हमारे नेता हर छोटे से छोटे मुद्दे पर जमकर राजनीति कर व करवा लेने को स्वतंत्र रहते हैं। मुद्दे हवा में बने रहते हैं और व्यस्तताएं खुद व खुद बढ़ती चली जाती हैं। हां, मुद्दों की व्यस्तताओं के बीच इस बात का खास ख्याल रखा जाता है कि उन्हें ज्यादा लंबा नहीं बस कुछ हफ्तों के लिए ही चलाया व उछाला जाए। मुद्दा परिवर्तन से व्यस्तताओं के स्वभाव में भी परिवर्तन होता रहता है। यह भारतीय राजनीति का मुद्दा नियम है।
चुनाव सबसे मुफीद समय होता है नेताओं का मुद्दों के संग-साथ व्यस्त रहने का। उस वक्त इतने मुद्दों को हवा में तैराया जाता हैं कि किसी एक को पकड़ पाना बेहद कठिन-सा हो जाता है। प्रत्येक गली-मोहल्ले, नाली-पोखर, तलाब-कुंए, रसोई-बेडरूम तक में से जाने कितने मुद्दे एक-एक कर बाहर निकाले जाते हैं, फिर शुरू होती है उन पर जूतम-पैजार। मुद्दों के सहारे नेताओं का मन भी लगा रहता है। साथ ही जनता के बीच उनकी व्यस्तताओं का संदेश भी जाता है। नेता मुद्दों के सहारे हमें अपनी व्यसतताओं का आईना दिखाते हैं। ध्यान रखें, यह सब केवल हमारे देश की राजनीति में ही संभव है।
इधर कई दिनों से तमाम नेता महंगाई और गन्ना किसानों के मुद्दे पर अपनी-अपनी व्यस्तताएं बनाए हुए हैं। कोई महंगाई पर सरकार को कोसने में व्यस्त है। कोई गन्ना किसानों के साथ जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन में लगा हुआ है। सभी नेता दिखा-बता देना चाहते हैं कि वे जनता के मुद्दों पर जनता के साथ हैं। यह नेताओं का जन-प्रेम ही है कि वे महंगाई व गन्ना किसानों के मुद्दे पर संसद नहीं चलने देते। संसद से सड़क तक आ जाते हैं। मुद्दे को इस कदर गरमा देते हैं कि उनका मन भी लगा रहे और व्यस्तातएं भी बनी रहें। दरअसल, यही एक सफल जन-नेता की पहचान है।
मुद्दे हमारी राजनीति का आईना हैं। जब तक ये बने रहते हैं हर पल यह एहसास भी बना रहता है कि अभी नेता हमारे बीच मौजूद हैं।