एच. एल. दुसाध
राष्ट्र को स्वच्छता महाभियान के बाद एक और महाभियान का साक्षात् करने का अवसर मिला। इस बार का लक्ष्य भ्रातृत्व के कंगाल देश को एकता से समृद्ध करने के लिए था। इसके लिए प्रधान मंत्री और उनके सहयोगियों सहित एक्टर, क्रिकेटर, फौजी, डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, व्यापारी और विभिन्न समुदायों से जुड़े युवक –युवतियां, बुजुर्गों और महिलाओं इत्यादि ने दिल्ली के इंडिया गेट से लेकर विजय चौक तक एकता की दौड़ में सोत्साह भाग लिया। इस अवसर पर एकता के निम्न मन्त्रों से लोगों को दीक्षित किया गया : -
राज्य अनेक राष्ट्र एक,
पंथ अनेक लक्ष्य एक,
बोली अनेक स्वर एक,
भाषा अनेक भाव एक,
रंग अनेक तिरंगा एक,
समाज अनेक भारत एक,
रिवाज अनेक संस्कार अनेक।
कार्य अनेक संकल्प एक
राह अनेक मंजिल एक
चेहरे अनेक मुस्कान एक।
स्वच्छता अभियान के बाद मीडिया ने एकता अभियान में भी बढ़ चढ़कर सहयोग किया। लिहाजा अख़बारों और चैनलों ने रन फॉर यूनिटी की खबरों को खूब स्पेस दिया। मीडिया वालों ने उसमे शिरकत करने आये विभिन्न तबकों के लोगों से इस पर राय ली। यह सुन कर आपको शायद बड़ा अच्छा लगेगा कि तमाम लोगों ने ही एकता दौड़ के प्रति बड़ा ही सकारारात्मक राय दिया। उनकी राय को देखते हुए मीडिया ने इस आयोजन को इस रूप में प्रोजेक्ट किया कि अब तक जो काम नहीं हुआ, उसकी शुरुआत 31 अक्तूबर, 2014 से हो चुकी है। अर्थात भारत अब एकता का कंगाल नहीं रहेगा। आप चाहें तो इसके लिए प्रधानमंत्री जी के प्रति आभार प्रकट कर सकते हैं कि उन्होंने गंदे देश को स्वच्छता के लिए प्रेरित करने के साथ ही एकता से संपन्न करने की दिशा में भी एक बलिष्ठ कदम उठा दिया है।
बहरहाल परसों एकता के लिए जो दौड़ आयोजित हुई उससे तो एक बात स्पष्ट है कि प्रधान मंत्री यह मानते हैं कि देश में एकता नहीं, इसलिए एकता हेतु उन्होंने रन फॉर यूनिटी का आयोजन किया। यह आयोजन भले ही भव्य हो किन्तु इसमें कोई शक नहीं रहना चाहिए कि इससे पहले भी देश के हुक्मरान इसके लिए अपने तरह से कुछ न कुछ करते रहे हैं। किन्तु परिणाम शून्य ही रहा इसलिए नए प्रधान मंत्री को इसके लिए अपने अंदाज में मंच तैयार करना पड़ा। किन्तु उन्होंने भी घुमा-फिराकर वही जानी पहचानी घुट्टी पिलाई जो अब तक के दूसरे प्रधान मंत्री पिलाते रहे हैं। अर्थात् हमारी अनेकता में एकता है। किन्तु यह बात तो हर किसी को प्राइमरी स्कूल से ही पाठ्य पुस्तकों के जरिये बताई जाती रही है। यही बात तो वर्षों से लेखक-पत्रकार भी बतलाते रहे हैं कि हमारी क्षेत्रीय, भाषाई, जातीय, धार्मिक इत्यादि तरह-तरह की अनेकताओं में एकता ही एकता है। अगर तोता रटंत की तरह यही बात दोहराए जाने से एकता पैदा हो जाती तो फिर नए सिरे से प्रयास की कोई जरुरत ही नहीं पड़ती। किन्तु सचाई है कि एकता की जगह हर अनेकता –क्षेत्रीय, भाषाई, जातीय, लैंगिक, धार्मिक-में शत्रुता ही शत्रुता है। और ऐसा इसलिए है कि देश के हुक्मरानों ने शत्रुता की जगह एकता की स्थापना के लिए सबसे अनिवार्य शर्त-विभिन्न वर्गों के मध्य शक्ति के स्रोतों के वाजिब बंटवारे-की पूरी तरह अनदेखी कर दी। नए प्रधानमंत्री बार-बार यह सन्देश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वह अपने पूर्ववर्तियों से अलग हैं। किन्तु सच्ची बात तो यह है कि उन्हें इस बात का रत्ती भर इल्म नहीं हो रहा है कि वह भी पुरानी लकीर पर ही चल रहे हैं। वह ऐसी कोई पॉलिसी अख्तियार करते नहीं दिख रहे हैं जिससे संपदा-संसाधनों और अवसरों के भीषण विषम बंटवारे से निजात मिले। ऐसे में चाहें तो वह रोज-रोज रन फॉर यूनिटी जैसे आयोजन कर लें, देश एकता और भ्रातृत्व का कंगाल ही रहेगा।
एच एल दुसाध, लेखक बहुजन चितक, स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।