लाशें बासी बहुत जल्द हो जाती हैं इसलिए लाशों की राजनीति करने वालों को बार-बार नई लाशों की जरूरत होती है
इतना बुखार ईरान में दी गयी फांसियों पर चढ़ता तो दुनिया कुछ बेहतर जीने की जगह बनती
लाशों की राजनीति करने वालों के साथ दिक्कत यह है कि लाशें बासी बहुत जल्द हो जाती हैं इसलिए उन्हें बाज़ार में बने रहने के लिए बार-बार नई लाशों की जरुरत होती है, कभी मुल्लाह के नाम की, कभी शहीद के नाम की.
शमशाद इलाही शम्स
यूं तो पूरी दुनिया भर की हकुमतें जितनी फांसियां देती है, उससे अधिक फांसियाँ अकेले चीन में हर साल दे दी जाती हैं, इनकी संख्या भी नहीं बताई जाती. एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक दूसरे नंबर पर ईरान है जहाँ २८९ +, फिर सऊदी अरब ९०+ और ईराक ६१+ लोगों को २०१४ में फांसियां देने वाले शिखर राष्ट्र हैं.
सऊदी अरब द्वारा शिया मुल्लाह शेख निम्र की फांसी पर इस्लामी जम्हूरियत ईरान के धर्म गुरु तक को बुखार चढ़ गया और पूरी दुनिया के शिया समुदाय में इसकी हरारत हो रही है, इतना बुखार ईरान में दी गयी फांसियों पर चढ़ता तो दुनिया कुछ बेहतर जीने की जगह बनती.

बताते चलें कि हमारे खित्ते में सबसे पहली अंध धार्मिक हत्या की शुरुआत इरानी छाप इस्लामी ताकतों ने ही की थी. २२ फरवरी १९९० को सिपाहे सहाबा सुन्नी कट्टरपंथी नेता हक़ नवाज़ ३८ की हत्या झंग, पकिस्तान में की गयी थी, जिसके बाद लश्करे झंगवी जैसे मौत के फरिश्तों ने मौत का तांडव शुरू किया.
...और छातियाँ पीटने से पहले इरानी हुकूमत द्वारा ईरान में सुन्नी समुदाय के आन्दोलन और उनके नेताओं का हश्र भी सुन लें तो बेहतर.
ईरान के सिस्तान बलोचिस्तान इलाके में सफविद तंग नज़री के चलते जुनदुल्लाह जैसा हिंसक आन्दोलन हवा से नहीं टपका, इसकी जड़ें इरानी शासन पद्दति में ही निहित हैं. २७ साल का लड़का अब्दुल मालिक रेगी इसी ज़मीन पर आतंकवादी बना, जिसे १९ जून २०१० में शिया जम्हूरियत इस्लामिया ईरानिया ने फांसी पर चढ़ाया था। हाँ गनीमत है सुन्नियों ने लेबनान से लेकर लखनऊ तक मातम नहीं पीटा न सड़कों पर उतरे.
इस टिप्पणी का मकसद शिया-सुन्नी गिरोहों में से किसी की हिमायत करना नहीं, बल्कि इन दोनों को नंगा करना है, जिन्हें अपनी सियासत के लिए सिर्फ लाशें चाहिएं।
लाशों की राजनीति करने वालों के साथ दिक्कत यह है कि लाशें बासी बहुत जल्द हो जाती हैं इसलिए उन्हें बाज़ार में बने रहने के लिए बार-बार नई लाशों की जरुरत होती है, कभी मुल्लाह के नाम की, कभी शहीद के नाम की.
छाती पीटू ब्राण्ड के सर्वोच्च मुखिया, सल्तनते शिया इस्लामिया इरानिया के रूहानी गुरु मुल्लाह अली खामनी ने दुआ दम कर फूंक मार दी है. बोले, कि शेख निम्र की फांसी का बदला सऊदी शासकों को चुकाना होगा, खुदाई कहर नाजिल होगा और शाही खानदान ख़त्म हो जायेगा.
चच्चा मुझे आपकी बद्दुआ पर रत्ती भर भी ऐतराज़ नहीं, पर एक बात तो बताओ, ३६ सालों से पूरे इरान में ऐसी कोई मस्जिद नहीं जिसमें नमाज के बाद अमेरिका और इसराइल को बर्बाद करने की दुआ, खुदा से न माँगी गयी हो? आज तक उनका कुछ उखड़ा क्या ?
सदियों से एक पक्ष माथा रगड़वाने में लगा हुआ है, दूसरा छाती पिटवाने में। आज तक कुछ बदला क्या..?
जागो भक्तों...फेंकों इन्हें इतिहास के कचरे में, तभी लिखी जायेंगी नई तकदीरें। तभी होगा नया इतिहास ताबीर. तभी अंत होगा पूंजी और साम्राज्यवादी शोषण का, तभी होगा मानव मुक्त.