वनाधिकार कानून को लागू कराने के लिए जारी है अभियान
लखनऊ, 3 मई 2015, उ0 प्र0 में वनाधिकार कानून को अखिलेश सरकार द्वारा समुचित रुप से लागू नहीं करने की आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) ने कड़ी निंदा की है।
आइपीएफ के प्रदेश संगठन प्रभारी दिनकर कपूर ने बताया कि 2013 में आइपीएफ की जनहित याचिका पर माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के बाद कुछ जनपदों में ग्रामस्तर की वनाधिकार समितियों का पुनर्गठन किया गया। लेकिन ग्रामस्तर की समितियों द्वारा स्वीकृत दावों पर पुनर्विचार करने व संशोधन अधिनियम 2012 के तहत विधिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए दावेदारों को युक्तियुक्त अवसर प्रदान करने और नए दावों को स्वीकार करने जैसी कार्यवाहियां नहीं की गयी जिससे यह प्रक्रिया महज रस्मअदायगी बनकर रह गयी।
आइपीएफ नेता ने बताया कि प्रदेश के सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली के पहाड़ी अंचल में आदिवासियों, दलितों और वनाश्रित समुदायों की हालत बेहद खराब है। चंदौली जनपद के नौगढ़ ब्लाक में तो लोग आधा पेट भोजन पर जीवन जी रहे है और सोनभद्र के दुद्धी तहसील में ग्रामीण गेठी कंदा जैसी जहरीली जड़ खाने को मजबूर हैं। इन स्थितियों से उ0 प्र0 की सरकार भलीभांति वाकिफ है। इससे निपटने में वनाधिकार कानून एक महत्वपूर्ण एवं कारगर कदम हो सकता था पर अखिलेश सरकार जानबूझ कर इसे विफल कर देने पर आमादा है। विगत 12 अप्रैल को हुई आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट की राज्य इकाई की बैठक में किसानों के सवालों के साथ आदिवासियों और वनाश्रित समुदायों के सवालों पर भी विचार-विमर्श हुआ था। बैठक में यह पाया गया कि उत्तर प्रदेश के 13 जनपदों में वनाधिकार कानून के तहत दाखिल 92,433 दावों में से 73,416 दावों को निरस्त किया गया है। सबसे बुरी स्थिति चंदौली जनपद की है जहां 14,088 दावों में से 13,998 दावे खारिज कर दिए गए और मात्र 90 लोगों को ही अधिकार दिए गए। इसी प्रकार सोनभद्र जनपद में 65,526 दावों में से 53,506 दावे खारिज कर दिए गए और मिर्जापुर में 3,413 दावों में 3,128 खारिज कर दिए गए। हालत यह है कि निरस्त किये 73,416 दावों में अधिकांश दावेदारों को सूचित ही नहीं किया गया और सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर भी प्रदान नहीं किया गया। जबकि संशोधन अधिनियम 2012 की धारा 12 (क) स्पष्ट तौर पर यह कहती है कि दावेदार को बिना युक्तियुक्त अवसर दिए दावे को खारिज ही नहीं किया जा सकता। इसी धारा की उपधारा (5) के अनुसार दावा खारिज करने की स्थिति में दावेदार को व्यक्तिगत रुप से और कारणों को उल्लेखित करते हुए संसूचित किया जायेगा ताकि वह उपखण्ड़स्तरीय या जिलास्तरीय समिति में अपील कर सके। इसी की उपधारा (6) जिलास्तरीय कमेटी व उपखण्ड़ स्तरीय कमेटी के द्वारा ग्रामसभा से स्वीकृत दावों के मनमाने ढंग से खारिज करने पर रोक लगाती है और कहती है कि यदि ग्रामसभा के संकल्प या सिफारिश अपूर्ण या अतिरिक्त परीक्षण के लिए अपेक्षित हो तो उन्हें खारिज करने की जगह ग्रामसभा को पुर्नविचार के लिए भेजा जाए।
बैठक में यह निर्णय हुआ था कि प्राकृतिक आपदा से पीडि़त किसानों को वाजिब मुआवजा, भूमि उपयोग नीति जैसे सवालों के साथ वनाधिकार कानून के अनुपालन को सुनिश्चित कराने के लिए जनअभियान चलाया जाए। इसी अभियान के तहत आइपीएफ की चंदौली जिला संयोजन समिति के सदस्य अजय राय ने चकिया तहसील मुख्यालय पर 30 अप्रैल से 36 धण्टे का उपवास किया, जिसे माकपा और भाकपा ने भी समर्थन दिया। उपवासस्थल पर आए उपजिलाधिकारी चकिया ने आश्वासन दिया कि प्रशासन ग्रामों में गठित की जा रही वनाधिकार समितियों की सूची उपलब्ध करायेगा, ग्रामस्तर पर समितियों के गठन की समुचित सूचना दी जायेगी और सभी दावों पर विधिक प्रक्रिया के तहत विचार किया जायेगा। उन्होंने बताया कि आइपीएफ राज्य नेतृत्व ने यह तय किया है कि वनाधिकार कानून के अनुपालन के सवाल पर सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली में आइपीएफ आंदोलन को तेज करेगा और यदि सरकार उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में वनाधिकार कानून का अनुपालन नहीं करती है तो विधिक प्रक्रिया अपनायी जायेगी।