जब सड़क पड़ी संसद पर भारी
मोदी जी देश के प्रधानमंत्री और सदन के नेता के तौर पर कम, सत्ता के मद में चूर एक अहंकारी शासक के रूप में ज्यादा दिखे
महेंद्र मिश्र
कल प्रधानमंत्री का दिन होना था। उन्हें संसद में राष्ट्रपति अभिभाषण पर बहस के बाद धन्यवाद देना था। लिहाजा उनकी एक-एक बात बहुत महत्वपूर्ण होनी थी, लेकिन मोदी जी देश के प्रधानमंत्री और सदन के नेता के तौर पर कम, सत्ता के मद में चूर एक अहंकारी शासक के रूप में ज्यादा दिखे। अहम उनके चेहरे पर बिल्कुल साफ़ था, लेकिन परेशानी भी उसी अनुपात में झलक रही थी। जो माथे की लकीरों और उनके लाल चेहरे से स्पष्ट था।

सदन के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी विपक्ष को भी साथ लेकर चलने की होती है। एक स्वस्थ लोकतंत्र का यही नियम होता है। लेकिन यहां तो अपने मंत्रियों और पार्टी नेताओं को पहले ही बौना बना चुके मोदी जी की पूरी कोशिश विपक्ष को भी बौना साबित कर देने की थी। इसके लिए उन्हें इतिहास के पन्ने खंगालने पड़ रहे थे। जबकि उसका जवाब खुद उनके पास ही सुषमा स्वराज के तौर पर मौजूद था। जिन्होंने अब से तीन साल पहले विपक्ष के सत्र के बहिष्कार और सदन की कार्यवाही में अड़चन को लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा बताया था।
प्रधानमंत्री जी की पूरी कोशिश यही है कि सबको बौना साबित कर खुद को उनके ऊपर बैठाया जा सके। लेकिन प्रधानमंत्री जी ना तो देश बौना हुआ है ना ही उसके लोग। कल आपके कद को जेएनयू के एक छात्रनेता ने नाप दिया। कल उस पहाड़ के सामने आप ऊंट साबित हुए। ये मैं नहीं कह रहा हूं। देश का मीडिया और हर नागरिक बोल रहा है। कन्हैया देश के इतिहास के पहले छात्रनेता होंगे जिनके पूरे एक घंटे के भाषण का ना केवल सीधा प्रसारण हुआ बल्कि उसे इलेक्ट्रॉनिक चैनलों ने कई-कई बार दिखाया। अख़बारों ने भी आप के ऊपर कन्हैया को स्थान दिया है। शायद ही कोई पेपर हो जिसने ऐसा ना किया हो।
इतना ही नहीं कन्हैया ने तुर्की बा तुर्की आपके सारे सवालों का जवाब भी दिया। यह देश के लिए ही सिर्फ टर्निंग पॉइंट नहीं है। बल्कि आपके लिए भी यह उल्टी गिनती की शुरुआत जैसा है।
कहते हैं कि समाज में कुछ भी होने वाला होता है तो उसकी धड़कन सबसे पहले शैक्षणिक परिसरों में महसूस की जाती है। जेएनयू और हैदराबाद बहुत कुछ कह रहा है। अगर आप उनको सुनने की कोशिश करें तो। युवाओं की इस अंगड़ाई पर अब लगाम लगाना मुश्किल है। परिसरों से बाहर निकल कर अब इसने समाज की अगुवाई का संकल्प ले लिया है। और उसने अपना नेतृत्व भी तैयार करना शुरू कर दिया है। कन्हैया उन्हीं में से एक है। शरीर भले ही कन्हैया का हो लेकिन उसमें आत्मा रोहित वेमुला की है।