शिक्षक दिवस को मोदी दिवस बना दिया आपने
शिक्षक दिवस को मोदी दिवस बना दिया आपने
शिक्षक दिवस या मोदी दिवस
कपिल सिब्बल और नरेन्द्र मोदी की बातों में आप एक तरह की समानता देख रहे हैं-तकनीक आधारित शिक्षा पाने की। मोदी उसी रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं जिसे मनमोहन सिंह ने 1991 में दिखाया था।
सुनील कुमार
5 सितम्बर, 2014 को मोदी ने पहली बार शिक्षक दिवस पर भारत के स्कूली बच्चों को सम्बोधित किया। प्रधानमंत्री का यह सम्बोधन छात्र-छात्राओं एंव शिक्षकों पर थोपने जैसा था। भारत के स्कूलों को केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने निर्देश जारी किये- 1) सभी सरकारी, गैर सरकारी स्कूल बच्चों को प्रधानमंत्री का भाषण सुनने के लिए सभी जरूरी इंतजाम करें( 2) जरूरी संख्या में टेलिविजन सैट, सेट टॉप बॉक्स कनेक्शन, प्रोजेक्टर, स्क्रीन, एंप्लीफायर, जेनरेटर या इन्वर्टर सेट की व्यवस्था की जाए। यदि न हो तो किराए पर मंगाए जाएं। सरकारी स्कूलों में किराए पर सामान मंगाने का खर्च विद्यालय कल्याण समिति उठाएगी ( 3) सीधे प्रसारण के दौरान अनुशासन बनाए रखें ( 4) कार्यक्रम शुरू होने से पहले सभी स्कूल भाषण सुनने वाले छात्रों की संख्या वेबसाइट लिंक पर अपडेट करें ( 5) सभी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन कराया जाए, लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा। इस तरह के निर्देश जारी करने के बाद स्मृति ईरानी कहती हैं कि शिक्षक दिवस पर प्रधानमंत्री का भाषण सुनना स्वैच्छिक है।
भारत के प्रथम उप राष्ट्रपति व दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिन पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है क्योंकि वे एक शिक्षक थे। मोदी ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए शिक्षक दिवस के अवसर पर शिक्षकों से बात करने के बजाय छात्र-छात्राओं को सम्बोधन करना उचित समझा। अगले चुनाव तक इसमें से ज्यादा छात्र-छात्राएं वोटर होंगे। मोदी का सपना भी कम से कम 10 वर्ष तक प्रधानमंत्री बने रहने का है जिसे उन्होंने लाल किले की प्राचीर से व शिक्षक दिवस के अवसर पर एक छात्र के प्रश्न के जवाब में भी यह जताने की कोशिश की।
शिक्षा को चरित्र निर्माण की जगह मुनाफे की वस्तु बना दिया गया है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता में काफी गिरावट आई है। भारत के पिछड़े जिलों में भी प्राइवेट स्कूलों की भरमार हो गई है। शहरों में मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट कॉलेजों, विश्वविद्यालय और यहां तक कि शिक्षक बनने के लिए बीएड कराने वाली संस्थाओं व प्राइवेट स्कूलों का जाल बिछ चुका है। ये प्राइवेट संस्थाएं समाज सेवा या चरित्र निर्माण के लिए नहीं खोली गई हैं, इनका उद्देश्य है अधिक से अधिक मुनाफा कमाना। आप के पास अगर पैसा है तो आप डॉक्टर, मास्टर, इंजीनियर कुछ भी बन सकते हैं। जब आप इन प्राइवेट संस्थाओं में लाखों रुपये खर्च करके पढ़ कर बाहर आते हैं तो आप इसे सूद समेत वसूलने की कोशिश में रहते हैं। डॉक्टर या मास्टर बनने के बाद आप का ध्यान प्राइवेट प्रैक्टिस, कोचिंग सेंटर आदि पर ज्यादा होता है। इसी तरह इंजीनियर या मैनेजर होने के बाद आपको बड़े पैकेज दिखते हैं। उसके लिए आप बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की शरण में जाते हैं और अधिक से अधिक पैकेज लेने की चाहत में आप उनके लिए दिन-रात काम करते हैं- चाहे वह काम देश की जनता के खिलाफ में ही क्यों न हो। मोदी जी शिक्षा के निजीकरण पर चुप रहे क्योंकि उनके लिए कारपोरेट जगत के लिए मजदूर पैदा करने वाली शिक्षा को बढ़ावा देना अनिवार्य है। उनको चरित्र निर्माण कर समाज सेवा करने वाली शिक्षा नहीं चाहिए। उनकी संस्था आर.एस.एस. 1952 में ही सरस्वती शिशु मन्दिर नामक स्कूल को खोल कर अपनी विचारधारा को फैलाने का काम कर रही है। मोदी जी जिस व्यवस्था की आज सेवा कर रहे हैं उसमें तकनीक आधारित शिक्षा की जरूरत है। यही कारण है कि कपिल सिब्बल और नरेन्द्र मोदी की बातों में आप एक तरह की समानता देख रहे हैं-तकनीक आधारित शिक्षा पाने की। मोदी उसी रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं जिसे मनमोहन सिंह ने 1991 में दिखाया था।
मोदी जी ने अपने 17 मिनट के भाषण में एक बार भी स्कूल शिक्षकों की दुर्दशा की बात नहीं की। दिल्ली के अन्दर ही गेस्ट टीचर दिहाड़ी मजदूर के रूप में पढ़ा रहे हैं। गेस्ट टीचरों को टास्क निर्धारित कर दिया जाता है कि वे अपने पाठ्यक्रम को निर्धारित समय तक खत्म कर दें। इसी तरह अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम से शिक्षकों को ठेका पर रखा गया है। स्थायी शिक्षकों का काम अध्यापन का कम और कर्लक का ज्यादा है। जनगणना से लेकर मतदान व मध्याहन भोजन बनाने के कामों का बोझ सहित तमाम तरह के कागजी काम शिक्षकों से कराये जाते हैं। अधिकांश स्कूलों में पर्याप्त कमरे नहीं हैं, कहीं-कहीं तो खुले असमान के नीचे ही पढ़ाई होती है। मोदी जो को यह सब नहीं दिख रहा है। आजकल उनकी नजर शौचालय तक ही पहुंच पा रही है।
मोदी जी, आप कह रहे थे कि ‘‘सारी दुनिया में अच्छे शिक्षकों की बहुत बड़ी मांग हैं, अच्छे शिक्षक मिल नहीं रहे हैं, क्या भारत यह सपना नहीं दे सकता है कि हम उत्तम प्रकार के शिक्षक एक्सपोर्ट करेंगे।’’ मोदी जी, आप एक्सपोर्ट का सपना तो अभी छोड़ दीजिये, आपके अपने ही देश में 5 लाख शिक्षकों की कमी है। और जो शिक्षक हैं भी, वो कर्मचारियों के अभाव में उनके कामों को पूरा करने के लिए लगा दिये जाते हैं। आप पहले अपने देश के लिए शिक्षक बनाईये, कर्मचारियों के रिक्त पदों को भरिये, ताकि उनका काम इन शिक्षकों को नहीं करना पड़े।
बच्चों से आप पूछ रहे थे कि कितने बालक हैं जिनके शरीर से चार बार भरपूर पसीने आते हैं? दिन में कम से कम चार बार पसीने निकालने के लिए खेल-कूद, दौड़ने की सलाह दे रहे थे। आप अपने आप को दिल्ली के एलिट क्लास से दूर पिछड़े वर्ग का पुरोधा मानते हैं। तो क्या आपको यह मालूम नहीं है कि बहुत सारे बालकों के बचपन ऐसे बीतते हैं जहां पूरे दिन उनको पसीने ही आते रहते हैं, जिसके कारण वे स्कूल तक भी नहीं पहुंच पाते हैं। जिन बच्चों को आप वातानुकूलित सभागार में बैठा कर बता रहे थे, क्या उनके लिए खेलने-कूदने की जगह आपने छोड़ी है? शहरों में बिल्डर तो गांव में भू-माफियाओं और जंगलों में खनन माफियाओं ने कब्जा जमा रखा है।
आप छात्र-छात्राओं को सफल लोगों का जीवन चरित्र पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे। मोदी जी, जो सफलता की सीढ़ी नहीं चढ़ पाते क्या उनका कोई जीवन चरित्र होता है या नहीं? आपने सफल लोगों में से किसी की भी जीवनी को पढ़ने के लिए कहा, लेकिन क्षेत्र गिनाते समय आपने खेल-कूद, सिनेजगत, व्यापार जगत, वैज्ञानिक क्षेत्र का नाम बताया। क्या आपको शहीदों की जीवनी बताने का याद नहीं आया या आपने सोच समझकर ऐसा किया? आप अपनी इस समझदारी की झलक 15 अगस्त को दिखा चुके हैं।
शिक्षक दिवस पर प्रधानमंत्री के भाषण को छात्रों तक पहुंचाने के लिए शासन-प्रशासन और शिक्षकों ने मुस्तैदी दिखायी। क्या अच्छा नहीं होता कि इसी तरह की मुस्तैदी छात्रों तक शिक्षा पहुंचाने के लिए दिखायी जाती? शिक्षक दिवस पर आपके सम्बोधन को सुनाने के लिए देश के 125 करोड़ रुपये खर्च हुए। इतने रुपयों से कम से कम भारत के ग्रामीण ईलाकों में 2,500 स्कूल तो बन ही जाते। छात्रों को मजबूरन आपके भाषण सुनने के लिए स्कूल तक आना पड़ा। उनको यह मालूम नहीं था कि आज शिक्षक दिवस है। उनको यही मालूम था कि आज स्कूल में जाना है क्योंकि मोदी जी का भाषण होगा। शिक्षक दिवस को आपने मोदी दिवस बना दिया।
शिक्षक दिवस का उद्देश्य तब ही सफल होगा जब प्रत्येक छात्र-छात्रा को पढ़ने का एक समान अवसर मिले और अभी इसकी जिम्मेदारी आपकी सरकार पर है। शिक्षा का व्यवसायीकरण बंद करना होगा, सभी निजी स्कूलों, कॉलेजों को बंद कर सरकारी स्कूल, कॉलेज बनाने होंगे। शिक्षा की जिम्मेवारी पूर्णतः सरकार को लेनी होगी और 18 वर्ष की आयु तक मुफ्त शिक्षा देनी होगी। इससे प्रतिभावान छात्र-छात्राएं धन के अभाव में शिक्षा से वंचित नहीं रहेंगे और देश को कुशल शिक्षक, डाक्टर, इंजीनियर सब मिलेंगे। जरूरत है ऐसी सरकार की जो जनता के प्रति उत्तरदायी हो। कारपोरेट जगत के लिए दिन-रात सोचने वाली सरकार कभी भी यह काम नहीं कर सकती है। मोदी जी, आप तय कीजिये कि आप किसके लिए सोच रहे हैं?
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