कन्हैया का प्रकरण, हिंदुत्ववादी हमले के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन गया है।
0 प्रकाश कारात
विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थाओं पर अपना राजनीतिक-विचारधारात्मक नियंत्रण कायम करने का आरएसएस-भाजपा की मुहिम जोर-शोर से जारी है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) और उसके छात्र समुदाय पर हुआ ताजातरीन हमला तो एक तरह से होना ही था। केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आने वाली अन्य संस्थाओं में पिछले कुछ अर्से से जो कुछ हो रहा था, उसने पहले ही इस हमले के संकेत दे दिए थे। जेएनयू इस हमले का मुख्य निशाना बन गया है क्योंकि वह ऐसी हरेक चीज का प्रतिनिधि है, जो आरएसएस-हिंदुत्ववादी ताकतों को नागवार है।
देशद्रोह के आरोप में जेएनयू के छात्र संघ के अध्यक्ष, कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी को, अफजल गुरू की फांसी के खिलाफ छात्रों के एक छोटे से ग्रुप के विरोध जताने पर, अनुपातहीन प्रतिक्रिया ही कहा जा सकता है। लेकिन, यह किसी नौकरशाहीपूर्ण अनुपातहीन प्रतिक्रिया का मामला नहीं था बल्कि भाजपा सरकार की सोची-समझी राजनीतिक अति-प्रतिक्रिया का मामला है।
आरएसएस और उसके छात्र बाजू, एबीवीपी को लगा कि यही उनके लिए, जेएनयू में वामपंथी तथा जनतांत्रिक ताकतों को पीटने का सबसे अच्छा बहाना है। आरएसएस-भाजपा के द्रुष्प्रचार में हमेशा से जेएनयू ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ ताकतों का गढ़ रहा है।
हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रकरण की ही तरह, जहां एबीवीपी की शिकायत पर और एक केंद्रीय मंत्री के हस्तक्षेप से, रोहित वेमुला तथा चार दलित छात्रों को निलंबित किया गया था, जेएनयू में भी एबीवीपी के उकसाने पर ही गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पुलिस को आदेश दिया था कि जेएनयू में ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ गतिविधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें। उधर मानव संसाधन विकास मंत्री ने एलान कर दिया कि भारत माता का अपमान किसी भी तरह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
पुलिस ने जाब्ता फौजदारी के अंतर्गत राष्ट्रद्रोह की धारा लगाकर छात्रसंघ के अध्यक्ष को गिरफ्तार किया है। राष्ट्रदोह की धारा तो वैसे भी एक अतिदमनकारी धारा है क्योंकि इसमें राष्ट्रद्रोह की परिभाषा इस तरह की गयी है कि, ‘‘कानून के द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या तिरस्कार पैदा करना या पैदा करने की कोशिश करना या उसके प्रति अवज्ञा भडक़ाना या भडक़ाने की कोशिश करना’’ सब कुछ इसके दायरे में आ जाता है। वास्तव में इस मामले में जो एफआइआर दर्ज की गयी है कि उसमें छात्र संघ के अध्यक्ष के साथ ही उसके महासचिव और वामपंथी छात्र संगठनों के नेताओं को भी नामजद किया गया है। यह इसके बावजूद है कि सुप्रीम कोर्ट ने 1962 में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि राष्ट्रद्रोह का आरोप हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था भडक़ाने की सूरत में ही लगाया जा सकता है, अन्यथा नहीं। इसके बावजूद, औपनिवेशिक जमाने से चली आ रही दंड संहिता की इस धारा का विरोध कार्रवाइयों तथा जनतांत्रिक आंदोलनों को दबाने के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा है।
यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार और भाजपा ने जेएनयू में कथित रूप से ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ गतिविधियां चल रही होने को, धर्मनिरपेक्ष-जनतांत्रिक ताकतों के खिलाफ एक बड़ा हमला बना दिया है। पटियाला हाउस कोर्ट में शिक्षकों, छात्रों तथा पत्रकारों पर हमले की हैरान करने वाली घटना, जिसमें पुलिस मूक दर्शक बनी रही, इसी का पता देती है कि सरकार इस मामले को किस तरह से लेना चाहती है। खुद केंद्रीय गृहमंत्री, राजनाथ सिंह ने एक फर्जी ट्विटर हैंडल का सहारा लेकर, यह कहकर छात्रों को बदनाम करने का काम किया है कि जेएनयू के आंदोलन को हाफिज़ सईद का समर्थन हासिल है।
यह एक जानी-मानी सचाई है कि जेएनयू छात्र संघ ने कथित विरोध कार्रवाई का आयोजन नहीं किया था। वास्तव में यूनियन के नेताओं तथा अन्य वामपंथी छात्र संगठनों ने तो उक्त कार्रवाई के आयोजकों और एबीवीपी के लोगों के बीच झगड़े को रोकने के लिए ही हस्तक्षेप किया था। जिस आयोजन में कथित रूप से आपत्तिजनक नारे लगाए गए थे, उसके आयोजन से साथ कुछ लेना-देना ही न होने के बावजूद, छांटकर छात्र संघ के अध्यक्ष तथा अन्य पदाधिकारियों का गिरफ्तारी के लिए चुना जाना, साफ तौर पर यही दिखाता है कि केंद्र सरकार और भाजपा का इरादा ही यह है कि एक संस्था के रूप में ही जेएनयू को हमले का निशाना बनाया जाए तथा धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक मूल्यों का मजबूती से समर्थन करने व हिंदुत्ववादी ताकतों का विरोध करने के लिए, इस विश्वविद्यालय के समूचे छात्र समुदाय को ही सजा दी जाए।

जेएनयू में हमेशा से जीवंत जनतांत्रिक वातावरण रहा है और इसने विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को पाला-पोसा है। पुलिस की 9 फरवरी की कार्रवाई ने इसे तार-तार कर दिया है। जेएनयू के नवनियुक्त वाइस चांसलर ने पुलिस को विश्वविद्यालय परिसर में अपनी कार्रवाइयां करने की खुली छूट ही दे दी। पुन: विश्वविद्यालय प्रशासन ने, खुद वाइसचांसलर के आदेश पर हो रही जांच के नतीजे आने तक, आठ छात्रों को शैक्षणिक गतिविधियों में हिस्सा लेने से रोक दिया है। वाइसचांसलर ने यह कार्रवाई खुद ही सरकार के दबाव में की है।
कन्हैया कुमार के खिलाफ थोपा गया झूठा मामला और छात्रों के खिलाफ लगाए गए राष्ट्रद्रोह के आरोप वापस लिए जाने चाहिए। यह देश की तमाम जनतांत्रिक ताकतों की मांग है। कन्हैया का प्रकरण, हिंदुत्ववादी हमले के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन गया है।
एबीवीपी तथा आरएसएस के तत्वों को छोडक़र, विश्वविद्यालय के सभी छात्र तथा शिक्षक, जेएनयू पर इस हमले के खिलाफ एकजुट होकर लड़ रहे हैं। देश की तमाम जनतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष तथा प्रगतिशील ताकतों को उनके संघर्ष को अपना पूरा-पूरा समर्थन देना चाहिए क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ जेएनयू की नहीं है। यह एक प्रतिक्रियावादी सांप्रदायिक विचारधारा तथा अविवेक की ताकतों के खिलाफ कहीं बड़ी लड़ाई का हिस्सा है। इस तरह जेएनयू की हिफाजत की लड़ाई, हिंदुत्ववादी तानाशाही के खिलाफ कहीं बड़ी लड़ाई का हिस्सा बन गयी है। 0