शिप्रा शुक्ला
चेन्नई। 27 सितम्बर की तारीख जो अभी तक स्वामी विवेकानंद के अमेरिका में भाषण के लिए याद की जाती है, अब से सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी के यूनाइटेड नेशंस के हिंदी भाषण के लिए ही याद नहीं की जाएगी, बल्कि शायद तमिलनाडु के राजनैतिक और सामाजिक जीवन में भी एक नया अध्याय जोड़ेगी। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता का 18 साल से चल रहा आय से ज्यादा संपति का मुकदमा निचली अदालत में निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया और जयललिता और उनके साथियों को दोषी मान कर उन्हें चार साल की सजा सुनाई गई। इसके साथ ही प्रदेश मानों दो धड़ों में बंट गया और जया समर्थक और जया विरोधी, मोटे तौर पर द्रमुक समर्थक, दोनों पक्ष अपने अपने हाई फ़िल्मी अंदाज़ में अपनी ताकत और ख़ुशी और गम के रूप में दर्शाने लगे। पलक झपकते ही न सिर्फ बेंगलुरू में जहाँ इस मामले की सुनवाई हो रही थी बल्कि पूरे तमिलनाडु में सड़क, दुकानें, होटल, दफ्तर, स्कूल आदि सब बंद हो गए। शनिवार का यह दिन सुबह से ही या तो बिजली गुल होने, टीवी ट्रांसमिशन न आने या फिर फ़ोन न लग पाने के कारण लोगों में तरह-तरह की अटकलें लगाने को मजबूर कर रहा था। प्रदेश में रहने वाला हर व्यक्ति आशंका और डर से न्यायालय के फैसले के इंतजार में था। और फैसला आते ही सबसे पहले लोगों ने एक दूसरे को याद दिलाना शुरू कर दिया कि घर से न निकलें और किसी भी नेटवर्किंग वेबसाइट पर निर्णय के बारे में कुछ न कहें। लोगों का डर फ़िज़ूल न था, शाम होते होते पूरे प्रदेश में तोड़फोड़ी और आगजनी की ख़बरें आने लगी।

शुरआती हंगामे की अफरातफरी से हट कर नज़र डाले तो लगेगा कि जयललिता को जेल मिलने के साथ ही प्रदेश राजनीति और कुछ हद तक देश की राजनीति में अब शायद एक नया अध्याय शुरू हो रहा है। द्रमुक खेमे में विजय के दावे हो रहे हैं और बधाईयां दी जा रहीं हैं। द्रमुक इस समय प्रदेश में लोकप्रियता के सबसे निचले आयाम पर है। टू जी घोटाले में जेल काट चुके करूणानिधि की बेटी कनुमुई और नेता राजा, करूणानिधि के बेटों स्टालिन और अलागिरी में उत्तराधिकार को लेकर रस्साकशी और लोकसभा चुनावों में पार्टी की करारी हार द्रमुक के लिए काफी परेशानी का कारण है। दूसरी तरफ उनका प्रमुख प्रतिद्वंदी दल अन्नाद्रमुक एक के बाद एक सफलता हासिल करता जा रहा था। पहले 2011 के विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत और अब लोकसभा चुनाव और स्थानीय निकाय चुनाव में भारी सफलता किसी भी विरोधी के लिए नींद ख़राब करने का कारण हो सकती है। अपनी अम्मा कैंटीन, अम्मा पानी, अम्मा दवाई जैसी कल्याणकारी नीतियों के चलते अन्नाद्रमुक बल्कि ये कहना बेहतर होगा कि अम्मा जयललिता इस समय प्रदेश में सफलता के अब तक के सबसे ऊँचे मुक़ाम पर है।

जयललिता का जेल जाना द्रमुक के लिए लाटरी निकलने जैसा है। जाहिर है द्रमुक खेमा अब किसी तरह प्रदेश राजनीति में अपने पैर ज़माने की पूर जोर कोशिश करेगा। तमिलनाडु में 2016 में विधानसभा चुनाव होने है। यदि जयललिता तब तक जेल में रहती हैं तो द्रमुक को अपने पैर ज़माने में आसानी जरूर रहेगी हालाँकि द्रमुक को पहले अपने दल की भीतरघात से निबटना होगा।

अन्नाद्रमुक जिसका पिछले दो दशकों से एक मात्र चेहरा जयललिता रहीं है, उसके लिए यह फैसला एक तरह की अग्नि परीक्षा है। वे प्रदेश की सरकार बनाये हैं इसलिए फैसले का विरोध रोकना और कानून व्यवस्था बनाये रखना भी उनकी ही जिम्मेवारी है। ठीक उसी तरह जैसे जयललिता को अपने स्थान पर ऐसा मुख्यमंत्री चुनना जो रिमोट से चले। अच्छा हो, लेकिन इतना अच्छा भी नहीं कि जब जयललिता सजा काट कर लौटे तो प्रदेश की जनता उन्हें भुला चुकी हो। हालाँकि एमजीआर के बाद से अन्नाद्रमुक जयललिता के नाम से ही चलती आई है और इस सरकार ने न सिर्फ योजनाये शुरू कर बल्कि उन्हें बखूबी चला पूरे देश में बेहतर नाम कमाया है और जयललिता एक कुशल प्रशासक के रूप में जानी गईं। अन्नाद्रमुक धड़ा इस मुक़दमे को भले ही राजनीतिक करार दे जनता की सहानुभूति बटोरने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। तस्वीर का सबसे रोचक पक्ष हैं, प्रदेश में भाजपा या उसके सहयोग से किसी तीसरे धड़े का खड़ा होना। यह महज संयोग हो सकता है कि भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की 18 वर्ष पहले दायर की गई याचिका पर मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी खो कर जेल की चहारदीवारी में बंद हो गई है लेकिन यह स्थिति भाजपा को प्रदेश की राजनीति में अपनी आमद के लिए एक झरोखा जरूर खोल रही है। 2014 के लोकसभा चुना में भाजपा ने यह कोशिश की थी और सीट न मिलने के बावजूद भाजपा और उनके घटक के प्रत्याशियों का मत प्रतिशत ऊपर आया है। पिछले चार-पांच दशकों से द्रविड़ दल तमिल पहचान और प्रदेश के विकास जैसे मुद्दों को लेकर राजनीति करते आये हैं और दोनों प्रमुख दल द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों बारी-बारी से प्रदेश की सत्ता पर काबिज रहे हैं। कांग्रेस भी इनमें से किसी एक का सहारा लेकर अपना महज अस्तित्व बनाये रही है। ऐसे में जब एक बड़े द्रविड़ दल का लोकप्रिय नेता जेल में हो और दूसरा दल भी भ्रष्टाचार और भीतरघात से ग्रस्त हो, प्रदेश की राजनीति में एक निर्वात अवश्य पैदा हुआ है। देखना यह है कि न्यायालय के फैसले के बाद कौन सा दल किस तरह से जूझेगा और राजनीतिक उठापटक में ऊपर या नीचे जाएगा।

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जनादेश न्यूज़ नेटवर्क