अपना सम्मान गंवा चुके लोग दूसरों को सम्मान की गारंटी दे रहे हैं!
‘आप’ की और भाजपा की जीत साझा है। कांग्रेस की हार कारपोरेट की हार नहीं है।
कारपोरेट कपट का बढ़ता कारोबार-3
प्रेम सिंह
जिन समाजवादियों ने (वाया अन्ना-रामदेव) केजरीवाल की चूडि़यां पहनी हैं, यह उनका पहला वरण नहीं है। वे भ्रष्ट किंतु सफल समाजवादियों से लेकर ईमानदार किंतु असफल समाजवादियों तक, और कांग्रेस से लेकर भाजपा तक सत्तर घाटों का पानी पी चुके हैं। दिल्ली में हमने देखा है समाजवादी पार्टी के खाते की एक राज्यसभा सीट खाली होने पर खाली बैठे कई समाजवादी सक्रिय हो जाते हैं। सुनते है सामंती दौर में बूढ़ी होती रानियां इस डर से कि उनके रनिवास वृद्धा-आश्रम न बन जाएं, अपने कुल की युवतियों को रानी-सुख भोगने का लालच देकर राजा से शादी करा देती थीं। रनिवास पर कब्जा राजा पर कब्जा होता था। जिसका राजा पर कब्जा वही पटरानी।
केजरीवाल की नजरों में चढ़े रहने के लिए बुढ़ाते समाजवादी एक तरफ दिन-रात मेहनत करके दिखाने में लगे हैं कि वे थके नहीं हैं; दूसरी तरफ समाजवादी युवाओं को केजरीवाल की ‘रानी’ बनाने का झांसा देकर फांसने में लगे हैं। उन्हें फुसलाते हैं उनके साथ आने पर सम्मान मिलेगा और सत्ता भी। अपना सम्मान गंवा चुके लोग दूसरों को सम्मान की गारंटी दे रहे हैं!
दिल्ली की जीत और सरकार बनने की संभावना के बाद कई समाजवादी वृद्धात्माएं युवाओं को पीछे धकेल कर आगे आने की धक्का-मुक्की कर रही हैं। कहते हैं आत्मा कभी बूढ़ी नहीं होती। अपने संघर्ष और अनुभव का वास्ता देते हैं कि केजरीवाल को समाजवादी बनाने में उनकी विशेषज्ञता सबसे ज्यादा काम आएगी। समाजवाद का कुछ ज्यादा ही दम भरने वाले एक पुराने समाजवादी ने बड़े नखरे के साथ केजरीवाल की चूडि़यां पहनी हैं। उन्हें सावधानी बरतनी चाहिए। बूढ़ी रानियों का नखरा ज्यादा नहीं सहा जाता है। हमें डर है सारे समाजवादी उधर टूट पड़े तो राशनिंग करनी पड़ेगी। कंप्युटर में लिस्ट बनेगी, टोपी देकर कहा जाएगा आप ‘वार रूम’ की उस खिड़की पर जाइए, अपना बायोडाटा लिखाइए, पहले आने वाले पहले पाएंगे, आते रहिए, टोपी उतारनी नहीं है, कुछ ज्यादा ले जाइए, घर वालों को भी पहनाइए! ये वही समाजवादी हैं जिनमें कोई कहता था ‘समाजवादियों पर किसी की सत्ता का रौब गालिब नहीं होता’ और कोई अपने को परम पवित्र समाजवादी मान कर दूसरों को हिकारत की नजर से देखते थे।
कारपोरेट पूंजीवाद की विचारधारा उत्तर आधुनिकता में इतिहास के अंत की काफी पहले घोषणा हो चुकी है। अब अकेला पूंजीवादी इतिहास ही नए-नए रूपों में नई देहरियां पार करता हुआ आगे बढ़ता है। एक साथी को ‘आप’ की जीत में इतिहास की ऐसी ही नई देहरी दिखाई दी है जिस पर खड़े होकर उन्होंने इस ‘नवेली’ राजनीति को ‘पालागन’ किया है। इतना ही नहीं, उन्होंने नवेली के संभावनाओं से भरपूर गर्भ में भी झांक कर देख लिया है। बेहतर होता वे उस गर्भ पर भी नजर डाल लेते जिससे यह पार्टी पैदा हुई है। तब शायद उन्हें पता चलता कि नवउदारवाद की कोख से पैदा और उसी की दाइयों द्वारा पोषित पार्टी में नवउदारवाद के खात्मे की नहीं, मजबूती की पूरी संभावनाएं निहित हैं।
एक अन्य समाजवादी साथी ने हमारे लेख ‘कारपोरेट राजनीति की नई बानगी’ पर हमें पत्र लिखा। उस पत्र में उन्होंने एक अजीब बात लिखी कि जिस पत्रिका (समयांतर, अक्तूबर 2013) में लेख छपा है, वह लोहियावादी नहीं है। हालांकि पत्र लेख का अंग्रेजी संस्करण (मेनस्ट्रीम, 9 नवंबर 2013) आने के बाद लिखा गया है। हम ‘मेनस्ट्रीम’ के संपादक सुमित चक्रवर्ती जी का लेख प्रकाशित करने के लिए हृदय से आभार व्यक्त करते हैं। वरना कुछ ‘बदनाम’ हिंदी पत्रिकाओं के अलावा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और उस पार्टी, जिसके लिए वह आंदोलन खड़ा किया गया था, की समीक्षा करने वाला लेख कहीं भी छप नहीं सकता। जाहिर है, साथी ने हिंदी में लिखे लेख का नोटिस लेना मुनासिब नहीं समझा। उसी तरह जैसे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, उसकी टीम और अंत में बनाई गई राजनीतिक पार्टी के बारे में हिंदी में लिखे हमारे कई लेखों का नोटिस उन्होंने नहीं लिया जो ‘युवा संवाद’ और हस्तक्षेप.कॉम में छपते रहे हैं। ‘युवा संवाद’ को लोहिया-विरोधी पत्रिका शायद ही कोई माने। नवउदारवादी दौर ने भारतीय भाषाओं को काफी पीछे धकेला है। ‘सामयिक वार्ता’ जैसी पत्रिका में एक साथी का लेख अंग्रेजी के पक्ष में छपा। उसका जवाब डॉ. मस्तराम कपूर ने दिया था।
इस प्रकरण में हम आदरणीय साथी से इतना निवेदन करना चाहते हैं कि वे भले ‘लोकशक्ति’ पत्रिका में केजरीवाल के विचार-साक्षात्कार प्रकाशित करके उसे सच्ची लोहियावादी पत्रिका के रूप में प्रचारित-स्थापित करें; हमें लोहिया पर बहस करने लायक न समझें।
पत्र में यह भी लिखा था कि हम अगला लेख दिल्ली चुनाव के परिणाम आने के बाद लिखें। उन्हें इंतजार रहेगा। यानी जब पार्टी जीत कर आ जाएगी तब हम क्या कहेंगे? क्या कह पाएंगे? जीत सारी आलोचनाओं का मुंह बंद कर देती है। ‘आप’ की और भाजपा की जीत साझा है। कांग्रेस की हार कारपोरेट की हार नहीं है। मोदी ने इंग्लैंड और यूरोपियन यूनियन की हिमायत भी जीत ली है, कल को अमेरिका की हिमायत भी जीत ली जाएगी। तो क्या मोदी का समर्थन कर देना चाहिए? क्या कांग्रेस की जीत पर उसका विरोध बंद कर देना चाहिए था?
किशन पटनायक ने ‘गुलाम दिमाग का छेद’ शीर्षक से एक बहुचर्चित लेख लिखा है जिसमें भारतीय बुद्धिजीवियों की दिमागी गुलामी का विश्लेषण है। वे होते तो देख पाते कि समाजवादियों में दिमाग की जगह खाली छेद ही रह गया है। लगातार पराजयों के बीच राजनीतिक सरोकार और सक्रियता बनाए रखने के लिए जिजीविषा की जरूरत होती है। लोहिया लगातार हारते रहे। गरीब उनकी जिजीविषा का स्रोत थे। वे कहते थे कि मेरे लिए इतना बहुत है कि इस देश के गरीब लोग मुझे अपना आदमी मानते हैं। आज गरीबों के साथ कपट करके कारपोरेट का कारोबार बढ़ाने वाले नेता और पार्टी के साथ समाजवादी जुट गए हैं।
प्रायः सभी आंदोलनों और विचारधारात्मक समूहों में समय-समय पर विचलन होता है। विचलन सत्ता की फिसलन न मानी जाए, इसके लिए नेता उसे सैद्धांतिक अथवा रणनीतिक जामा पहनाने की कोशिश करते हैं। भारत की राजनीति में ऐसे अनेक उदाहरण है जिनकी अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग परिप्रेक्ष्य से व्याख्या करते हुए अक्सर मिसाल दी जाती है। समाजवादी जो कर रहे हैं वह विचलन नहीं, विचारधारात्मक व्यभिचार है। एक समय के महान आंदोलन की अभी तक की सबसे नीच ट्रेजेडी!
आगे भी जारी...
समाजवादी चिंतक डॉ. प्रेम सिंह सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।