ऋषभ कुमार मिश्र

भारत के उच्च शिक्षा परिसरों की आबोहवा बदल रही है। एक नई हवा आजकल बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के परिसर में बही है। यहां की छात्राएं परिसर में अपनी सुरक्षा के मुद्दे को लेकर अनशन पर बैठी हैं। इस घटना की अनेक व्याख्याएं करने से पहले बनारस और इस विश्वविद्यालय के मिजाज को कुरेदना आवश्यक है।

बताने की आवश्यकता नहीं कि बनारस एक धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाला शहर है जिसके नगरीय जीवन में आज भी पुरातनपंथी मान्यताएं व्याप्त हैं। आजकल यहां आधुनिक और वैश्विक नगरों के जैसी विशेषताएं प्रकट हो रही हैं। यहां आज भी महिलाओं द्वारा पाश्चात्य सभ्यता के प्रतीकों के ‘भारतीयकरण‘ को ‘ठीक नहीं‘ माना जाता फिर भी सार्वजनिक स्थल पर महिलाओं की मौजूदगी को स्वीकार किया जाने लगा है।

यह शहर आसपास के कस्बों से आकर बस गए प्रवासियों से आबाद हुआ है जो अपनी जातीय, क्षेत्रीय, भाषायी और सामुदायिक अस्मिता को वैयक्तिक अस्मिता से पहले रखते हैं। इस कारण उनके लिए वैयक्तिक स्वतंत्रता और निर्णय से पहले सामाजिक स्वीकृति महत्वपूर्ण है। इस परिवेश में पुरूष का ‘पुरूष‘ की तरह रहना और स्त्री का ‘स्त्री‘ की तरह रहना एक सामाजिक मानक है। इस मानक से इधर-उधर होना सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरा माना जाता है। विशेषकर, यदि महिलाएं इन मानकों से इधर-उधर होती हैं तो इन्हें ‘इजी टू हैंडल‘ (इनके साथ कुछ भी कर सकते हैं) माना जाने लगता है। इस समाज की स्त्री आज भी हाउसवाइफ की भूमिका में ‘अच्छी‘ मानी जाती है। हां इतना फर्क जरूर आया है कि अब वह पढ़ी-लिखी है और उसे सरकारी या निजी विद्यालयों में अध्यापन जैसे पेशों में जुड़ने की आजादी है। ऐसे सांस्कृतिक परिवेश में स्थित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में दिल्ली और मुंबई जैसे औद्योगीकृत और नगरीय स्थलों पर स्थित संस्थानों की संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती।

यह भी उल्लेखनीय है कि उच्च शिक्षा के नए केन्द्रों के विकसित हो जाने के कारण इसका राष्ट्रीय स्वरूप थोड़ा कमजोर हुआ है। हालांकि यहां देश भर से विद्यार्थी पढ़ने आते हैं फिर भी ध्यान रखिए जो दिल्ली जा सकते हैं, जिन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा पास कर ली है और जो इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई की सुविधा अर्जित करने में सक्षम हैं वे प्रायः बड़े महानगरीय केन्द्रों की ओर प्रवास कर रहे हैं। यहां के अधिकांश विद्यार्थी कस्बों और गांवों से आते हैं और विश्वविद्यालय के छात्रावासों में रहते हैं। इन विद्यार्थियों का समाजीकरण ऐसे परिवेश में होता है जहां सार्वजनिक स्थल पर महिलाओं की उपस्थिति अनोखी घटना होती है। जहां लड़के-लड़कियों के बीच संस्कार की अदृश्य दीवार उपस्थित रहती है। समाज के द्वारा थोपे गए अपेक्षित व्यवहारों के ये मॉडल जब बी.एच.यू. और बनारस पहुंचते हैं तो पुनः अल्हड़पन के नाम पर पुरूषवादी मानसिकता के नए संस्करण में संस्कारित होते हैं। इसके बरक्स लड़कियों का समाजीकरण चेतना के दमन के साथ शुरू होता है। उन्हें सवाल करने, टोकने, आपत्ति जाहिर करने के बदले खुद को भौतिक और मानसिक बंधनों में बंधना सिखाया जाता है। कक्षा और छात्रावास के अलावा इन दोनों स्थानों को जोड़ने वाली सड़कें ही उनके विद्यार्थी जीवन का एकमात्र सार्वजनिक स्थल होती हैं। तुर्रा यह कि इन सड़कों पर भी वे न तो खुलकर चल सकती हैं, बोल सकती हैं, हंसना तो दूर की बात।

लड़कियों को सिखाया जाता है कि पुरूषों के लपंट व्यवहार से निपटने का तरीका उनसे रास्ता बचाना है। यह सीख उनकी चेतना का दमन प्रारंभ करती है और वे खुद को एक कमजोर समूह का सदस्य मानने लगती हैं। इस कमजोर समूह को ‘कैद में आजादी‘ दी जाती है। वे कैसा महसूस कर रही हैं? यह प्रश्न गौण रहता है और क्या वे सुरक्षित हैं? यह प्रश्न पूछा जाता है। इस बंदिश का मूर्त उदाहरण महिला छात्रावास है।

मानाकि छात्रावास की ऊँची दीवारों पर नुकीली और कटीली तारें, हर झरोखे पर अपारदर्शी चादरें अराजक तत्वों के निगाहों से लड़कियों को बचाती हैं लेकिन खुली हवा में जीने के अधिकार को छीन लेती हैं। रात्रि का भय घड़ी की सूइयों पर सवार होकर रोज इनके जीवन में आता है और इन्हें घरौंदे में छुपने की ताकीद कराता है।

शिक्षा परिसरों में किस तरह से अनुशासन के हथकंडे एक ही पक्ष-महिलाओं, को ‘आदर्श महिला‘ बनाने पर तुले हैं इसका प्रमाण इस तथ्य से लगा सकते हैं कि लड़कों के हॉस्टलों में इस तरह के सख़्त नियम न के बराबर होते हैं।

विडंबना देखिए आधी दुनिया की सुरक्षा को जिनसे खतरा है उन्हें बांधने के कोई नियम नहीं है बल्कि इस आंधी दुनिया को ही कैद में रखने के लिए व्यवस्था भी मुस्तैद है।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में इस तरह का विरोध का होना स्त्री-शक्ति में स्वतंत्र चेतना के प्रस्फुटन और समाज की जड़ता के टूटने का प्रमाण है। कुछ लोग इस आंदोलन को अन्य विश्वविद्यालयों के राष्ट्रविरोधी आंदोलनों और वर्तमान सरकार विरोधी आंदोलनों के रूप में देख रहे हैं। यह दृष्टि आंदोलन के स्त्रीवादी पक्ष को कमजोर कर रही है। यह विशुद्ध स्त्रीवादी आंदोलन है जिसके मूल शून्य सहनशीलता (जी़रो टॉलरेंस) निहित है। महिला छात्रावासों में जो पीयर कल्चर विकसित हो रहा है वह क्रान्तिकारी है। यह क्रान्ति संस्कृति को तोड़ने के लिए नहीं है बल्कि संस्कृति के फलक पर अपने हिस्से को संभालने की है। इसका प्रमाण है कि ये लड़कियां ‘लोग कया कहेंगे‘ के प्रश्न को किनारे करके अपने लिए उठ खड़ी हुयीं है।

यह आंदोलन स्पष्ट संदेश है कि सुरक्षा का अर्थ भौतिक बंधनों में जकड़ना नहीं है। इसी तरह लड़कियों का विरोध प्रमाण है कि लड़कों की उच्श्रृंखलता को बनारसी मिजाज कहकर टालना लड़कियों के अस्तित्व का अपमान करना है।

कुछ लोग इस विरोध को महिला स्वछंदता कहकर प्रचारित कर रहे हैं। इसके समर्थन में वे भविष्य का ऐसा चित्र प्रस्तुत कर रहे हैं जहां लड़कियां मदिरा और धूम्रपान के मॉडल को अपनाने को आतुर होगीं। यह दुष्प्रचार महिला स्वतंत्रता को एक संकीर्ण दृष्टि से देखता है लेकिन यह दृष्टि अभिभावकों में एक भय पैदा करती है जिसके प्रभाव में वे ‘कहीं बेटी बिगड़ न जाए!‘ के भय से समाज की जड़ताओं को बनाए रखना चाहेगें।

यहां ध्यान रखना होगा कि उन्मुक्त स्वभाव वाली लड़की का बिगड़ैल होना एक पुरूषवादी व्याख्या है जो इस उन्मुक्तता में आनंद खोजने की फिराक में है।

इस आंदोलन को लड़कियों के सशक्तिकरण का प्रमाण मानिए। अब तक लड़कियों के संबंध में शिक्षा की भूमिका उन्हें पुरूषों का पूरक बनाने की देखी जाती रही है। इस दृष्टि में स्त्रियों के स्वतंत्र भूमिका का अभाव है। वर्तमान आंदोलन प्रमाण है कि कस्बाई जीवन से निकलकर आने वाली लड़कियां केवल अपना ‘कल्याण‘ नहीं चाहती वे अपनी आवाज और अस्तित्व के लिए लड़ रही है। तो क्या यह समझा जाए कि शिक्षा ने इनमें मुक्ति की चेतना पैदा की है? इस निष्कर्ष तक पहुंचना जल्दबाजी होगी। हां यह जरूर कहा जा सकता है शिक्षा के प्रभाव में परिसर की आबोहवा बदल रही है। ज्ञान के लिए शिक्षा के साथ सामाजिक बदलाव के लिए सक्रियता देखने को मिल रही है। इस तरह के आंदोलन को सशक्तिकरण का शिक्षाशास्त्र मानना चाहिए और इनसे कुछ सार्थक रास्ते तलाश किए जाने चाहिए न कि दमन और उत्पीड़न के लिए मौन और हिंसा का रास्ता अपनाना चाहिए।

ऋषभ कुमार मिश्र

सहायक प्रोफेसर

शिक्षा विभाग

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय