साँप छछूंदर की गति हो गयी हरियाणा के अतिथि अध्यापकों की
साँप छछूंदर की गति हो गयी हरियाणा के अतिथि अध्यापकों की
जग मोहन ठाकन
हिसार। "अतिथि देवो भव:" के लिये प्रसिद्ध हरियाणा प्रदेश का शिक्षा विभाग जहाँ एक तरफ अतिथि अध्यापकों से छुटकारा पाने का रास्ता तलाश रहा है, वहीं प्रदेश के शिक्षा विभाग में कार्यरत लगभग पन्द्रह हजार अतिथि अध्यापक "मान न मान मैं तेरा मेहमान की शैली में आंदोलन का रुख अपनाये हुये हैं। दोंनो की इस रस्साकसी में पिस रहा है बेचारा छात्र।
बताते चलें कि 2005 से 2007 के मध्य हरियाणा के शिक्षा विभाग ने स्थायी अध्यापकों की नियुक्ति होने तक लगभग पन्द्रह हजार अतिथि अध्यापक नियुक्त किये थे। परन्तु आज तक आठ वर्ष बीत जाने के बावजूद सरकार अध्यापकों की नियमित भर्ती के माध्यम से स्कूलों में खाली पदों को भरने में असफल रही है या यों कहे कि स्थायी भर्ती से कन्नी काटने में सफल रही है। समय- समय पर इन पन्द्रह हजार अध्यापकों को विभिन्न संवर्गों में अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया गया था। इनको जे बी टी, बीएड तथा पीजीटी अध्यापक के पदों पर नियमित अध्यापकों के समान वेतन देने की बजाय आधे वेतन पर कार्य करवाया जा रहा है। अतिथि अध्यापकों का कहना है कि उनसे नियमित अध्यापकों के बराबर कार्य लिया जा रहा है, परन्तु वेतन आधा दिया जा रहा है, जबकि अदालत द्वारा कर्इ बार समान कार्य समान वेतन के सिद्धांत को मान्यता दी जा चुकी है। हालाँकि अतिथि अध्यापकों का मानना है कि वे कम वेतन में भी नियमित अध्यापकों से बेहतर परीक्षा परिणाम दे रहे हैं, परन्तु उन पर किसी भी समय नौकरी से हटाये जाने की लटकती तलवार के कारण उनका व्यकितगत एवं पारिवारिक जीवन संकट में पड़ गया है। उनकी गति साँप छछूंदर की हो गयी है। न नौकरी छोड़ते बनता है और न नौकरी का एक पल का भरोसा है। सरकार द्वारा हाल में चलार्इ जा रही रेशनेलाइजेशन प्रक्रिया पर अतिथि अध्यापको का आरोप है कि सरकार रेशनेलाइजेशन के नाम पर अतिथि अध्यापकों को नौकरी से वंचित करना चाहती है। उनका कहना है कि सरकार कभी रिक्तियों का तथा कभी पात्रता परीक्षाओं का बहाना बनाकर शिक्षा विभाग में अपने जीवन के कीमती आठ वर्ष न्योछावर करने वाले मेहनती अतिथि अध्यापकों को पुन: बेरोजगारों की पंक्ति में खड़ा करना चाहती है।
अतिथि अध्यापक करो या मरो की नीति पर आंदोलन का रास्ता अखितयार किये हुये हैं। उनका कहना है कि जब तक सरकार उनकी नौकरी को स्थार्इ करने की गारंटी नहीं देगी, वे आंदोलन जारी रखेंगे। अतिथि अध्यापक विवाद पर सरकार तथा अध्यापक यूनियनों के पास अपने-अपने पक्ष में चाहे कितने ही तर्क क्यो न हों, पर इतना तो सुनिश्चित है कि सरकार की इस ढुलमुल नीति के कारण सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर गिरावट की दिशा में अग्रसर है। यदि सरकार अतिथि अध्यापकों को नियमित करने के योग्य नहीं मानती है और सरकार का आंकलन यह है कि अतिथि अध्यापक स्थायी श्रेणी की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं तो क्यों इतने वर्षों से ऐसे अध्यापकों के माध्यम से प्रदेश के नौनिहालों का भविष्य दांव पर लगाया जाता रहा है ? क्या उन छात्रों का वह काल दोबारा लौटाया जा सकेगा ? यदि सरकार इन अतिथि अध्यापको को "नीम हकीम" मानकर कम वेतन देकर शिक्षा जैसे क्षेत्र में खानापूर्ति कर रही है तो यह सरकार का प्रदेश के छात्रों के साथ विश्वासघात है और यदि सरकार इन अतिथि अध्यापकों को योग्य मानती है तो क्यों न सरकार इनको नियमित कर शिक्षा क्षेत्र में रिक्त पड़े स्थानों पर इनको सेवा करने का मौका देना चाहती ?
कारण जो भी हो सरकार को हठधर्मिता छोड़कर अपने द्वारा नियुक्त अतिथि अध्यापकों से अतिथि तुल्य सम्मान नहीं तो कम से कम अपने मातहत कर्मचारियों के समान व्यवहार तो करना ही चाहिए। प्रदेश एवं विधार्थियों के हित में यही है कि शीघ्रतम समस्या का सम्मानजनक हल निकाला जाये ताकि सितम्बर माह में मनाया जाने वाला शिक्षक दिवस सार्थक हो सके।


