हथौड़ा : दबंग होते मच्छर
हथौड़ा : दबंग होते मच्छर
अंशुमाली रस्तोगी
परिवेशगत बदलाव को इंसान से कहीं ज्यादा मच्छरों ने आत्मसात किया है। इधर कुछ वर्षों में मच्छरों के भीतर बला का बदलाव देखने-सुनने को मिला है। दरअसल, यह नई सदी के 'दबंग मच्छर' हैं। न किसी से दबने वाले न किसी की परवाह करने वाले। अपनी ही हेकड़ी में चौबीस घंटे मदमस्त रहते हैं। देख रहा हूं इन पर न असर अब आलआउट का होता, न फॉगिंग का। ससुरे सबको दबा-पचा जाते हैं। हाथ से मारने को कोशिश करो भी तो महज ताली ही बजकर रह जाती है, खुद न जाने कहां फुर्र हो जाते हैं।
इधर कुछ समय से देखने-पढ़ने में आ रहा है कि इंसान मच्छरों से ज्यादा डरने लगा है। गोया मच्छर न हुआ कोई भूत हुआ! यूंही तो इंसान ने घर-बाहर तमाम इंतजाम कर रखे हैं मच्छरों से बचाव के लेकिन इसके बाद भी कोई भी कोई न कोई इनकी दबंगई की चपटे में आ ही जाता है। है न कितनी कमाल ही बात कि हमारे पास सांप काटे का तो इलाज है परंतु मच्छर काटे का नहीं।
मच्छर भी इंसान को काटकर हंसते जरूर होंगे कि रस्साला हमारी तुलना हिजड़े से करता है, ले अब भुगत। एक दफा काट खाया तो यमराज भी नहीं बचा सकते।
भई मच्छरों की 'बेखौफ दबंगई' को देखते-समझते हुए मैं तो इनसे बेहद इज्जत व सम्मान के साथ पेश आता हूं। घर के किसी जालायुक्त कोने, ठहरे पानी, गंदे डिब्बे आदि में अगर कहीं कोई मच्छर महाराज नजर आ भी जाते हैं तो देखकर भी अनदेखा कर देता हूं। कहीं से कुछ नहीं हटाता, खुद ही हटना उचित समझता हूं। पत्नी को भी सख्त हिदायत दे रखी है कि घर में न आलअआउट जलेगा, न गोबर के कंडे। वैसे अभी तक तो नहीं आए हैं, अगर नगर निगम से फागिंगवाले आते भी हैं, तो उनसे कह देना कि हमारा घर छोड़कर दूसरे घरों पर धुंआ छोड़ें। मैं नहीं चाहता कि मच्छर महाराज मुझसे कभी किसी बात पर नजर हो जाएं और अपनी दबंगई को कहीं मुझ पर ही न आजमा लें। मैं तो इतना जानता हूं कि इज्जत दो तो इज्जत मिलेगी।
देखिए बुरा तो बेचारे मच्छरों को भी अवश्य लगता होगा कि एक तो वे हमें काटकर अपनी भूख मिटाएं और हम उन्हें बिना सोचे-समझें चट से मार दें। यह गलत बात है। बेचारों पर सरासर जुलम है। अगर आप किसी से उसका हक छिनेंगे तो क्या वो क्रोधित न होगा? दरअसल, यह डेंगू नामक बीमारी मच्छरों का इंसानों के खिलाफ 'खुला प्रतिवाद' है। अभी तक वे मौन थे मगर अब दबंग हो चले हैं। मुझे यह समझ नहीं आता कि इंसान का मच्छरों को जरा-सा खून देने में जाता क्या है? आखिर मच्छरों का पेट ही कितना-सा होता है? मतलब कि इंसान इंसान का खून चूसे तो जायज और अगर मच्छर चूस ले तो नाजायज। यह क्या बात हुई भला!
मैं तो इस बात का पूरा ध्यान रखता हूं कि अगर मच्छर मेरे शरीर के किसी भी अंग का खून चूस रहा है, तो उसे तब तक चूसने देता हूं, जब तब कि बेचारे का पेट नहीं भर जाए। मेरी इस नेकनीयत का ही परिणाम है कि मच्छर मुझ पर मेहरबान बने हुए हैं। अरे, मैं तो आप लोगों से भी कहता हूं कि आप भी मेरे जैसे ही हो-बन जाइए। और हां मेरी तरह हनुमान चालीसा की जगह अब से मच्छर चालीसा पढ़ना और शुरू कर दीजिए, प्रत्येक मच्छरयुक्त बीमारी से बचे रहेंगे।


