जिंदा इंसानों को जलाने की संस्कृति या विकृति? फादर ग्राहम स्टेन्स हत्याकांड और भारत में अल्पसंख्यक हिंसा की परंपरा
फादर ग्राहम स्टेन्स और उनके बच्चों को जिंदा जलाने की घटना पर डॉ. सुरेश खैरनार का विचारोत्तेजक लेख, जो हिंदुत्ववादी हिंसा और अघोषित हिंदू राष्ट्र की पड़ताल करता है।
फादर ग्राहम स्टेन्स हत्याकांड: 23 जनवरी 1999 की वह रात
- फादर ग्राहम स्टेन्स : आदिवासियों और कुष्ठरोगियों की सेवा में समर्पित एक जीवन
- फादर ग्राहम स्टेन्स नरसंहार की बरसी 23 जनवरी
- जिंदा जलाने की परंपरा: मनुस्मृति से आधुनिक भारत तक
- हिंदुत्ववादी भीड़ और अल्पसंख्यकों के खिलाफ संगठित हिंसा
- ग्लाडिस स्टेन्स का क्षमा संदेश: मानवता की सबसे ऊंची मिसाल
- गुजरात दंगे, कंधमाल और चर्चों पर हमलों की श्रृंखला
- संविधान बनाम हिंदू राष्ट्र की राजनीति
डॉ. सुरेश खैरनार का ये लेख, 23 जनवरी 1999 को ओडिशा में फादर ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बच्चों को जिंदा जलाए जाने की घटना पर केंद्रित है। लेखक इस कृत्य को "हिंदुत्ववादी भीड़" द्वारा अंजाम दिया गया बताते हैं और इसे भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की एक लंबी परंपरा का हिस्सा मानते हैं।
* डॉ. सुरेश खैरनार का तर्क है कि यह घटना गुजरात दंगों और अन्य राज्यों में ईसाइयों पर हमलों की एक कड़ी है।
* लेख में मनुस्मृति, संघ परिवार, और वर्तमान सरकार की नीतियों की आलोचना की गई है, जिन्हें लेखक भारत को एक "हिंदू राष्ट्र" बनाने की दिशा में कदम मानते हैं।
* डॉ. सुरेश खैरनार का शांतिप्रिय लोगों से एकजुट होकर इस प्रवृत्ति का मुकाबला करने का आह्वान करते हैं।
जिंदा इन्सानों को जलाने की संस्कृति या विकृति ?
27 साल पहले 22 जनवरी की आधी रात के बाद एक दुखद घटना हुई। 22 जनवरी की आधी रात 1999 की आधी रात में, यानी 23 जनवरी को, हिंदुत्ववादी भीड़ ने फादर ग्राहम स्टेन्स और उनके दो मासूम बच्चों को उनकी गाड़ी में सोते हुए आग लगा दी। भीड़ ने गाड़ी को चारों तरफ से घेर रखा था और हाथों में हथियार लिए खड़े थे ताकि कोई बाहर न निकल सके।
फादर ग्राहम स्टेन्स का भारत से संबंध :
ओडिशा के आदिवासियों के बीच महारोगियों की सेवा के लिए मयूरभंज के महाराज रामचंद्र भंजदेव ने 1895 में मयूरभंज लेप्रसी होम की स्थापना की थी। इसे चलाने के लिए एक ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी महिला केंट एलनबी को सौंपा गया था, जो उस समय 19 साल की थीं। जब केंट 84 साल की हो गईं, तो उनकी मदद के लिए तरुण फादर ग्राहम स्टेन्स जनवरी 1965 में भारत आए, उस समय उनकी उम्र 24 साल थी। उनका जन्म 18 जनवरी 1941 को हुआ था। 23 जनवरी 1999 को जब उन्हें और उनके बच्चों को जलाया गया, उससे पांच दिन पहले (18 जनवरी को) उनका 58वां जन्मदिन मनाया गया था।
घटना का विवरण :
23 जनवरी 1999 को ओडिशा के मनोहर पुकुर नामक स्थान पर, महारोगियों की सेवा करने वाले फादर ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बच्चों (फिलिप्स, ग्यारह वर्ष, और तीमथी हेराल्ड, सात वर्ष) को रात में नींद में उनकी जीप के भीतर आग लगाकर जिंदा जला दिया गया था।
ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान स्थिति :
भारत में मनुस्मृति के समर्थकों द्वारा स्त्री-शूद्रों तथा आदिवासियों को जलाकर मारने की परंपरा हजारों साल पुरानी है। आज भी दंगों में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों से लेकर स्त्री-शूद्रों तथा आदिवासियों के साथ होने वाले अत्याचारों में, उनकी बस्तियों को घेरकर जलाने की घटनाएं बदस्तूर जारी हैं।
श्रीमती ग्लाडिस स्टेन्स का दृष्टिकोण :
श्रीमती ग्लाडिस स्टेन्स ने वहीं रहकर अपने पति के हत्यारों को माफ करने की गुजारिश की और उनके अधूरे काम को आगे चलाने का मनोदय दिखाया। यह यीशु मसीह के "फॉरगिव्ह & फॉरगेट" (क्षमा करो और भूल जाओ) के सिद्धांत का सबसे बड़ा उदाहरण है।
हमले और हिंसा की घटनाएं :
27 साल पहले ओडिशा के कंधमाल जिले के मनोहरपुकुर में इस जघन्य कांड के बाद गुजरात, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में ईसाई धर्म के अनुयायियों पर लगातार हमले किए गए हैं और उनके धार्मिक स्थलों को जलाने का काम भी किया गया है।
2025 के क्रिसमस के दौरान दिल्ली के एक चर्च में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने फादर का आशीर्वाद लिया, और उसी दौरान दिल्ली के दूसरे चर्च में हमलावरों ने तोड़फोड़ करते हुए चर्च में चल रही प्रार्थना को रोकने का प्रयास किया।
ऑल इंडिया सेक्युलर फोरम की जांच :
ऑल इंडिया सेक्युलर फोरम की तरफ से महाराष्ट्र की सीमा से सटे आदिवासी जिला डांग-अहवा के चर्च और चर्च द्वारा चलाए जा रहे आवासीय स्कूलों पर हुए हमलों की जांच में पाया गया कि इस घटना के पीछे संघ परिवार के असीमानंद नामक व्यक्ति ने स्थानीय भील आदिवासियों के द्वारा तथा संघ परिवार की मदद से इन हमलों को अंजाम दिया था। डांग जिले की एक लाख नब्बे हजार आबादी में सिर्फ डेढ़ से दो प्रतिशत ईसाई जनसंख्या है, और लगभग पूरे भारत में ईसाई आबादी का अनुपात बढ़ने की जगह कम ही होने की खबरें हैं, जो आज भी डेढ़ से दो प्रतिशत से अधिक नहीं है।
हाल की घटनाएं :
4 साल पहले क्रिसमस के दौरान कर्नाटक के बेलूर नामक स्थान पर (हसन जिले की घटना) एक प्रार्थना स्थल पर तथाकथित हिंदुत्ववादी लोगों ने हमला किया। 2025 के क्रिसमस के दौरान देश की राजधानी दिल्ली से लेकर अन्य हिस्सों में भी चर्चों पर हमले बदस्तूर जारी हैं। यह चिंता की बात है कि वर्तमान केंद्र में बैठी बीजेपी सरकार के किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति ने अब तक इस तरह की घटनाओं पर चिंता या आपत्ति नहीं जताई है। इसके विपरीत, हरिद्वार से रायपुर तक हिंदुत्ववादी तत्वों के तथाकथित धर्मसंसद के नाम पर अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ विषवमन लगातार जारी है।
संविधान और राजधर्म :
मौजूदा सरकार ने संविधान की शपथ ली है, लेकिन उनके ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए, संविधान की शपथ ग्रहण एक कर्मकांड के अलावा और कुछ भी नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेते हुए कहा था कि वे राज्य के हर नागरिक के जानमाल तथा सुरक्षा की जिम्मेदारी बिना किसी भेदभाव के निभाएंगे। 2014 में प्रधानमंत्री बनने से पहले उन्होंने तीन बार यही शपथ ली थी। इसके बावजूद, 27 फरवरी 2002 के दंगों में उनकी "बहुत ही संगीन भूमिका" रही है। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को नरेंद्र मोदी को कहना पड़ा था कि "आपने राजधर्म का पालन नहीं किया है।" हालांकि उन्हें नानावटी कमीशन और एसआईटी की इंक्वायरी में तकनीकी आधार पर बरी कर दिया गया होगा।
हिन्दू राष्ट्र की ओर :
वर्तमान समय में भाजपा शासित राज्यों में हिंदुत्ववादी लोगों की तरफ से अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ उनके परिवार को घरों में रहते हुए बुलडोजर से नष्ट करने से लेकर उनके खिलाफ जहर उगला जा रहा है। यह सब हिन्दू राष्ट्र की तरफ रास्ता बनाने के लिए वातावरण निर्माण करना जारी है। फादर ग्राहम स्टेन्स और उनके दोनों मासूम बच्चों की शहादत को हिन्दू राष्ट्र के मार्ग पर की शुरुआत बताया गया है। तत्कालीन एनडीए सरकार ने ओडिशा की फादर ग्राहम स्टेन्स और उनके दोनों बच्चों को जलाने की घटना की जांच के लिए जानबूझकर जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में जॉर्ज के साथ मुरली मनोहर जोशी को रखा था, और जॉर्ज फर्नांडिस से गुजरात दंगों से लेकर फादर ग्राहम स्टेन्स और उनके दोनों मासूम बच्चों को जिंदा जलाने की घटना को लेकर एनडीए को क्लीन चिट दिलाने का काम कर लिया है।
राष्ट्रपति के. आर. नारायणन का बयान :
उस समय के राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने कहा था कि "ओडिशा के लोगों ने कुष्ठरोगियों की सेवा कई साल पहले से करने वाले फादर ग्राहम स्टेन्स का आभार मानने की जगह, उनकी हत्या करने वाले लोगों ने, सहिष्णुता तथा मानवतावादी भारत की छवि को नुकसान पहुंचाया है। इस घटना से भारत नीतिभ्रष्ट हो रहा है।"
सांप्रदायिक विद्वेष और संघ परिवार :
संघ परिवार गत 100 सालों से लगातार सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने का काम कर रहा है, ताकि दुनिया के इसी तरह के इंसानियत के गुनहगारों में भारत का भी समावेश हो। 6 दिसंबर 1992 की बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद लगातार देश में सांप्रदायिक अलगाववादी ताकतें जोर पकड़ती जा रही हैं।
प्रधानमंत्री के बयान और अल्पसंख्यक समुदाय :
6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद से देश में सांप्रदायिक और अलगाववादी ताकतें लगातार मज़बूत होती जा रही हैं। और इसी वजह से उन्होंने देश के प्रधानमंत्री के तौर पर तीन बार शपथ ली है। सवाल है कि जब प्रधानमंत्री 15 अगस्त को लाल किले के संबोधन में 135 करोड़ जनता को "टीम इंडिया" कहते हैं, तो क्या उन 135 करोड़ लोगों में फादर ग्राहम स्टेन्स और उनके दोनों बेटे, गुजरात के अहसान जाफरी, इशरत जहां, अखलाक, जुनैद, बिलकिस बानो, कौसरबी, मलिका शेख और अन्य सभी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का समावेश नहीं है, जो आज भयभीत होकर जी रहे हैं? मेरा मानना है कि किसी भी मुल्क में 30-35 करोड़ की अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का असुरक्षितता की मानसिकता में रहना देश के समाज स्वास्थ्य के लिए बहुत संगीन है।
न्यायपालिका और भेदभाव :
केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को जाने की इजाजत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 70 साल बाद दिए जाने का जिक्र करना जरूरी है, जबकि यही लोग महिलाओं को रोकने का काम कर रहे थे। केंद्रीय गृह मंत्री कहते हैं कि "न्यायालय ने बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए फैसला लेना चाहिए।" अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भी इसी आधार पर हुआ है, जहां कोर्ट को आस्था का सवाल मानते हुए बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं को देखते हुए मंदिर निर्माण का फैसला लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। वहीं, जब कोर्ट महिलाओं को मंदिर प्रवेश की इजाजत देता है, तो उसका विरोध होता है। और अगर किसी कोर्ट ने संविधान के अनुसार निर्णय देकर गुजरात के दंगों में बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या जैसे संगीन अपराधियों को गिरफ्तार करने का फैसला दिया है, तो वे बहुसंख्यक समुदाय के होने के कारण आजादी के पचहत्तर साल की आड़ में बाईज्जत बरी कर दिए जाते हैं और उनका फूलमालाएं पहनाकर और मिठाइयां बांटकर स्वागत-सत्कार किया जाता है।
विनायक दामोदर सावरकर और माधव सदाशिव गोलवलकर के विचार :
बैरिस्टर विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी मराठी में लिखित 'सहा सोनेरी पाने' (छह सुनहरे पन्ने) नामक किताब में लिखा है कि "शत्रुओं की औरतें भले ही वह बूढ़ी हो, बच्ची हो या जवान उसे बलात्कार करके भ्रष्ट करना चाहिए।" लेखक छत्रपति शिवाजी महाराज और चिमाजी अप्पा पेशवा के उदाहरण देते हुए सावरकर की इस सोच की आलोचना करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सबसे लंबे समय (33 साल) तक संघप्रमुख रहे श्री माधव सदाशिव गोलवलकर ने भी अपनी किताब में कहा है कि "अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को बहुसंख्यक समुदायों की मेहरबानी के सहारे रहने की आदत डालनी होगी।" इसका मतलब है कि उनकी जानमाल से लेकर उनकी महिलाओं की इज्जत-आबरू भी हिंदुओं की सदाशयता पर निर्भर होगी।
अघोषित हिंदू राष्ट्र:
बिलकिस बानो के गुनहगारों को माफ करने की कृति, फादर ग्राहम स्टेन्स और उनके दोनों बच्चों को जलाने की घटना को अंजाम देने वाले गुनहगारों को, और सबसे महत्वपूर्ण बाबरी मस्जिद विध्वंस से लेकर गुजरात के दंगों के गुनहगारों को सिर्फ क्लीन चिट देना ही नहीं, बल्कि उन्हें पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए विशेष रूप से इस देश के सर्वोच्च पद पर बैठाने की मानसिकता को देखते हुए, हमारे देश में अघोषित हिंदू राष्ट्र की शुरुआत हो चुकी है।
मनुस्मृति और डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर:
जिस मनुस्मृति को संघ भारत का संविधान मानता है, उसके अनुसार ब्राह्मण अगर बलात्कार करता है, तो उसे मामूली सजा देने के बाद छोड़ देना चाहिए।
मनुस्मृति के अनुसार, अगर कोई ब्राह्मण रेप करता है, तो उसे हल्की सज़ा देकर छोड़ देना चाहिए। हिंदुत्व के समर्थकों ने तर्क दिया कि बिलकिस बानो केस के आरोपी ब्राह्मण थे, जेल में उनका व्यवहार अच्छा था, और उनके पास ऐसा अपराध करने का कोई कारण नहीं था क्योंकि एक ब्राह्मण कभी ऐसा नहीं कर सकता। इसी तर्क का इस्तेमाल हज़ारों सालों से किया जा रहा है। डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने 25 दिसंबर, 1927 को इस सड़ी-गली और भ्रष्ट मनुस्मृति को जलाने के बाद, आखिरकार तथाकथित महान हिंदू धर्म को छोड़ दिया। 14 अक्टूबर, 1956 को उन्होंने अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि "भारत में ज़्यादातर लोगों के हिंदू धर्म से दूसरे धर्मों में बदलने का मुख्य कारण यह है कि वे हमारी जाति व्यवस्था से तंग आ गए थे।" इस ऊँच-नीच को खत्म करने के बजाय, RSS इसमें सांप्रदायिक ज़हर घोलकर जातिवाद को बढ़ावा दे रहा है।
श्रद्धांजलि और आह्वान:
फादर ग्राहम स्टेन्स, और अन्य सभी दंगों में (भागलपुर, मुजफ्फरनगर से लेकर गुजरात तक) मारे गए लोगों को सही श्रद्धांजलि तभी होगी जब इन जल्लादों को रोकने के लिए सभी शांतिप्रिय और सर्वधर्म समभाव के लोगों को संगठित होकर मुकाबला करना चाहिए। वर्तमान समय में तथाकथित हिंदुत्ववादी, धर्मसंसद के नाम पर हमारी संसद से लेकर संविधान की धज्जियां उड़ाने का काम कर रहे हैं। इन्हें रोकने के लिए सभी शांति सद्भावना के और सर्वधर्म समभाव को मानने वाले लोगों को इकट्ठा होकर सक्रिय रूप से कृतिशील होने की जरूरत है। यही फादर स्टेन्स और उनके दोनों मासूम बच्चों तथा अन्य सांप्रदायिकता की आग में जले हुए लोगों के लिए सही श्रद्धांजलि होगी।
डॉ. सुरेश खैरनार
22/23 जनवरी 2026, रात के 12- 15, नागपुर