महिला दिवस विशेष: सच कड़वा है—शोषण का असली चेहरा घर, दफ़्तर और प्रतिष्ठा के नकाब के पीछे
महिला दिवस पर एक सख्त सवाल: क्या शोषण सिर्फ सड़क पर होता है? सत्ता, प्रतिष्ठा और रिश्तों के पीछे छिपी पुरुष मानसिकता और सामाजिक पाखंड का विश्लेषण...
Women's Day!
- महिला दिवस पर कड़वा सच: अपराध सिर्फ सड़कों पर नहीं, सत्ता और प्रतिष्ठा के कमरों में भी
- महिला दिवस: जब ‘आदर्श’ चेहरे टूटते हैं—समाज के भीतर छुपे शोषण की कहानी
- महिला सम्मान का सच: कपड़ों में नहीं, नज़र और मानसिकता में छिपी है समस्या
- महिला दिवस 2026: पाखंड, शक्ति और शोषण—समाज के बंद दरवाज़ों के पीछे का सच
- ‘सब मर्द ऐसे नहीं होते’ से आगे: महिला दिवस पर आत्ममंथन की ज़रूरत
महिला दिवस पर एक सख्त सवाल: क्या शोषण सिर्फ सड़क पर होता है? सत्ता, प्रतिष्ठा और रिश्तों के पीछे छिपी पुरुष मानसिकता और सामाजिक पाखंड का विश्लेषण...
Women’s Day - सच कड़वा है, पर बोलना ज़रूरी है...!
एपस्टीन फाइलें सामने आने से पहले कई ऐसे चेहरे थे जिन्हें आदर्श, पवित्र, गुरु और चरित्र का उदाहरण माना जाता था, लेकिन जैसे-जैसे सच सामने आया, उनके निजी जीवन के कई वीभत्स और अमर्यादित पहलू उजागर हो गए ।
क्योंकि सच चुभता है, आप कहते हैं – ‘सब मर्द ऐसे नहीं होते’ सही है, लेकिन जब गलत होता है, तो आप कितनी बार गलत के खिलाफ खड़े होते हैं ?
आपके आसपास ही..
कभी नौकरी-कैरियर के सपनों के बदले समझौता,
कभी बॉस के केबिन में प्रमोशन के नाम पर सौदा,
कभी रिसर्च-गाइडेंस के नाम पर नज़दीकियाँ,
कभी प्यार का मीठा झांसा,
कभी पति का धोखा,
और कई बार अपनी ही मजबूरी.. एक बंद दरवाज़े के पीछे किसी और की हैवानियत सहने को मजबूर कर देती है महिला को ।
और जब यह सब सहते हुये वो टूट जाती है, तो वही समाज कहता है – ‘उसमें ही कुछ कमी होगी’ ।
ये कहानी ‘किसी और’ की नहीं है, ये उसी समाज की कहानी है, जिसमें आप सीना ठोककर खुद को 'सभ्य' कहते हैं ।
महिला दिवस पर सिर्फ सड़क वाले अपराधों की बात मत करिये, उन कमरों की भी बात करिये.. जहाँ पावर और प्रतिष्ठा के पीछे छुपी नीयत सवालों के घेरे में है !
सबसे खतरनाक वो नहीं जो खुलकर गलत करता है, सबसे खतरनाक वो सम्मानित चेहरे जो ‘आदर्श’ का मुखौटा पहनकर निजी तौर पर सीमाएं तोड़ते हैं ।
याद रखिए.. सोशल मीडिया पर धार्मिक पोस्ट डालना आसान है, चरित्र निभाना मुश्किल है ।
धर्म का नाम लेकर अधर्म करना, सबसे बड़ा अधर्म है और, माँ-बाप की आड़ लेकर कसम खाकर, किसी और की बेटी का शोषण करना, सिर्फ पाप नहीं कायरता है । पद, उम्र, डिग्री और शादीशुदा होना चरित्र का प्रमाणपत्र नहीं होते ।
एक पुरूष होने के नाते हो सकता है- आपकी बहन न हो, आपकी गर्लफ्रेंड न हो, आपकी पत्नी न हो, आप किसी भी महिला से किसी रिश्ते में न हों, लेकिन ये कभी नहीं हो सकता कि आप इस धरती पर इंसान बनकर जन्मे हों और आपकी ‘माँ’ न हो..!
जिस औरत के दर्द से आप इस दुनिया में आयें हो, उसी औरत की जात को आप रोज़ आंकते हैं, टोकते हैं, रोकते हैं, तोड़ते हैं ।
समस्या उनके कपड़ों में नहीं है, वक्त में नहीं है, आज़ादी में नहीं है..,
समस्या नज़र में है ! मानसिकता में है ! उस सोच में है जो महिला/औरत को इंसान नहीं ‘मौका’ समझती है ।
वर्तमान में हमारी किताबों में एक ऐसा अध्याय होना चाहिए, जहाँ बच्चों को सिर्फ ‘सम्मान करना’ न सिखाया जाए, बल्कि उन्हें उनकी माँ के त्याग, उसके संघर्ष, उसके मौन आँसुओं को महसूस करना सिखाया जाए । जिस दिन लड़के अपनी माँ के दर्द को सच में समझ लेंगे, उसी दिन वे बेहतर पुरुष बन जाएंगे।
महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा की बात केवल शब्दों में नहीं, बल्कि सच का सामना करने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने में भी होनी चाहिए क्योंकि नकाब हमेशा नहीं टिकते, सच को देर लगती है, हार नहीं..!
राहुल कपूर
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। अनुभवी IT प्रोफेशनल, मोतीलाल नेहरू नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी इलाहाबाद (MNNIT/NIT इलाहाबाद) में काम कर रहे हैं।