गर्म धरती, असुरक्षित इंसान. 2050 तक आधी दुनिया एक्सट्रीम हीट की गिरफ्त में

  • 2050 की चेतावनी: जब 3.8 अरब लोग असहनीय गर्मी में जीने को मजबूर होंगे
  • पेरिस समझौता और 1.5 डिग्री की सीमा: क्यों अब यह ‘सुरक्षित’ नहीं रह गई
  • भारत और ग्लोबल साउथ पर सबसे भारी मार क्यों पड़ेगी
  • एक्सट्रीम हीट, कूलिंग की बढ़ती मांग और ऊर्जा संकट का दुष्चक्र
  • ऑक्सफोर्ड अध्ययन क्या कहता है: कूलिंग डिग्री डेज़ और बदलता भविष्य
  • ठंडे देश भी खतरे में: यूरोप और कनाडा क्यों तैयार नहीं हैं
  • जलवायु संकट का मानवीय चेहरा: स्वास्थ्य, शिक्षा और पलायन

टिकाऊ विकास और डीकार्बनाइज़ेशन ही एकमात्र रास्ता

साल 2050. अगर दुनिया का तापमान औद्योगिक युग से पहले के स्तर के मुकाबले 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है, तो दुनिया की लगभग आधी आबादी, करीब 3.8 अरब लोग. ऐसी गर्मी में जीने को मजबूर होंगे जिसे वैज्ञानिक ‘एक्सट्रीम हीट’ कहते हैं. यह कोई दूर का डर नहीं, बल्कि अगले कुछ दशकों में हमारे सामने खड़ा होता हुआ सच है.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक नए अध्ययन ने इस खतरे की तस्वीर और साफ़ कर दी है. Nature Sustainability में प्रकाशित इस रिसर्च के मुताबिक 2010 में जहां दुनिया की सिर्फ 23 फीसदी आबादी अत्यधिक गर्म परिस्थितियों में रहती थी, आने वाले वर्षों में यह आंकड़ा बढ़कर 41 फीसदी तक पहुंच जाएगा, जैसे ही दुनिया 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार करेगी.

वही सीमा, जिसे पेरिस समझौते में सुरक्षित माना गया था

इस बदलती जलवायु का सबसे भारी बोझ विकासशील देशों पर पड़ेगा.

रिपोर्ट बताती है कि सबसे ज्यादा प्रभावित आबादी भारत, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान और फिलीपींस में होगी. यानी जिन देशों में पहले से ही स्वास्थ्य, आवास और ऊर्जा प्रणालियों पर दबाव है, वहीं गर्मी का संकट सबसे गहरा होगा

भारत के लिए यह चेतावनी और भी गंभीर है. यहां करोड़ों लोग पहले ही लंबे और तीखे हीटवेव झेल रहे हैं.

जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, घरों, दफ्तरों और स्कूलों में ठंडक की मांग तेजी से बढ़ेगी. इसका सीधा असर बिजली की खपत, ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर और उत्सर्जन पर पड़ेगा.

अध्ययन के मुताबिक अत्यधिक गर्मी के कारण कूलिंग की जरूरत में भारी उछाल आएगा, जबकि ठंडे देशों में हीटिंग की मांग घटेगी.

इस अध्ययन के लीड लेखक और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जीसस लिज़ाना कहते हैं कि सबसे बड़ा बदलाव 1.5 डिग्री की सीमा से पहले ही देखने को मिलेगा. उनके मुताबिक अगले पांच वर्षों में ही कई इलाकों में एयर कंडीशनिंग जैसी कूलिंग सुविधाओं की जरूरत पड़ेगी, लेकिन अगर तापमान 2 डिग्री तक पहुंच गया, तो यह दबाव दशकों तक बना रहेगा.

ऐसे में इमारतों और शहरों को ठंडा रखने के साथ-साथ बिल्डिंग सेक्टर को डीकार्बनाइज़ करना भी उतना ही ज़रूरी होगा.

ऑक्सफोर्ड मार्टिन फ्यूचर ऑफ कूलिंग प्रोग्राम की प्रमुख और स्मिथ स्कूल ऑफ एंटरप्राइज एंड द एनवायरनमेंट की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राधिका खोसला इसे एक साफ़ चेतावनी मानती हैं. उनका कहना है कि 1.5 डिग्री से ऊपर जाना सिर्फ तापमान का सवाल नहीं है, बल्कि इसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती और लोगों के पलायन तक पर पड़ेगा.

उनके शब्दों में, टिकाऊ विकास और नेट ज़ीरो की राह ही वह रास्ता है जो इस बढ़ती गर्मी को पलट सकता है

रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि ठंडे देश भी सुरक्षित नहीं हैं. ऑस्ट्रिया और कनाडा जैसे देशों में असहज गर्म दिनों की संख्या दोगुनी हो सकती है, जबकि आयरलैंड में यह बढ़ोतरी 230 फीसदी तक पहुंच सकती है. इन देशों की इमारतें और शहर ठंड के हिसाब से बने हैं, इसलिए हल्की-सी गर्मी भी यहां असमान रूप से ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है.

इस अध्ययन में ‘कूलिंग डिग्री डेज़’ और ‘हीटिंग डिग्री डेज़’ जैसे वैज्ञानिक पैमानों का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह समझा जा सके कि कब और कहां इंसानों को सुरक्षित तापमान बनाए रखने के लिए ठंडक या गर्मी की जरूरत पड़ेगी. इसके साथ ही शोधकर्ताओं ने एक ओपन-सोर्स ग्लोबल डेटा सेट भी तैयार किया है, ताकि सरकारें और योजनाकार भविष्य की तैयारी बेहतर ढंग से कर सकें.

स्टडी से जुड़े नहीं रहे वैज्ञानिक, द नेचर कंजरवेंसी के डॉ. ल्यूक पार्सन्स कहते हैं कि यह रिसर्च साफ़ दिखाती है कि एक्सट्रीम हीट का असर भविष्य की नहीं, बल्कि वर्तमान की समस्या बन चुका है. उनके मुताबिक आने वाले कुछ सालों में लिए गए फैसले यह तय करेंगे कि अरबों लोगों के लिए धरती रहने लायक बनी रहेगी या नहीं

बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम की कहानी नहीं रही. यह ऊर्जा, शहरों, स्वास्थ्य और इंसानी गरिमा से जुड़ा सवाल बन चुकी है. और इस कहानी में भारत, बाकी दुनिया की तरह, एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है.

डॉ. सीमा जावेद

पर्यावरणविद एवं कम्युनिकेशन विशेषज्ञ