वाराणसी। उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में आज भी अंग्रेजी का वर्चस्व कायम है। तमिलनाडु, गुजरात और छत्तीसगढ़ की विधायिकाओं द्वारा अपने उच्च न्यायलयों में उन राज्यों की भाषा- तमिल, गुजराती और हिन्दी में काम काज के लिये प्रस्ताव पारित किये गये जिसे केन्द्र सरकार द्वारा नामंजूर कर दिया गया है।

उच्चतर न्याय पालिका में कम से कम एक भारतीय भाषा में काम-काज के प्रावधान करने की मुख्य माँग के साथ आज वाराणसी के जिला मुख्यायलय पर समाजवादी जन परिषद ने धरना दिया। इस मौके पर विभिन्न स्तरों की प्रशासनिक सेवाओं के लिये होने वाली परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं को माध्यम बनाने की भी माँग की गयी। सभा में इस बात पर संतोष व्यक्त किया गया कि द्रविड़ पार्टियों ने भी अब अँग्रेजी का विरोध शुरू किया है और अँग्रेजी विरोध को 'हिन्दी साम्राज्यवाद' समझने की गलतफहमी से वे ऊपर उठ गयी हैं।

धरने के मौके पर,'जन भाषा में पढ़ने दो, हमको आगे बढ़ने दो', 'अंग्रेजी में काम न होगा, फिर से देश गुलाम न होगा', 'गांधी-लोहिया की अभिलाशा, चले देश देशी भाषा' आदि नारे लगाये गये। सभा में सैय्यद मकसूद अली,चंचल मुखर्जी, मोहम्मद उमर, डॉ स्वाति, अनवर खां, दिनेश पटेल, डॉ लोलार्क द्विवेदी, डॉ सोमनाथ त्रिपाठी तथा अफलातून ने विचार व्यक्त किये।