पिछलेलगभगएकदशकमेंभारतमेंकईऐसेराजनैतिकदलोंनेउदयहुआहैजिनमेंयातोमुसलमानोंकाप्रभुत्वहैयाजिनकानेतृत्वमुसलमानोंकेहाथोंमेंहै।सन2005मेंअसममेंमौलाना बदरुद्दीन अजमलनेएआईयूडीएफकीस्थापनाकी,सन2007मेंमुफ्ती इस्माइलनेमालेगांवमेंमुस्लिमनेतृत्ववाला एकमोर्चाबनायाजिसकेकाफीसदस्यचुनकरविधानसभामेंपहुँचे।सन2008मेंउत्तरप्रदेशकेएकसर्जनमोहम्दअय्यूबनेपीसपार्टीकीस्थापनाकी।इसकेबाद,सन2009मेंपापुलरफ्रंटऑफइंडिया(पीएफआई)नेअपनीराजनैतिकशाखा,सोशलडेमोक्रेटिकपार्टीकीनींवरखी,जिसकेअध्य्क्षबनेए।सईद।जमायतइस्लामीनेअपनेसंस्थापकमौलानाबू-अल-मोदीकीसलाह,किमुसलमानोंकोविभाजितभारतमेंराजनीतिमेंहिस्सा नहींलेनाचाहिएऔरपरोक्सरूपसेभारतकोहिन्दूराष्ट्रकेरूपमेंस्वीकारकरलेनाचाहिए,केलगभग70वर्षबाद,सोशलवेल्फेयरपार्टीऑफइंडियाकेनामसेअपनाराजनैतिकदलगयागइयाल।वेल्फेयरपार्टीकेसंस्थापकअध्य्क्षथेमुजफ्फरफारूकीऔरउसकेवर्तमानअध्य्क्षहैंएस्क्यूआरअलीस।इनकेअतिरिक्त,ऑलइंडिया इत्तेहादुल मुस्लिमीन(एआईएमआईएम)नेपहलीबारतेलंगानासेबाहरअपनेउम्मीदवारखड़ेकिएऔरमहाराष्ट्रविधानसभाचुनावमेंदोसीटेजीतनेमेंसफलरही।

पकी हुई जमीन पर जमे मजबूती पांव सबसे ज्यादा जरूरी और आंदोलन से ज्यादा जरूरी संग न। बिना संगित इत हुए भावनाओं की सुनामी के भरोसे बदलाव की उम्मीद बनाते हैं क्योंकि बदलाव के लिए और बदलाव के बाद भी संग न अनिवार्य है।

राजनीतियों से कुछ नहीं बदलता है और समीकरण से सिफर सत्ता बदलती है। पकी हुई जमीन पर जमे मजबूती पांव सबसे ज्यादा जरूरी और आंदोलन से ज्यादा जरूरी संग न। बिना संगित इत हुए भावनाओं की सुनामी के भरोसे बदलाव की उम्मीद बनाते हैं क्योंकि बदलाव के लिए और बदलाव के बाद भी संग न अनिवार्य है।

राजनीतियों की बात हम किसी मौलिक विचारधारा के तहत नहीं कह रहे हैं और यह आधार हमारे इतिहास, लोक और विविधता की जमीन है, जिससे हम बेदखल हैं।

इसी तरह हमें बुद्धिमय भारत के अवसानों की असली वजहों की जांच पढ़ाते हुए खोई हुई जमीन का दिखाल हासिल करना है और इससे कम किसी सूरत में धर्म परिवर्तन जैसे शार्टकट से बदलाव होंगे नहीं, यह बात समझ लें।

राजनीतियों और संग न अलग बातें हैं। संग न के बिना राजनीति संभव है। लेकिन बिना संग न न बदलाव असंभव है।