अखिलेशियन समाजवाद- 90 साल के किसान शातिर गुंडे क्योंकि अपना खेत जोतने की जुर्रत की
छलेसर के किसानों का दर्द - सरकार अंग बेचने की अनुमति दे, जिससे अपनी लड़ाई को जारी रख सकें

भारत शर्मा
नई दिल्ली। 90 साल के पंडित चंद्रभान शर्मा हों, 70 साल के श्रीकृष्ण या 70 साल के ही असमान सिंह, कानून की नजर में ये शातिर गुंडे हैं, क्योंकि इन्हें अपने उन खेतों को जोतने की जुर्रत की, जिसका मुआवजा इन्होंने आज तक नहीं लिया है।
चंद्रभान शर्मा पर गुंडा एक्ट साल 2010 में लगाया गया, तो श्रीकृष्ण पर तीन माह पहले। इन्हें जमानत करानी है, पर वे इसके लिए राजी नहीं हैं, कहते हैं, जेल में कम से कम भुखमरी तो नहीं है।

जनता के लिए काम करने का दावा करने वाला प्रशासन किस तरह कार्पोरेट के साथ खड़ा रहता है, छलेसर उसका उदाहरण हो सकता है।

भारत शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

छलेसर किसी जंगल में बसा आदिवासी गांव नहीं है, यह आगरा नगर निगम सीमा का गांव है। भारत सरकार का कानून कहता है, अगर अधिग्रहित जमीन पर ५ साल अगर काम नहीं होता है, तो वह जमीन किसानों को वापस दी जाएगी, समाजवादी पार्टी की घोषणापत्र इस सीमा को घटाकर तीन साल की बात करता है, पर जमीन वापसी की बाद तो दूर उन किसानों को भी अपनी जमीन पर जाने का हक नहीं है, जिन्होंने कंपनी के साथ करार नहीं किया है और न ही मुआवजा लिया है।
किसान नेता मनोज शर्मा बताते हैं, कि पहले दौर में यहां मुआवजा 422 रुपए प्रति वर्ग मीटर दिया गया, जो आंदोलन के बाद बढ़ाकर 640 रुपए तक कर दिया गया। इस इलाके में सर्किल रेट 6500 रुपए प्रति वर्ग मीटर है, जिस समय अधिग्रहण किया जा रहा था, उस समय भी रेट 3500 रुपए था, उस समय जेपी समूह ने टाउनशिप के लिए जो विज्ञापन निकाला था, उसमें रेट 17 हजार रुपए वर्ग मीटर था।

भूमि अधिग्रहण कानून कहता है, कि किसान को चार गुना मुआवजा दिया जाएगा, दूसरी तरफ जमीन लेने के लिए किसानों की रजामंदी भी जरुरी है, यहां किसी का पालन नहीं किया गया, उल्टा किसानों को धमकाया गया।
31 मार्च 2009 से पहले यहां किसी किसान पर कोई मुकदमा नहीं था, उसके बाद बाढ़ सी आ गई।
यहां 65 प्रकार के अलग-अलग मामलों में गांव वालों पर केस बनाए गए, अधिकांश केस सेल्स टेक्स, बिजली चोरी, आगजनी, सड़क जाम के बनाए गए। 90 साल के मृत किसान चंद्रभान सिंह पर भी मुकदमा दर्ज है, क्योंकि उनका नाम खाते में दर्ज है, इसी प्रकार बड़ोदरा गुजरात में नौकरी करने वाले कृपाल सिंह के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया।
यह वो दौर था जब गांव में उन लोगों के रिकार्ड लायसेंस बने, जिन्होंने कंपनी के साथ करार किया, आमतौर पर लायसेंस बनने में छह माह से सालभर लगता है, पर यहां दो से तीन माह में यह काम कर दिया गया, दूसरी तरफ विरोध करने वालों के लायसेंस सस्पेंड कर दिए गए। धारा 4 के तहत जिन लोगों की जमीन ली गई थी, धारा 6 के तहत उनमें से कुछ की जमीन छोड़ दी गई, अधिग्रहण के नाम पर छोटी दुकानें तो तोड़ दी गईं, पर कोल्ड स्टोरेज छोड़ दिए गए।

अधिग्रहण ने सब बरबाद कर दिया
नई दिल्ली। घर की देहरी पर बैठी सुखदेवी की आंखों के आंसू सूखने का नाम नहीं ले रहे हैं। साल भर पहले पति पूरन का देहांत हुआ था। मौत सड़क हादसे में हुई, किस गाड़ी ने मारा पता नहीं, पर इलाज में साढ़े पांच लाख रुपए खर्च हो गए। पैसा कर्ज पर लिया, जिसकी ब्याज चल रही है। चिंता के मारे नींद नहीं आती, दो बेटे हैं, दोनों की शादी हो गई है, वे मजदूरी करते हैं, उनमें से एक बेटा बीमार है, इस हालत में भी काम करने जाना पड़ता है।
सुखदेवी के घर के हालात हमेशा ऐसे नहीं थे, घर में साढ़े 11 बीघा जमीन थी, जो यमुना एक्सप्रेस-वे में चली गई।
छलेसर वह गांव है, जहां नोएडा से शुरु होकर एक्सप्रेस वे खत्म होता है।
एनएच-2 से लगे इस गांव में उस समय तक किसान काफी सम्पन्न थे, खेती बहुफसली थी। हालांकि सरकार का जेपी समूह के साथ जो करार था, उसके अनुसार बंजर जमीन ली जानी थी। इस योजना का जिन दो गांवों के किसानों ने जमकर विरोध किया, उसमें एक टप्पल है, दूसरा छलेसर।
छलेसर की 750 हैक्टेयर जमीन इस योजना में ली गई। यहां आस पास के गांव मिलाकर कुल 2200 किसान हैं, इस योजना में सभी प्रभावित हुए। शुरु में सभी किसान साथ थे, पर वक्त के साथ धीरे-धीरे किसान टूटता चला गया और मुआवजा लेता चला गया, फिर 25 हैक्टेयर जमीन के मालिक 27 परिवारों ने मुआजवा नहीं लिया, वे जमीन वापस लेने की लड़ाई लड़ रहे हैं, सुखदेवी के पति पूरन उन्हीं किसानों में से हैं।

मुआवजा न लेने वाले उयदवीर, रामस्वरूप जैसे तमाम किसान ऐसे हैं, जो न्याय की उम्मीद में लड़ते लड़ते मर गए।
गांव में तमाम लड़कियां हैं, जो शादी लायक हैं, पर आर्थिक तंगी के चलते उनकी शादी नहीं हो पा रही। जो किसान सभी जमीनदार होते थे, वे आज मजदूरों की मंडी में खुद की बोली लगाने के लिए खड़े होते हैं।
उदयवीर के बेटे जय सिंह, जो खुद विकलांग हैं, बताते हैं, कि जरुरी नहीं हर दिन काम मिले, कई बार खाली हाथ लैटकर आना पड़ता है।
इस परिवार की 16 बीघा जमीन अधिग्रहण में चली गई है।
इसी प्रकार रामस्वरुप के परिवार की 37 बीघा जमीन गई है। हालत यह है, कि किसानों के पास केस लड़ने के लिए पैसा नहीं है, ऐसे में किसानों ने उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की है, कि सरकार उन्हें अपने अंग बेचने की अनुमति दे, जिससे वे अपनी लड़ाई को जारी रख सकें और परिवार का पालन कर सकें।