अखिलेश को मुफ्त में राजनीति जैसा घातक खिलौना मिल गया, वह इसे तोड़ रहे हैं
अखिलेश को मुफ्त में राजनीति जैसा घातक खिलौना मिल गया, वह इसे तोड़ रहे हैं
अखिलेश को बैठे-बिठाए राजनीति जैसा घातक खिलौना मिल गया और आज वह इसे तोड़ रहे हैं
नीतीश मिश्र
अखिलेश यादव का बार-बार उत्तेजित होना यह दर्शाता है कि उनमें राजनीति की सूझ-बूझ रत्ती भर भी नहीं है।
अखिलेश सत्ता के नशे में पूरी तरह बेहोश हैं।
अगर उनमें वाकई परिपक्वता होती तो वह कायदे से मुख्यमंत्री पद ठुकराकर एक नये विचार को समाज में खड़ा करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते, लेकिन उन्हें यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि अगर ऐसा कदम उठाता हूँ तो न घर का रहूंगा न ही घाट का। इसलिए सत्ता में रहते हुए वह सत्ता हथियाने की राह निकाल रहे हैं।
अखिलेश अपने सामंती चरित्र को बचाकर अपना एक समानांतर चरित्र खड़ा करना चाहते हैं। यह भ्रम उनके दिमाग में सामंती चाटुकारों ने भरा है जो सत्ता के इर्द-गिर्द रहकर राजनीति के जरिए अपना हथियार ग़ढ़ते है।
अगर अखिलेश में वाकई कुछ कर गुजरने की क्षमता होती तो उनमें बुद्ध या गांधी जैसा कोई परिवर्तन होता। लेकिन उनमें ऐसा कोई बदलाव होता हुआ नहीं दिख रहा है।।
मुलायम जीवन पर्यन्त राजनीति को खिलौना समझते रहे और इसी खिलौने को आधार बनाकर हमेशा अपनी नींव बदलते रहे।
अगर मुलायम में थोड़ी भी ईमानदारी होती तो शायद आज उनके परिवार की यह स्थिति नहीं होती।
मुलायम शायद उत्तर प्रदेश के इकलौते ऐसे नेता रहे, जिस शाख पर बैठकर वे आसमान को निहारते थे और ज्योंही आसमान की सीमा विस्तृत होती मुलायम उस शाख को काट देते।
काश समाजवादी चिंतक मुलायम को उस समय उनकी गलतियों की ओर ध्यान आकर्षित करते तो निश्चय ही मुलायम राजनीति में एक नई मिसाल पेश करते।
मुलायम भी ग़लत नहीं हैं, एक भाई के प्रति जो प्रेम होना चाहिए उसी मूल्य को वह चरितार्थ करने में लगे हुए हैं... अखिलेश युवा हैं उत्तेजित हैं और जीवन भर मलाई खाए हैं, इसलिए उनको लगता हैं वह इतिहास रच देंगे... बाप-बेटा दोनों इस वक्त चमपुओ से घिरे हुए हैं... अगर यह दोनों अभी भी चमपुओं को पहचान नहीं पा रहे हैं तो बाप-बेटे को सत्ता छोड़कर कुछ समय के लिए संन्यास लेकर केवल चिंतन करना चाहिए ....
अखिलेश यादव की स्थिति ठीक उस बच्चे जैसी हो गई है, जो खिलौना देखते ही ऐसे खुश होता है, जैसे उसी ने इसका निर्माण किया है और देखते ही देखते वह खिलौने को एक नया रूप देने के लिए उसको तोड़ देता है और अपने ही क्रिया कलाप पर रोता है....
अखिलेश को बैठे बिठाए राजनीति जैसा घातक खिलौना मिल गया था...और आज वह इसे तोड़ रहे हैं वह भी उस समय में जान चुनाव सर पर बैताल की तरह बैठा हो ....अगर उन्हें वाकई राजनीति आती तो सत्ता में रहते हुए पार्टी में वैचारिक बदलाव करते पर उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया ....


