अखिलेश सरकार का सांप्रदायिक चेहरा बेनकाब हो चला है- रिहाई मंच की रिपोर्ट
अखिलेश सरकार का सांप्रदायिक चेहरा बेनकाब हो चला है- रिहाई मंच की रिपोर्ट
अनिश्चितकालीन धरने के एक माह पर सपा सरकार द्वारा मौलाना खालिद मुजाहिद के न्याय के मार्ग में बाधा डालने वाले प्रयासों पर रिहाई मंच की रिपोर्ट
लखनऊ 20 जून 2013। मौलाना खालिद मुजाहिद के इंसाफ के लिये विधानसभा लखनऊ धरना स्थल पर रिहाई मंच के अनिश्चित कालीन धरने का आज एक माह पूरा हो रहा है। इस दौरान प्रदेश की सपा सरकार द्वारा हमारी लोकतान्त्रिक माँगों को मानना तो दूर इसके विपरीत सरकार द्वारा पूरी जाँच प्रक्रिया को भटकाने की आपराधिक कोशिशें जारी हैं। इस दौरान सरकार द्वारा हमारे आन्दोलन को तोड़ने की पुरजोर कोशिशें भी की गयीं लेकिन अवाम की ताकत और सहयोग के बल पर ऐसी ताकतों को कारारी शिकस्त देते हुये हमारा आन्दोलन जारी है। आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों की रिहाई का चुनावी शिगूफा छोड़ने वाली वादा खिलाफ अखिलेश सरकार का सांप्रदायिक चेहरा बेनकाब हो चला है।
18 मई 2013 को मौलाना खालिद मुजाहिद की पुलिस अभिरक्षा में हत्या के बाद उनके चचा मौलाना जहीर आलम फलाही द्वारा थाना कोतवाली बाराबंकी में मुकदमा अपराध संख्या 295/13 कोतवाली बाराबंकी अन्तर्गत धारा 302, 120 बी आईपीसी दर्ज करायी गयी। इस रिपोर्ट में पुलिस अधिकारी विक्रम सिंह, बृजलाल, मनोज कुमार झा, चिरंजीवनाथ सिन्हा, एस आनंद एवम् आईबी के उच्च अधिकारियों सहित 42 अन्य पुलिस कर्मियों को अभियुक्त नामित किया गया, पर एक महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद कोई गिरफ्तारी नहीं की गयी। 19 मई को खालिद की मिट्टी के दूसरे दिन ही प्रदेश के मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव ने गैर जिम्मेदाराना ढँग से बयान दिया कि खालिद की मौत बीमारी से हुयी थी। जबकि बाराबंकी में हत्या के बाद फोटोग्राफ सहित अन्य परिस्थिति जन्य साक्ष्य और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु के कारणों का स्पष्ट न होना इस बात की तरफ मजबूत इशारा था कि खालिद की मौत के पीछे उच्च स्तरीय साजिश है। घटना के बाद प्रदेश सरकार की तरफ से सीबीआई जाँच को लेकर जहाँ तेजी दिखानी चाहिये थी इसके उलट सरकार द्वारा प्रायोजित अनेक उलेमा और अबू आसिम आजमी जैसे सपा के मुस्लिम नेताओं ने सरकारी सुर में सुर मिलाते हुये यह बयान जारी किया कि यह स्वाभाविक मृत्यु है। रिहाई मंच ने लगातार माँग की कि किसी भी षडयन्त्र की जाँच सीबीआई करती है तो इस जाँच को भी सीबीआई से जल्द से जल्द शुरु कराया जाय। क्योंकि चाहे वो अखिलेश यादव हों या फिर कोई उलेमा या सपा का मुस्लिम नेता वह कोई जाँच एजेन्सी नहीं हैं, किसी बेगुनाह की मौत पर इस तरह की बयानबाजियाँ सपा सरकार की खोखली मानसिकता दर्शाती हैं।
जिस तरीके से कभी जेल अधिकारी तो कभी चिकित्सकों के परस्पर अन्तर्विरोधी बयान मीडिया में सरकार ने प्रायोजित तरीके से प्रसारित करवाकर भ्रम पैदा किया उसने खालिद की हत्या की जाँच को भटकाने की कोशिश की। अखिलेश सरकार द्वारा खालिद मुजाहिद की हत्या की जाँच सीबीआई द्वारा कराये जाने की घोषणा मात्र दिखावा साबित हुयी क्योंकि अब तक कार्मिक एवम् प्रशिक्षण विभाग द्वारा इस सम्बन्ध में अधिसूचना जारी नहीं की गयी। 19 मई को कार्मिक एवम् प्रशिक्षण विभाग (डीवोपीटी) सीबीआई जाँच के लिये पत्र लिखा गया, परन्तु दिल्ली स्पेशल पुलिस स्टेबलिसमेंट एक्ट की उक्त धारा 5 के अन्तर्गत डीवोपीटी द्वारा सीबीआई को अधिसूचना जारी नहीं की गयी, जो की सीबीआई द्वारा जाँच अपने हाथ में लेने के लिये आवश्यक है। यूपी सरकार ने डीएसपीई एक्ट के सेक्शन 6 के अनुसार विवेचना के लिये अपनी सहमति का पत्र दिया था। सपा सरकार ने अपनी एजेंसियों से तेजी से जाँच करवाकर दोषियों को बचाना चाहती है, और इसी फिराक में डीवोपीटी विभाग ने अब तक नोटिफिकेशन नहीं किया। ऐसे में खालिद के न्याय के लिये तत्काल प्रदेश सरकार द्वारा करायी जा रही जाँच की कार्रवाई तुरन्त समाप्त कर उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा की जा रही विवेचना को अविलम्ब रोककर सीबीआई द्वारा तुरन्त विवेचना कराया जाना सुनिश्चित किया जाय। शासन एवम् प्रशासन के स्तर पर जनसंचार साधनों के माध्यम से मीडिया ट्रायल करके जाँच को प्रभावित करने की कोशिश बन्द की जाये। न्यायहित में यह आवश्यक है कि उत्तर प्रदेश सरकार सीबीआई को समस्त तथ्यों को प्रेषित करते हुये तत्काल सीबीआई जाँच कराना सुनिश्चित करे।
निष्पक्ष विवेचना न्याय का आधार होती है। यदि सरकारी मशीनरी द्वारा किसी नागरिक को निष्पक्ष विवेचना उपलब्ध न करायी जाय और अभियोजन द्वारा झूठी कहानी और साक्ष्य गढ़कर किसी निर्दोष को फँसाया जाय, उसका जीवन बर्बाद किया जाय तो यह केवल उस पीड़ित व्यक्ति के लिये ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण नागरिक समाज के लिये गम्भीर चिन्ता का विषय है। रिहाई मंच द्वारा यह माँग खालिद मुजाहिद की मृत्यु से पहले ही की जा रही थी कि निमेष कमीशन की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाय। परन्तु 31 अगस्त 2012 को निमेष आयोग द्वारा सरकार को सौंपी गयी अपनी रिपोर्ट के मिलने के बावजूद सरकार इसे सार्वजनिक करने के लिये तैयार नहीं थी और एक रहस्यमयी चुप्पी साध रखी थी, जबकि सपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि वह आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुस्लिम युवकों से मुकदमे वापस लेगी। ऐसी स्थिति में सपा से यह आशा थी कि यह सरकार इस रिपोर्ट को सन 2012 के अन्त में आहूत विधानसभा सत्र में एक्शन टेकन रिपोर्ट के साथ इसे प्रस्तुत करेगी। यहाँ बताना आवश्यक है कि निमेष आयोग का गठन कमीशन ऑफ इन्क्वारी एक्ट की धारा 3 के अन्तर्गत 14 मार्च 2008 को तत्कालीन सरकार ने किया था। विधि के अनुसार किसी भी गठित कमीशन की रिपोर्ट को सरकार को मिलने के उपरान्त यह सरकार के लिये अनिवार्य हो जाता है कि 6 महीने के अन्दर रिपोर्ट को एक्शन रिपोर्ट के साथ विधानसभा पटल पर रखे। सरकार द्वारा ऐसा न करना एक बड़े षडयन्त्र का हिस्सा था।
सरकार ने खालिद की मौत के बाद पूरे प्रदेश में उपजे जनान्दोलनों के दबाव पर कैबिनेट में निमेष आयोग की रिपोर्ट रखी। रिहाई मंच ने साफ तौर पर कहा था कि हमने 18 मार्च 2013 को ही आरडी निमेष रिपोर्ट को जनहित में जारी कर दिया था, ऐसे में सरकार कैबिनेट में एक्शन टेकन रिपोर्ट के साथ इसे रखे, पर सरकार ने ऐसा नहीं किया। सरकार के नुमाइंदों ने मुस्लिम समाज में भ्रम फैलाने की कोशिश की कि कैबिनेट में यह एक्शन नहीं लिया जा सकता पर इस देश में जब किसानों-मजदूरों के खिलाफ जनविरोधी कानूनों को ऐसी कैबिनेट में तत्काल मंजूरी मिलती है तो फिर बेगुनाहों की रिहाई से जुड़ी इस महत्वपूर्ण रिपोर्ट को क्यों नहीं लाया गया? यह बात काबिले गौर है कि अगर खालिद मुजाहिद की रिहाई होती और उनकी गवाही पर प्रदेश सरकार के कई आला पुलिस व आईबी अधिकारी जेल की सीखचों के पीछे नजर आते और सिर्फ गिरफ्तारी ही नहीं आतंकी घटनाओं में पुलिस, एसटीएफ, एटीएस और आईबी की संलिप्तता का पर्दाफाश होता। क्योंकि दिनाँक 22 दिसम्बर 2007 को तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद को एसटीएफ और पुलिस द्वारा बाराबंकी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार दिखाया गया था, और उनसे डेढ़ किलो आरडीएक्स, जिलेटिन के छड़ों सहित अन्य सामग्री की बरामदगी का दावा किया गया। अब जब सबके सामने आ गया है कि गिरफ्तारी संदिग्ध है तो इस बात का उठना लाजिमी था कि एसटीएफ को किसने विस्फोटक पदार्थ मुहैया कराया था?
रिहाई मंच ने इस बात को बार-बार सरकार के सामने उठाया है कि जिस तरह से मालेगांव और गुजरात में इशरत जहाँ के मामले में पुलिस की विशेष शाखाओं और आईबी द्वारा न सिर्फ बेगुनाह मुस्लिम युवकों को फँसाया गया बल्कि हिन्दुत्ववादी आतंकी संग्ठनों को बचाया गया यह हिन्दोस्तान जैसे बड़े धर्मनिरपेक्ष देश में अराजकता फैलाने की कोशिश है और यही कोशिश तारिक-खालिद प्रकरण में भी नजर आती है।
प्रदेश सरकार खालिद के न्याय की लड़ाई को किस तरह से कमजोर करना चाहती है इसका जीता जागता उदाहरण फैजाबाद है, जहाँ सपाई गुण्डों और हिन्दुत्ववादी संगठनों के लोगों ने मुस्लिम वकीलों पर जानलेवा हमला किया और यहाँ तक कि उनकी बार एसोसिएशन की सदस्यता को भी खत्म कर दिया। इसी तरह खालिद की मौत बीमारी से हुयी यह बयान सपा के अबू आसिम आजमी के देने के बाद पूरे प्रदेश में जगह-जगह प्रदर्शन हुये। आजमगढ़ में अबू आसिम का पुतला फूँकने वालों पर जिस तरीके से फर्जी मुकदमे लादे गये वो बताता है कि सरकार हक की हर आवाज को दबाना पर आमादा है।
उपर्युक्त घटनाओं से यह साफ हो चला है कि सूबे की सत्ताधारी सपा सरकार की नियति बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों की रिहाई के मामले में साफ नहीं है। इसलिये खालिद मुजाहिद के इंसाफ के लिये रिहाई मंच द्वारा जारी मुहिम न्याय मिलने तक जारी रहेगी। हम तमाम लोकतन्त्र पसन्द अवाम, जनान्दोलनों की ताकतों, राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, मानवाधिकार कर्मियों, बुद्धिजीवियों और मीडिया कर्मियों से इंसाफ की माँग के लिये एक माह से चल रहे रिहाई मंच के आन्दोलन में भागीदारी की पुरजोर अपील करते हैं।
द्वारा जारी - मो0 शुएब, संदीप पांडे, मो0 सुलेमान, राघवेन्द्र प्रताप सिंह, तारिक शफीक, असद हयात, मसीहुद्दीन संजरी, लक्ष्मण प्रसाद, हरेराम मिश्रा, सादिक, मो0 आफाक, शुएब, संजय विद्यार्थी, ताहिरा हसन, मो0 समी, सैयद मोइद अहमद, वकारुल हसनैन, हाजी फहीम सिद्की, कमरुद्दीन कमर, उस्मान अली, मिर्जा मो0 जमालुद्दीन, अबु आमिर, जैद फारुकी, आमिर महफूज, शम्स तबरेज खान, रिजवान अहमद, कमर सीतापुरी, जुबैर जौनपुरी, योगेन्द्र यादव, शाहनवाज आलम और राजीव यादव।


