अखिलेश सही.. पर यदुवंशियों का क्या किया जाए
अखिलेश सही.. पर यदुवंशियों का क्या किया जाए
अखिलेश सही.. पर यदुवंशियों का क्या किया जाए
कृ्ष्ण को अपना अंत स्पष्ट दिखायी दे रहा था शायद
राजीव मित्तल
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद श्रीकृष्ण जब कुरुवंश की महारानी गान्धारी से मिलने गए तो सौ पुत्रों की मौत से दुखी माता ने विलाप करते हुए श्राप दिया-
तुमने ही मेरे कुरुवंश को निर्वंश कर दिया..केवल तुम्हें भस्मीभूत कर मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी कृष्ण! मैं तुम्हें श्राप देती हूं, आज से छत्तीस वर्ष बाद इसी प्रकार तुम्हारे वंश का विनाश होगा...
हालांकि माता गान्धारी बाद में बहुत पछतायीं लेकिन श्रीकृष्ण जान गए थे कि श्राप फलीभूत हो कर रहेगा...
कृष्ण द्वारिका लौट आए। कुछ समय बाद महर्षि व्यास पधारे। उन्हें गांधारी के श्राप की जानकारी थी इसलिये वो बेहद परेशान थे। उन्होंने युवराज बलराम और द्वारिकाधीश कृष्ण को बहुत समझाया कि यादवों को संभालो नहीं तो पछताओगे... उन्होंने कहा..द्वारका में मद्यपान बेहद बढ़ गया है... वीर यादव स्त्री-लम्पट बनते जा रहे हैं..उन्हें नियंत्रित करो...
हालात में कुछ सुधार आया भी तो श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब की हरकतों ने द्वारिका नगरी पधारे मुनि दुर्वासा को इस क़दर नाराज़ कर दिया कि उन्होंने घास को मूसल का रूप दे कर श्राप दिया... मुझ जैसे महर्षि का अपमान करने वाले बुद्धिहीन यादवों, यही मूसल शीघ्र ही तुम यादवों का विनाश करेगा..
इस श्राप की श्रीकृष्ण को जानकारी दी उद्धव ने..कृष्ण हतप्रभ रह गए..
फिर आयी शरद् पूर्णिमा..
इस अवसर पर सभी यदुवंशी द्वारिका के पास एक और द्वीप प्रभासतीर्थ जाते और उत्सव मनाते...
इस बार भी कृष्ण और उद्धव को छोड़ सभी यादव प्रभासतीर्थ पहुंच गए उत्सव मनाने...
दो दिन बीत गए...प्रभासतीर्थ से कोई समाचार न मिलने से कृष्ण परेशान हो उठे..
तभी प्रभासतीर्थ का क्षेत्रपाल दारुण समाचार ले कर आया कि शरदोत्सव प्रारम्भ होते ही सहस्त्रों यादव मद्यपान में लिप्त हो गए.. पहले कृतवर्मा ने स्यमन्तक मणि का प्रसंग उठा कर कृष्ण को चोर कहते हुए सात्यकि को उकसाया.. तब गुस्से में सात्यकि ने मूसल का आकार ले चुकी घास को कृतवर्मा पर फेंका.. इस पर साम्ब ने सात्यकि पर आक्रमण कर दिया..तभी कृष्ण के वरिष्ठ पुत्र प्रद्युम्न ने साम्ब का वध कर दिया..
युवराज बलराम ने लड़ाई रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन यादव आपस में मारकाट मचाते रहे..
बलराम दुखी हो कर एक शिला पर बैठ गए और वहीं जल समाधि ले ली...
सूर्योदय होते होते प्रभास रणभूमि बन गया ..सर्वत्र यादवों के शव बिखरे पड़े थे... इस तरह उन्मत्त यादवों का विनाश हुआ..गांधारी और दुर्वासा ने जो श्राप दिये थे, फलीभूत हुए... इस दुखद मौके पर द्वारिका आए अर्जुन से श्रीकृष्ण ने बस इतना ही कहा.. मेरे पश्चात द्वारिका की सभी यादव स्त्रियों की रक्षा तुम्हें ही करनी है पार्थ..
यह कहते हुए कृ्ष्ण को अपना अंत स्पष्ट दिखायी दे रहा था शायद...


