अटल हों या मोदी, सरकार में आते ही इनका पाकिस्तान के प्रति प्रेम उमड़ पड़ता है
अटल हों या मोदी, सरकार में आते ही इनका पाकिस्तान के प्रति प्रेम उमड़ पड़ता है
मधुवन दत्त चतुर्वेदी
फासिस्ट जनता के कर्तव्यों पर केंद्रित होते हैं उसके अधिकारों पर नहीं।
यहाँ 'भारतीय फासिस्ट' शास्त्रीय फासिज्म का और भी विकृत स्वरुप हैं। वे पाकिस्तान के प्रति सारे गुस्से का इजहार जनता से ही चाहते हैं, जबकि वे खुद देश की सरकार चला रहे हैं। सरकार में आते ही इनका पाकिस्तान के प्रति प्रेम उमड़ पड़ता है, फिर चाहे अटल जी हों या मोदी।
पाकिस्तान के प्रति जनता से घृणा की उम्मीद करने वाले आखिर साड़ी-शाल आम-अंगूर के आदान-प्रदान से भी आगे जाकर बिन बुलाये वहां के पीएम की निजी दावतों में क्यों जा पहुँचते हैं ? क्या पीएम का व्यवहार जनता के लिए अनुकरणीय नहीं होना चाहिए ? क्या वह देश की नीतियों का प्रतीक न हो ? क्यों पीएम प्यार जताए और जनता नफ़रत ?
सीधा अर्थ है, आप जनता में नफ़रत के फैलाव के लिए पकिस्तान विरोधी हैं, सरकार चलाने के लिए पाकिस्तान प्रेमी हैं। मेरा मानना है युद्धकाल में भी दो देशों की जनता को एकदूसरे से नफ़रत नहीं करनी चाहिए।
युद्ध राजनैतिक निर्णय होते हैं।
पाकिस्तान सरकार द्वारा काश्मीर में वर्तमान अशांति के सम्बन्ध में सोमवार को प्रस्तावित काला-दिवस निंदनीय है। यह भारत के आतंरिक मामलों में अनावश्यक और अनपेक्षित हस्तक्षेप है। यह मोदी और नवाज की व्यक्तिगत मित्रता से भारत को कोई लाभ न होने का प्रमाण भी है। भारत गणराज्य, इसकी संवैधानिक संस्थाएं और इसके लोग पर्याप्त जागरूक एवं सक्षम हैं अशांति से निबटने के लिए भी और आम कश्मीरियों के मानवाधिकार हनन पर आपत्ति के लिए भी। पाकिस्तान का इस मामले में रवैया क्षेत्र की अशांति बढ़ाने वाला है।
मैंने शुरू में ही कहा था कि मिथ्या राष्ट्रवादी देश को गृहयुद्ध में झोंकेंगे या फिर युद्ध में।
निजी खबरिया चेनल्स उनके इसी एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। वे इनदोनों बुरी परिस्थितियों के लिए माहौल बना रहे हैं।
पटना में "पॉपुलर फ्रंट जिंदाबाद" के नारे को "पाकिस्तान जिंदाबाद" कहकर उन्माद को हवा दी गयी है।
यदि यह सही है तो भी 'पकिस्तान जिंदाबाद' का नारा तब तक आपत्तिजनक नहीं है जब तक कि उसे लगाने वाला 'हिन्दोस्तान मुर्दाबाद' साथ में न बोले। वैसे कानून में सिर्फ नारा लगाना देशद्रोह नहीं है।


