अनायास नहीं संघ का प्रदर्शन
अनायास नहीं संघ का प्रदर्शन
बीती 10 नवंबर को हुआ राष्ट्रीय स्वयं सेंवक संघ का प्रदर्शन अनायास नहीं है। यह संघ की नई रणनीति का हिस्सा है। इस रणनीति से संघ अपनी खोई जमीन को मजबूत ढंग से वापस पाना चाहता है। केंद्र की यूपीए सरकार के नवीनतम बयानों ने संघ की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। साथ ही, भारतीय समाज में संघ के राजनीतिक संगठन भारतीय जनता पार्टी की भारतीय समाज में गिरी साख ने संघ की चिंताओं ने आग में घी डालने का काम किया है। बीते एक दशक के दौरान हिंदुत्व की राजनीति देश में कमजोर हुई है। इसे लेकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस)काफी चिंतित है। हिंदुत्व की जमीन को दमदार तरीके से वापस पाने के लिए आरएसएस इन दिनों ऐसी रणनीति तैयार करने में लगा है, जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर की जा रही इस्लाम की राजनीति को मात दे सके और भारतीय राजनीति समेत समाज के हर वर्ग में हिंदुत्व का बोलबाला हो सके। लेकिन विकास के मुद्दे पर पिट चुकी धर्म की राजनीति ने आरएसएस को और भी संशय में डाल दिया है। केंद्र की यूपीए सरकार ने आतंकवादी घटनाओं में जिस प्रकार से आरएसएस और उसके आनुषांगिक संगठनों से जुड़े लोगों के नाम का खुलासा किया है, उससे आरएसएस की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। इसके अलावा अयोध्या में हुए बाबरी विध्वंस और राम जन्म भूमि के मामले में भी संघ की राजनीति को धक्का लगा है। भारतीय समाज में धुमिल हुई छवि को वापस लाने और केंद्र की यूपीए सरकार को घेरने के लिए आरएसएस को करीब चार दशकों बाद सड़क पर उतरना पड़ा। हिंदुत्व और आरएसएस के प्रति लोगों की घटती रुची ने आरएसएस के नेतृत्वकर्ताओं में एक नई पहल पर विचार मंथन पैदा की। सूत्रों की मानें तो मंथन के बाद संघ के नेतृत्वकर्ताओं के पास कई प्रकार के प्रस्ताव आए। इन प्रस्तावों पर कई बार बैठकें हुईं। नेतृत्वकर्ताओं ने महसूस किया कि बुनियादी मुद्दों पर आरएसएस का जुड़ाव कम हुआ है। साथ ही यह तय हुआ कि एक ऐसे कदम की पहल की जाए जिससे आरएसएस की छवि में सुधार आए और लोगों को महसूस हो कि आरएसएस हिंदुत्व और जनसरोकारों के मुद्दे से पीछे नहीं हटा है। आज भी संघ हिंदुत्व और जनसरोकारों के प्रति पूरी तरह से सक्रिय है। संघ नेतृत्वकर्ताओं की बैठक में आरएसएस के राजनीतिक संगठन भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान भूमिका के बारे में भी चर्चा हुई। बीते आधा दशक के दौरान भारतीय जनता पार्टी की राजनीति और रणनीति के बारे में भी चर्चा हुई। तय हुआ कि हिंदुत्व की राजनीति से जुड़े मुद्दों को
संघ खुद अपने हाथ में ले और ऐसा कदम उठाए जो हिंदू समाज को एक सूत्र में बांध सके। फिर संघ ने जमीन से जुड़ी पहल के बारे में विचार किया। विचार-मंथन के बाद यह तय हुआ कि बीते दिनों केंद्र की यूपीए सरकार ने आरएसएस एवं हिंदुत्ववादी संगठनों को जिस प्रकार से दुष्प्रचार किया है, उन मुद्दों को लेकर एक बार फिर सड़क पर उतरा जा सकता है। इस पहल के लिए आरएसएस के पास दो प्रमुख मुद्दे भी हाथ लगे थे। एक, अजमेर ब्लास्ट में संघ प्रचारक इंद्रेश कुमार को राजस्थान एटीएस द्वारा आरोपित किए जाने का। दूसरा, केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम के "भगवा आतंकवाद" का बयान। दोनों ही मुद्दों ने भारतीय समाज में आरएसएस की छवि को धुमिल
किया था। आतंकवाद के मुद्दे पर धुमिल छवि को ठीक करने के लिए संघ ने आम जनता से जुड़ने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने सड़क पर उतर कर विरोध प्रदर्शन का रास्ता चुना। साथ ही तय हुआ कि संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान किया जाए। साथ ही यह भी तय हुआ कि वरिष्ठ सांसद मुरली मनोहर जोशी इस मुद्दे को लोकसभा में उठाएंगे। लेकिन संसद में भ्रष्टाचार के मुद्दों पर घिरी कांग्रेस नीत केंद्र सरकार की बौखलाहट को देखते हुए संघ ने भगवा आतंकवाद और हिंदुत्व के मुद्दे को संसद में उठाने की रणनीति को वापस ले लिया। लेकिन समय की नजाकत को देखते हुए संघ कभी भी इस रणनीति को अंजाम दे सकता है। बीती 10 नवंबर को संघ के विश्वव्यापी प्रदर्शन के दौरान संघ के पूर्व संघ प्रमुख केएस सुदर्शन और वर्तमान संघ प्रमुख मोहन भागवत सरीखे नेतृत्वकर्ताओं के वक्तव्यों से यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि केंद्रीय गृहमंत्री के भगवा आतंकवाद और हिंदुत्व विरोधी बयानों पर चुप नहीं बैठेगा। सूत्रों की मानें तो आने वाले दिनों में संघ आम आदमी की सहभागिता वाली दूसरी योजनाओं को अंजाम दे सकता है। इसमें धार्मिक यात्राएं भी शामिल हैं।


