अनुपम मिश्र का शारीरिक अवसान, देश, समाज के लिए अपूरणीय क्षति
अनुपम मिश्र का शारीरिक अवसान, देश, समाज के लिए अपूरणीय क्षति
अनुपम मिश्र का शारीरिक अवसान, देश, समाज के लिए अपूरणीय क्षति
पंकज चतुर्वेदी
नई दिल्ली, 19 दिसंबर। अनुपम बाबू आज सुबह पांच चालीस बजे अपनी अंतिम अनंत यात्रा पर निकल पड़े.
अनुपम भाई, यानि अनुपम मिश्र, - जब सरकार को पर्यावरण जैसे किसी शब्द कि परवाह नहीं थी, तब उन्होंने गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में पर्यावरण कक्ष स्थापित कर दिया था.
अस्सी के दशक में उनकी पुस्तक हमारा पर्यावरण, हिंदी में देश के समग्र पर्यावरण अध्ययन का पहला दस्तावेज था.
"आज भी खरे हैं तालाब" ने तो समाज और सरकार की जल संरक्षण के प्रति दिशा ही बदल दी. कथेतर साहित्य में हिंदी में सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक के लेखक, एक संवेदनशील इंसान, प्रख्यात कवि भवानी प्रसाद मिश्र के बेटे अनुपम भाई का जन्म 1946 ईसा वर्धा में हुआ था.
उन्हें चंद्रशेखर आजाद राष्ट्रीय पुरस्कार, जमनालाल बजाज पुरस्कार, इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार सहित कई सम्मान मिले, लेकिन वे अपनी लेखनी, समय, शक्ति केवल समाज के लिए लगाते रहे.
पिछले साल जब उन्हें प्रोस्टेट का कैंसर उभरा तो भी वे इस दर्द को सह कर भी काम में लगे रहे.
आज सुबह दिल्ली के आल इंडिया मेडिकल साईंस (एम्स) में उनका शारीरिक अवसान, देश, समाज के लिए अपूरणीय क्षति है.
मेरे लिए तो यह असीम दुःख के पल हैं.
मेरे लिखने की दिशा अनुपम बाबू ने बदली थी। अस्सी के दशक में हम बुन्देलखंड- के पत्रकार डकैत या मूर्तियां, प्राचीन मंदिर पर लिखा करते थे। सन् १९८६ में नौकरी तलाशने दिल्ली आया तो अनुपम जी से किसी परिचित के माध्यम से मुलाक़ात हुई. उन्होंने पर्यावरण वाली पुस्तक पढ़ने को दी।
उस समय तालाब वाली पुस्तक पर काम जोर-शोर से चल रहा था।
उन्होंने कहा कि तुम अभी तक जो लिखते हो उससे समाज को कोई लाभ नहीं है और उन्होंने तालाब के प्रति एक अलख मेरे मन में जगा दी। फिर मैं जुट गया। "आज भी खरे हैं तालाब" में उन्होंने दो स्थान पर मेरा सन्दर्भ दिया, बुंदेलखंड के तालाबों को ले कर.
उसके बाद मेरे लिखने की धारा ही बदल गयी। यह मेरे ही नहीं देश के हज़ारों हज़ार लोगों के साथ हुआ और अनुपम बाबू ने उनकी कलम, विचार और कार्य को सकारात्मक दिशा दी.
आज दिन में ११ बजे तक उनका पार्थिव शरीर गांधी शान्ति प्रतिष्ठान आएगा, उसके बाद निगम बोध घाट पर उनका अंतिम संस्कार.
बीत रहे साल का सबसे दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण दिन मेरे लिए।


