अपनी बेबिसियों का जरा भंडाज नहीं है आपकों।

अपने लकीरें देख लीन, खाली हाथ नहीं देखे अभी।

नागरिक हैं भी और नागरिक नहीं भी हैं आप यकीनन।

राशनकार्ड, पैण, आढ़ा, डीएनए प्रोफाइलिंग से लेकर जान माल पहचान तक नहीं है नागरिकता के सबूत।

पलाश विश्वाास

समकालीन तीसरी दुनिया का अगस्त अंक मेरे सामने है।

लगता है नए सिरे से सत्ता के दशक में दाखिला हो गया है।

सत्ता के दशक के बाद जनसंख्या और जनता के मुद्दों पर केंद्रित इतना बेहतरिन अंक कोई देखा नहीं है।

कोहिनूर की तरह अंक निकालना है हमारे बड़े भाई आनंद स्वरूप वर्मा ने।

बड़े भाई की तारीफ भी बतनमीजी मानी जाएगी और इस अंक में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिस पर अलग से चर्चा की जा सके।

बेहतर हो कि हमारे लिखे का कटाई भरसा न करें।

तुरंत जहां मिले, वहीं इस अंक को सहज लें।

सबसे बेहतर, तुरन्त आनंद जी को आजीवन सदस्यता का चेक दें ताकि ऐसे अंकों का सिलसिला बना रहे। रुकें नहीं हरगिज।

शायद 1980 की जनवरी में नई दिल्ली में स्प्रुह हाउस से चाणक्यपुरी सोवियत दूतावास तक अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के खिलाफ लंबा जुलूस निकाला था। उर्मिलेश और गोर्की और जेएनयू के तमाम साथियों के साथ उस जुलूस में हम शामिल थे।

चलते-चलते चप्पल टूटी गई थी।

हम हाथ में लिए चल रहे थे।

किसी साथी ने कहा कि जुलूस में चल रहे हो।

चप्पल झोले में डालो।

उसने कहा कि हम लोग नॉटंकी नहीं कर रहे हैं।