अब नहीं लगेंगे शहीदों की चिताओं पर हर बरस मेले
अब नहीं लगेंगे शहीदों की चिताओं पर हर बरस मेले
24/9/2015
प्रिय भाई पलाश,
भारतीय भाषा परिषद के अतिथि कक्ष संख्या 6 से यह पत्र तुम्हें लिख रहा हूं। परसों रात्रि से मेरी तबियत अस्वस्थ हो गई। अपच और सर्दी का अहसास हुआ। अभी ठीक नहीं हूं। रात्रि के 2 बजे से जगा हूं। नींद नहीं आ रही तो तुम्हें यह पत्र लिखने बैठ गया।
कोलकाता मैं ऐसे समय आया जब इस जमीन पर क्रांतिकारी आंदोलन के निशान विलुप्त हो चुके हैं।
1980 की कई दिन की यात्रा में शहीद यतीन्द्रनाथ दास के भाई किरनचन्द्र दास के पास 1, अमिता घोष रोड पर ठहरा था। अब वहां किरन दा के बेटे मिलन दास एक उदास और सन्नाटे भरे घर में रहते हैं। यतीन्द्र की सब स्मृतियां वहां से लुप्त हो चुकी हैं।
15, जदु भट्टाचार्जी लेन में रहने वाले क्रांतिकारी गणेश घोष भी नहीं रहे जिनका मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। गणेश घोष की याद में पिछले दिनों मैंने बरेली के केन्द्रीय कारागार में बैरक के नामकरण के साथ ही स्मृति-पटल तथा चित्र लगवा दिया है।
क्रांतिकारी बंगेश्वर राय, गोपाल आचार्य भी तो अब कहां होंगे। मुझे कोई यह बताने वाला भी नहीं कि जिस फ्रीडम फाइटर्स एसोसिएशन को 11, गवर्नमेंट प्लेस ईस्ट से क्रांतिकारी भक्त कुमार घोष चलाते थे और जिनने कभी अपने निजी व्यय से यहां ’विप्लवी निकेतन’ की स्थापना की थी ताकि कोई क्रांतिकारी किसी पर बोझ न बने, उनका क्या हुआ। उन्होंने अनेक स्मारक अपने खर्चे पर बनवाए।
जगदीश चटर्जी 4 बल्लभदास स्ट्रीट कोलकाता, पूर्णानंद दास गुप्त, महाराज त्रैलोक्य चक्रवर्ती जतीन दास मेमोरियल 47 चण्डीतल लेन, कोलकाता-40, वीरेन्द्र बनर्जी हावड़ा, सूरज प्रकाश आनंद जिनके चार बड़े-बड़े कमरों में शहीदों की बड़ी-बड़ी पेंटिंग्स लगी थीं, इन सबका अता-पता देने वाला अब कोई नहीं।
नौसेना विद्रोह के विश्वनाथ बोस भी यहीं 42, टेलीपारा लेन में रहते थे। 1983 के आगरा में आयोजित नाविक विद्रोहियों के सम्मेलन में उनसे मुलाकात हुई थी।
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में क्रांतिकारी प्रकाशन के संचालक और उस छोटे शहर में ’शहीद उद्यान’ में शहीदों के दर्जनों बुत स्थापित करने वाले बटुकनाथ अग्रवाल की बेटी उर्मिला अग्रवाल 1980 में यहीं थीं। तब मैं उनके घर 15, इब्राहीम रोड पर गया भी था।
आज मुझे क्रांतिकारिणी सुनीति घोष और बीणा दास की भी बहुत याद आ रही है जिनसे मिलने का सुअवसर मुझे यतीन्द्रनाथ दास बलिदान अर्द्धशताब्दी में मिला था। साहित्यिक दुनिया में विमल मित्र, सन्हैया लाल ओझा, महादेव साहा, मनमोहन ठाकौर और रतनलाल जोशी का मुझे बहुत स्नेह मिला। इनसे पत्र व्यवहार भी रहा। इन सबके बिना कोलकाता का अर्थ मेरे लिए बहुत बदल गया है।
मैं कुछ किताबों की भी ढूंढना चाहता था पर वे कैसे मिलें। शांति घोष ने जेल से छूटने के बाद अपनी आत्मकथा ’अरूण बंदी’ (लाल आग) लिखी। त्रैलोक्य चक्रवर्ती ने ’जेलों में 30 साल’ रची। क्रांतिकारी नलिनीदास ने भी अपने संघर्ष को लिपिबद्ध किया था। नाम याद नहीं आ रहा। बीणा दास के मेमोआर मुझे जुबान प्रकाशन से पिछले दिनों मिल गए हैं। और भी बहुत कुछ है पर इसके सूत्र कहां से मिलें। आपको अपनी इस चिंता और बेचैनी से अवगत करा रहा हूं।
स्वस्थ होंगे। एक बार और बैठकर बातें हों तो अच्छा रहे।
-सुधीर विद्यार्थी


