अफसरों की लड़ाई में दुधवा नेशनल पार्क से विमुख हो रहे हैँ पर्यटक
रामेन्द्र जनवार
उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र के जनपद लखीमपुर खीरी के उत्तरी भाग में नेपाल सीमा से सटा दुधवा नेशनल पार्क आजकल चर्चा में है। वन विभाग और जिला प्रशासन के अधिकारियों के बीच लगभग एक माह शुरू हुई जंग थमने का नाम नहीं ले रही है जिसके चलते पर्यटकों को भी भारी नुकसान उठाना पड रहा है।
लखीमपुर का यह वनाच्छादित क्षेत्र 1958 में ही वाइल्डलाइफ सेंच्युरी घोषित कर दिया गया था फिर प्रख्यात वन्यजीव प्रेमी बिली अर्जन सिंह के प्रयासों के चलते जनवरी 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने इसे दुधवा नेशनल पार्क घोषित किया, फिर 1987 में इसे टाइगर रिजर्व भी घोषित किया गया।
इसे आज उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है, लेकिन अधिकारियों के मौजूदा विवाद के लम्बा खिंचने से पर्यटकों का दुधवा नेशनल पार्क से मोहभंग होने लगा है। लगभग एक माह पूर्व इस विवाद की शुरूआत तब हुई जब पार्क कर्मियों के संगठन फेडरेशन आफ फारेस्ट एसोशिएशन ने चर्चित महिला आईएएस और लखीमपुर की जिलाधिकारी किंजल सिंह पर गम्भीर आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन भेजा और कार्य बहिष्कार कर आन्दोलन शुरू कर दिया। पर्यटकों के लिए दिक्कत तभी शुरू हो गयी क्योँकि पर्यटन सत्र शुरू हो चुका था। उधर पार्क कर्मियों द्वारा लगाए गए आरोप इतने गम्भीर थे, कि मुख्यमंत्री ने इसे संज्ञान में लेते हुए मुख्य सचिव से सम्बंधित अधिकारियों से बात कर विवाद निपटाने के आदेश दिए लेकिन मुख्य सचिव की कोशिशें भी काम नहीं आई और ना ही पार्क कर्मियों की जिलाधिकारी के स्थानान्तरण की माँग पर कोई निर्णय लिया गया।
नतीजतन 16 दिसम्बर से फिर पार्क कर्मियों ने दुधवा पार्क के गेट पर ताला जड़कर आन्दोलन शुरू कर दिया।
अब मामले ने राजनीतिक रंग लेना शुरू कर दिया है। 16 दिसम्बर को ही प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी के समर्थक बताए जा रहे दो-ढाई सौ युवाओं ने पार्क के गेट पर इकट्ठा होकर दुधवा पार्क प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की और उपनिदेशक का पुतला भी जलाया। प्रदर्शनकारियों ने दुधवा - गौरीफंटा मार्ग भी बन्द कर दिया जिससे नेपाल जाने वालों को भी दिक्कत का सामना करना पड़ा। वन विभाग ने 250 लोगोँ के खिलाफ वन अधिनियम के तहत् मुकदमा भी दर्ज किया है।
बहरहाल इस मसले को तत्काल हल ना किया गया तो पर्यटक तो इधर से विमुख होंगे ही, वहीं संरक्षित वन क्षेत्र अगर धरना प्रदर्शन और पुतलादहन के केन्द्र बना और वन्यजन्तु भी दूसरा ठिकाना तलाशने निकल पड़ें तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए।
फिलहाल प्रदेश सरकार इस मामले में उदासीन दिख रही है। ज़रूर इंदिरा गाँधी और बिली अर्जन सिंह की आत्माएँ इन हालात को देखकर कराह रही होंगी।
ताजा जानकारी के अनुसार गुरुवार को फारेस्ट एसोशिएशन के संरक्षक की मौजूदगी में हुई उभयपक्षीय बैठक में शासन स्तर पर मामले की जाँच अपर मुख्य संरक्षक को सौंपे जाने की जानकारी मिलने के बाद कर्मचारियों ने जाँच पूरी होने तक आन्दोलन स्थगित कर दिया है, लेकिन अब तक पर्यटकों ने घर का रास्ता पकड़ लिया है।