अभी इंसानियत मरी नहीं
अभी इंसानियत मरी नहीं
दंगों से चंद लोग संसद या विधानसभा में पहुंच जाते हैं, लेकिन हजारों लोग राहत शिविरों में पहुंच जाते हैं
सलीम अख्तर सिद्दीकी
कल बुढ़ाना (मुजफ्फरनगर) में साया जनहित सोसायटी ने ‘पयाम-ए-इंसानियत’ नाम से एक वगम रखी थी। मुझे भी इसमें जाने का इत्तेफाक हुआ। यह देखकर सुखद लगा कि अभी इंसानियत मरी नहीं है। वहां ऐसे अनेक लोग थे, जिन्होंने पिछले साल हुए दंगों के दौरान सकारात्मक भूमिका निभाई। वे लोग हैरत कर रहे थे कि कैसे जनभावनाओं को उभार कर कुछ राजनीतिक दल अपना उल्लू सीधा करते हैं और हमें कुछ देर के लिए ही सही, मजहब और धर्म के आधार पर एक-दूसरे के सामने खड़ा कर देते हैं। दंगों से चंद लोग संसद या विधानसभा में पहुंच जाते हैं, लेकिन हजारों लोग राहत शिविरों में पहुंच जाते हैं।
मुजफ्फरनगर पिछले साल हुए दंगों से अभी उबरा नहीं है। दंगों की टीस रह-रहकर उभर आती है। गोष्ठी में इस बात पर अफसोस जाहिर किया गया कि अपराधी की धर्म के आधार पर पहचान करके उसके समर्थन में उसके समुदाय के लोग आते हैं, तो दूसरे धर्म के लोग पूरे समुदाय के खिलाफ मोर्चा खोल देते हैं। दरअसल, यही बड़ी समस्या है। जब तक अपराधी को उसके धर्म के आधार पर पहचाना जाता रहेगा, समस्या बनी रहेगी। जिस दिन लोग इतने जागरूक हो गए कि अपराधी, अपराधी होता है, उसका कोई धर्म नहीं होता, ‘दो समुदाय आए आमने-सामने’ जैसे खबरें आनी बंद हो जाएंगी।
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