अरुन्धति रॉय के साथ दांतेवाड़ा में थोड़ा और आगे बढ़ें —
अरुन्धति रॉय के साथ दांतेवाड़ा में थोड़ा और आगे बढ़ें —
युवा आदिवासियों के साथ गुजारे दिनों में अरुन्धति रॉय सल्वा जुडूम नाम के संगठन के कई सच हमारे सामने लाती हैं...... हम ये अच्छी तरह जान लें कि वो माओवाद की पैरोकारी नहीं, आदिवासियों के हालात हमारे सामने रख रही हैं। ……… तो सल्वा जुडूम वो संगठन है जो माओवादियों का मुकाबला करने के लिए खड़ा किया गया.… लेकिन जिसका चरित्र बहुत कुछ उस बंगाल आर्मी से मेल खाता है जो रॉबर्ट क्लाइव ने 1757 में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को नेस्तनाबूद करने के लिए बनाई थी.… और जिसमें सभी सैनिक देसी थे.…… रोहिल्ला, पठान, भोजपुर के राजपूत और पूर्वी उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण खासतौर पर.…… और अगले सौ साल तक बंगाल आर्मी ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरफ से अपने ही लोगों से लड़ती रही और अपनों को ही मार कर कम्पनी के राज्य का विस्तार करती रही.…
सल्वा जुडूम महेंद्र कर्मा नामके उस आदिवासी ज़मींदार की कारस्तानी है, जो कभी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ा हुआ करता था........ उसके संगठन में उन आदिवासियों को भर्ती किया किया गया, जो सरकार के पुलिस कैम्पों में बसने को अभिशप्त थे.… और जो आदिवासी पुलिस कैंप में नहीं आया वो माओवादी या देशद्रोही मान लिया गया.… उसे ( चाहे वो किसी उम्र का हो, किसी भी जेंडर का हो) देखते ही गोली मारने का आदेश पारित हो गया.…… .... जंगलों में रह कर अपने अस्तित्व की लड़ाई उनकी मजबूरी बन गयी........ जबकि सल्वा जुडूम से जुड़े आदिवासी हथियारबंद फ़ोर्स में तब्दील हो गए, जिन्हें सरकार की तरफ से वेतन भी मिलता है, रहने को टीन के छप्पर वाले बंकरनुमा घर. अब ये देश भर के तमाम सुरक्षाबलों के साथ कंधे से कंधा मिला कर अपने ही लोगों पर गोलियां चलाते हैं, उनके झोंपड़े जलाते हैं और आदिवासी लड़कियों पर हर तरह का जुल्म ढाते हैं.……… यहां जुल्म ढाने का तात्पर्य आप खुद ब खुद समझ लें........सल्वा जुडूम के गौरवमयी कारनामे भारतीय जनता पार्टी हो या कांग्रेस.... दोनों को दिन ढलने के बाद आपस में गलबहियां डालने को प्रेरित कर रहे हैं.……
अब देखना ये है कि आदिवासी माओवादी अपनी लड़ाई को कहाँ तक खींच पाते हैं क्योंकि धरा हो या आसमान-सब कुछ उनके खिलाफ है, कुल मिला कर माओवादियों के हाथों में ही वो अपना भविष्य, अपने जंगल, अपने पहाड़ और अपनी इन्द्रावती घाटी देख रहे हैं.……
सरकार को जब किसी एस्सार, वेदांता या टाटा या किसी विदेश कम्पनी के साथ लोहा या किसी अन्य खनिज के खनन का करार करना होता है, वो प्रशासनिक साये में रह रहे सौ-पचास आदिवासी बुजुर्गों को बुला कर ऊपर से नीचे को उनकी मुंडी हिलवाती है, फिर कुछ भाषण होते हैं, सब के गले में गेंदे की माला डाली जाती हैं, फिर मंत्री जी के द्वारा क्षेत्र के विकास की कुल्फी जमाई जाती है, सब एक पंगत में बैठ कर खाते हैं..... मीडिया वाले अच्छी फोटो खींचते हैं, सुहावनी रिपोर्ट पढ़ने को मिलती है और उस दिन अखबारों को पूरे पेज का विज्ञापन मिलता है..... तुम भी खुश-हम भी खुश..... बच्चों बजाओ ताली …।
O- राजीव मित्तल


