अल्पसंख्यक कल्याण के दिग्भ्रम
- शब्बीर कादरी
सच यह है कि अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं के क्रियान्वयन की गहराई से की गई पड़ताल कल्याणरूपी दिग्भ्रम के अनेक प्रतिबिम्ब बनाती हैं। यह और भी निराशाजनक है कि केन्द्र और राज्य सरकारों के इस दिशा में किए गए प्रयास लचर और उत्साहविहीन दिखाई देते हैं, अंतत: माना जा सकता है मंत्रालय और राज्य सरकारों द्वारा लागू की गई कई योजनाओं के सुफल न पहले प्राप्त हुए और न अब।
हां, अरबों रुपए की योजनाएं कागजों पर इस वर्ग का राजनीतिक वशीकरण करने को काफी हैं। सबका साथ सबका विकास तो तभी सार्थक हो सकता है जब सर्वाधिक उपेक्षित इस वर्ग को भी कल्याणरूपी विकास के सूर्य की नई सुबह प्राप्त हो और यदि इस कवायद का क्रम इसी प्रकार गतिमान रहा तो सबके साथ कम से कम इस वर्ग का विकास तो असंभव होगा ही।
सबका साथ सबका विकास मंत्र की परिकल्पना का न्यायपूवर्क परिपालन इन दिनों अल्पसंख्यक कल्याण के संदर्भ में मृगमरीचिका सिद्ध हो रहा है।
इस दिशा में कार्यरत अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही भारी-भरकम बजट राशि की अनेक योजनाएं कागजों से उतर कर धरातल पर कब आकार लेंगी इसकी चिंता सरकार को जनप्रतिनिधियों को और प्रशासनिक व्यवस्था को उतनी ही है जितनी नहीं होना चाहिए। वैसे भी अपने कल्याण की गाथा में मुग्ध समाज का यह उपेक्षित मुस्लिम वर्ग निराशा के अंधकार में विकास रूपी आशा की किरण सदियों से खोज रहा है जिसकी एक भयावह तस्वीर सच्चर कमेटी पहले कभी दिखा चुकी है।

अरबों रुपए की योजनाएं सिर्फ कागजों पर
सच यह है कि अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं के क्रियान्वयन की गहराई से की गई पड़ताल कल्याणरूपी दिग्भ्रम के अनेक प्रतिबिम्ब बनाती हैं। यह और भी निराशाजनक है कि केन्द्र और राज्य सरकारों के इस दिशा में किए गए प्रयास लचर और उत्साहविहीन दिखाई देते हैं, अंतत: माना जा सकता है मंत्रालय और राज्य सरकारों द्वारा लागू की गई कई योजनाओं के सुफल न पहले प्राप्त हुए और न अब।
हां, अरबों रुपए की योजनाएं कागजों पर इस वर्ग का राजनीतिक वशीकरण करने को काफी हैं।
कल्याणकारी योजनाओं की पिछली बातें भूलकर अब यदि नई सरकार के मंत्रालय की कार्य कुशलता की बात की जाए तो भी कोई उत्साहवद्धर्क आंकड़े पिछले दो वर्षों में आकर्षण पैदा नहीं करते, इस दिशा में राजधानी के सिटीजन वेलफेयर फोरम के एम. आफा$क विगत कई वर्षों से विकास के इस कदमताल पर नज़र रखे हुए हैं वे राज्यभर में अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं के अक्षरश: परिपालन हेतु अपने सीमित प्रयासों से उपेक्षित वर्ग को न्याय दिलाने के प्रयास में जुटे हैं जहां उन्हें कदम-कदम पर प्रशासनिक उदासीनता, घोर लापरवाही और अन्याय दिखाई देता है।
फोरम बताता है कि वर्ष 2015-16 में राशि रुपए 3,712.78 का बजट आबंटन अल्पसंख्यक कल्याण के लिए इस मद में किया गया। जिसमें से इस मद में व्यय की गई राशि का ताजा ब्यौरा मंत्रालय की वेबसाइट 23 फरवरी 2016 पर उपलब्ध है को 30 जून 2015 तक की व्यय राशि का उल्लेख करती है। यह राशि केवल रुपए 465.83 करोड़ अर्थात 12.54 ही है। हद यह है कि मार्च 2016 की स्थिति में 1426 करोड़ अर्थात केवल 38.40 प्रतिशत ही व्यय हो सका है।

समझा जा सकता है कि इस विभाग की सबके साथ विकास की अवधारणा किस गति से साकार हो रही है।
उदाहरणार्थ अल्पसंख्यक कल्याण की एक अहम् योजना जो मल्टी सेक्टोरल डेवलपमेंट स्कीम (एमएसडीपी) कही जाती है अपनी दुर्गति पर आंसू बहाती नज़र आती है इस योजना में देश के अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में समस्त प्रकार के विकास कार्य जैसे स्कूल, बिजली, जल व्यवस्था, सड़क, सीवेज व्यवस्था सहित स्किल डेवलपमेंट आदि की व्यवस्था की जाती है, दर्शाती है कि बजट में उपलब्ध राशि रुपए 1251.64 में से 161.42 करोड़ अर्थात केवल 12.89 प्रतिशत ही इस मद में खर्च किए जा सका है।
यह क्रम उपेक्षा और लापरवाही के रूप में आगे बढ़कर कोचिंग स्कीम में 19.46 प्रतिशत, रिसर्च तथा मॉनिटरिंग आदि में 20.37 प्रतिशत, स्किल डेवलपमेंट में 36.56 प्रतिशत तक ही आंकड़ों का आकार ले सका है।

विकास और कल्याण का हाल वही है जो सदा रहा है
अल्पसंख्यक कल्याण की योजनाओं का क्रियान्वयन भोपाल जिले की सभी वे स्लम बस्तियां, जहां अल्पसंख्यक बहुल आबादी है, की आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने हेतु किया जाता है, 12 वीं पंचवर्षीय योजना में इस योजना के तहत 25 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी वाले अन्य शहर जैसे श्योपुर, महू केंट, खरगोन तथा बुरहानपुर के शहरी क्षेत्रों इत्यादि को भी इसमें सम्मिलित तो किया गया पर कमोबेश वहां तत्संबंधी विकास और कल्याण का हाल वही है जो सदा रहा है।
उल्लेखनीय तर्क यह है कि करोड़ों रुपए के बजट आबंटन उपरांत भी मंत्रालय और राज्य सरकारें इस दिशा में उतनी तत्परता और रुचि से भी काम करने में असहाय नज़र आती हैं जितनी उनसे संवैधानिक और वैधानिक रूप से किए जाने की अपेक्षा की जाती है। योजनाओं की स्वीकृति में जानबूझकर, देरी करना, प्राथमिकता के आधार का परिपालन न किया जाना और बजट राशि का समयसीमा में व्यय न होना सहित अनेक ऐसी प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक समस्याएं हैं जिनके चलते ये कार्यक्रम धरातल पर अत्यधिक उपेक्षित दिखाई देते हैं।
प्रशासनिक स्तर पर पड़ताल किया जाना चाहिए कि वे क्या कारण हैं कि मंत्रालय से आबंटन और स्वीकृति तत्काल प्राप्त नहीं हो पाती है या राज्य सरकारों के सामने वे क्या कठिनाईयां हैं जिनके चलते पर्याप्त बजट के उपरांत भी योजनाएं आकार नहीं ले पातीं ऐसे अनेक प्रश्न प्रयासरत अल्पसंख्यक आवेदकों को मुंह चिढ़ा रहे हैं और यही वजह है कि विकास नाम की चिडिय़ा इस समुदाय के आंगन में अभी तक अपना घोंसला भी नहीं बना पाई है।
सच यह भी है कि अल्पसंख्यक कल्याणरूपी योजनाओं के साकार न होने के पीछे इस वर्ग के राजनेताओं की चुप्पी और समाज की उदासीनता भी किसी सीमा तक जवाबदेह और जिम्मेदार है।

अल्पसंख्यक कल्याण की यह एक तस्वीर है दूसरी, अल्पसंख्यक वर्ग के विद्यार्थियों को स्कूलों में आरटीई के तहत उनके बच्चों के प्रवेश को लेकर है।
राजधानी में सघन अभियान चलाकर यदि उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देशों की इस संदर्भ में पड़ताल की जाए तो इस वर्ग के लगभग एक सैकड़ा शिक्षण संस्थान जो अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त हैं वहां विद्यार्थियों के स्कूल प्रवेश की दयनीय स्थिति उजागर होती है।
कहा जाता है कि इस वर्ग के बच्चे प्रवेश के इच्छुक नहीं है जबकि सच यह है कि स्कूल ही उन्हें प्रवेश देने में अनेक नियमविहीन प्रक्रिया के पालन का पथ बताता है जो अभिभावकों को निरूत्साहित करता है और बच्चों की प्रवेश प्रक्रिया बाधित होती हैं। राजधानी के ख्यातनाम स्कूलों में हर साल भर्ती किए गए अल्पसंख्यक के बच्चों का प्रतिशत इस भ्रम की पर्तें उधेड़ता है। सबका साथ सबका विकास तो तभी सार्थक हो सकता है जब सर्वाधिक उपेक्षित इस वर्ग को भी कल्याणरूपी विकास के सूर्य की नई सुबह प्राप्त हो और यदि इस कवायद का क्रम इसी प्रकार गतिमान रहा तो सबके साथ कम से कम इस वर्ग का विकास तो असंभव होगा ही।
हां, इस नारे के राजनीतिक लाभ अवश्य ही मिलते रहेंगे, जिसकी आज नितांत आवश्यकता है।
साभार - देशबन्धु