अंदरूनी कलह और गुटबाजी के चलते गोगोई के सामने पिछले प्रदर्शन को बरकार रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है
रीता तिवारी
पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले असम में राज्य की 14 में से आधी सीटें जीतने और कोई तेरह वर्षों से राज्य पर राज करने वाली कांग्रेस को अबकी विपक्ष नहीं, बल्कि अपनों से ही ज्यादा खतरा है। मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की अगुवाई में तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी ने सात सीटें जीती थीं। चार सीटों के साथ भाजपा राज्य में दूसरे नंबर पर थी। लेकिन अंदरूनी कलह और गुटबाजी के चलते गोगोई के सामने पिछले प्रदर्शन को बरकार रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
भाजपा ने पिछली बार असम गण परिषद (अगप) के साथ तालमेल किया था। तब अगप को एक सीट मिली थी। इस बार भी दोनों दलों के बीच तालमेल की बातचीत आखिरी दौर में है। इसके तहत भाजपा ने अगप को पांच सीटें देने का प्रस्ताव रखा है। अगप के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत दावा करते हैं कि इस बार उनकी पार्टी रिकार्ड सीटें जीतेगी। केंद्र में सरकार बनाने का सपना देख रही भाजपा भी यहाँ अपनी स्थिति में सुधार का प्रयास कर रही है। अपने देशव्यापी अभियान के तहत पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी राज्य में रैली भी कर चुके हैं।
कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि पार्टी महासचिव राहुल गांधी ने इस बार 14 में से कम से कम 12 सीटें जीतने का लक्ष्य दिया है। लेकिन मुख्यमंत्री गोगोई का दावा है कि अबकी नतीजा लक्ष्य से बेहतर होगा। यहाँ पार्टी अपनी सहयोगी बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के लिये एक सीट छोड़ती है। गोगोई ने कहा है कि अगर इस बार पार्टी को पिछली बार के मुकाबले ज्यादा सीटें नहीं मिली तो वे इस्तीफा दे देंगे।
राज्य की कम से चार सीटों पर अल्पसंख्यक वोट निर्णायक हैं। बाकी सीटों पर भी अपने अलग-अलग जातीय समीकरण हैं। पिछले पांच वर्षों के दौरान असम जातीय हिंसा और अलग राज्य की मांग में होने वाली हिंसा से जूझता रहा है। विपक्ष ने इसे ही अपना प्रमुख मुद्दा बनाया है। लेकिन कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, यहाँ हमें विपक्ष से नहीं बल्कि अपनों से ही ज्यादा खतरा है। पार्टी कई गुटों में बंटी हुई है और उसके नेता अक्सर सरेआम एक-दूसरे के खिलाफ बयान देते रहते हैं। राज्य में कांग्रेस की जीत की राह में यही सबसे बड़ी बाधा है। आम आदमी पार्टी (आप) ने भी राज्य की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। दूसरी ओर, ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस भी राज्य से कुछ वोट और हाथ लगे तो एकाध सीट बटोरना चाहती है। नरेंद्र मोदी के अलावा ममता भी राज्य में चुनावी रैलियों को संबोधित कर चुकी हैं। आप और तृणमूल सीटें भले न बटोर सकें, कुछ उम्मीदवारों का खेल तो बिगाड़ ही सकती हैं।जनादेश न्यूज़ नेटवर्क