वसीम अकरम त्यागी
शनिवार की रात मुरादाबाद में इंद्रा चौक स्थित जब्बार स्वीट्स के सामने सीवर हादसा हुआ था। शनिवार को बारिश होने से इंद्रा चौक पर पानी भर गया था। इसी रोड पर खोदे गए सीवर लाइन डालने के गड्ढे भी पानी से भर गए थे। इन्हीं गड्डों में पीतल बस्ती की सुमन गिर गई उसने जान बचाने की गुहार लगाई जिसकी चीख पुकार सुनक मगर इस भीड़ में जांबाज़ सिर्फ दो ही नौजवान निकलते हैं नोमान और दानिश। दानिश गड्ढ़े में फंसी सुमन को बचाने के लिये कूद गया उसके बाद नोमान ने भी गड्ढे में छलांग लगाई। एक जान को बचाने के लिये दो नौजवान गड्ढे में कूद पड़े मगर जिंदगी बचाने की इस जद्दोजहद में वे न खुद को बचा पाये और न सुमन को। मगर इतिहास में उनका नाम जान लेने वालों कि लिस्ट में नहीं बल्कि जान बचाने वालों की लिस्ट में लिखा गया। वैसे भी इंसान मरने के लिये ही तो पैदा होता है, उन्होंने जान देकर नई जिंदगी पाई।
यह घटना उस मुरादाबाद की है जिसकी जमीन पर सांप्रदायिक दंगों में निर्दोषों के खून से सड़कें लाल हुई हैं। अभी दो महीना भर पहले ही वहां तथाकथित रक्षकों के संगठनों ने शहर को सांप्रदायिक हिंसा में झोंकने की कोशिश की थी।
नोमान और दानिश की शहादत उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जिन्होंने हमेशा गंगा जमुनी तहजीब को खत्म करने की कोशिशें की हैं। मगर अफसोस इस बात का है कि मेरठ से लेकर रांची तक ‘लव जिहाद’ का प्रोपगेंडा खड़ा करने वाले संगठन और उनके प्रोपगेंडा का प्रचार करता इलैक्ट्रानिक मीडिया इस पूरी घटना को मात्र टिकर लायक ही समझता है। अखबारों ने भी सिंगल कॉलम या हद से हद डबल कॉलम में इस खबर को प्रकाशित करके अपनी जिम्मेदारी निभा ली है। अब जरा सोचिये अगर यही घटना कुछ इस तरह होती कि लड़की सुमन ही है और जिसको वह प्रेम करती है वह नोमान है अथवा दानिश। तब क्या यही मीडिया आसमान सर पर नहीं उठाती ? तब क्या पैनल डिस्कशन नहीं होते ? तब क्या अखबारों में फुल पेज मात्र इसी घटना के लिये आरक्षित नहीं होते ? हमने खरखौदा कांड देखा है जिसे मीडिया और तथाकथित संगठनों ने इतना सांप्रदायिक बनाया था कि हर समय लग रहा था कि सांप्रदायिक दंगा हो जायेगा। हमने रांची की तारा शहदेव का मामला भी देखा है जिसमें मीडिया ने देश के हर एक कोने में गृह युद्ध जैसी स्थिती पैदा कर दी थी। मगर बाद में उनका नतीजा क्या हुआ ? कैसे उन सारे आरोपों की परतें खुलती गईं इससे भी सभी वाकिफ है। देश का एक बड़ा वर्ग मीडिया के इस पक्षपातपूर्ण रवैय्ये से दुखी है।
मुरादाबाद के दो मासूमों ने एक मासूम को बचाने के लिये अपनी जान गंवा दी मगर मीडिया के लिये यह सनसनी नहीं है। यह घटना वह भी नहीं है जिससे हिंदू मुस्लिम के बीच के खाई को चौड़ा किया जा सके। यह घटना वह भी नहीं है जिसके द्वारा एक पार्टी विशेष के पक्ष में ध्रुवीकरण कराया जा सके। शायद इसीलिये इस पर खामोशी है। इसीलिये सिंगल कॉलम में जगह दी जा रही है, इसीलिये पैनल डिस्कशन नहीं हो रहा है। हां सोशल मीडिया जरूर इस खबर को प्रचारित कर रही है मगर उसमें भी सिर्फ वही वर्ग विशेष अधिक नजर आ रहा है जो समाज में एकता चाहता है। जबकि असल ‘लव जिहाद’ यही है, यह जिहाद है इंसानियत के लिये, गड्ढे में गिरी सुमन से नोमाम और दानिश का कोई रिश्ता नहीं था मगर उन्हें उससे Love जरूर था जिसके लिये उन्होंने जिहाद किया। यह अलग बात कि वे उसमें नाकाम रहे। किसी इंसान की जिंदगी बचाने के लिये किया गया जिहाद ही लव जिहाद है। इंसानियत को कायम करने के लिये किया गया जिहाद ही लव जिहाद है। समाज को एक साथ लाने के लिये इंसानों को इंसानियत का पाठ पढ़ाने के लिये किया जाने वाला जिहाद ही तो लव जिहाद है। मगर क्या कारण है कि मीडिया को इसमें लव जिहाद नहीं दिख रहा है ? तथाकथित रक्षकों के संगठनों को भी इसमें लव जिहाद नहीं दिख रहा है ? क्या कारण है कि मीडिया और लव जिहाद का शोर मचाने वाले लोग दोनों ही इस घटना पर मौन हैं ? इन कारणों को तलाशना गंगा जमुनी तहजीब के निर्माण के लिये बेहद जरूरी है। अगर खामोशी की वजह यह है कि सुमन और नोमान, दानिश का प्रेम प्रसंग नहीं था तो फिर समझ लीजिये कि गंगा जमुनी तहजीब और राष्ट्रीय एकता को सबसे बड़ा खतरा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से है। न कि किसी संगठन विशेष, या पार्टी विशेष के लोगों से।