आइए नेता जी, बहिन जी की ताजपोशी के लिए ताली बजाते हैं
आइए नेता जी, बहिन जी की ताजपोशी के लिए ताली बजाते हैं
अमलेन्दु उपाध्याय
उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव अब नजदीक ही हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की तरफ से ही चुनाव का रिहर्सल शुरू हो चुका है। आरोप प्रत्यारोप का नया दौर और एक दूसरे के घर फोड़ने का काम पूरे शवाब पर है। चुनाव की तैयारियां तेज हो गई हैं। लगता यही है कि चुनाव में मायावती का विरोध का मुद्दा तो होगा लेकिन इस मुद्दे पर किसी एक दल के पक्ष में जनता की गोलबंदी नहीं होगी। पिछले विधानसभा चुनाव से पहले मायावती ने मुलायम का गुण्डाराज खत्म करने के नाम पर वोट मांगा था। पर बसपा सरकार बनते ही जो गुण्डे मुलायम की साइकिल पर बैठे थे वो कूदकर मायावती के हाथी पर जा बैठे। एक साल पहले तक समाजवादी पार्टी मायावती सरकार के जुल्म के विरोध में आंदोलन की अगुवा बनी थी लेकिन अब उसके नेता इस गलतफहमी में जी रहे हैं कि मायावती के विरोध में जनता उन्हें वोट दे देगी। जबकि असलियत यह है कि जनता मायावती के विरोध में तो है लेकिन मुलायम शासनकाल में जो जुल्म और ज्यादतियां हुई थीं उन्हें वह भूली नहीं है।
मुलायम सिंह को मायावती से नाराज लोगों का समर्थन न मिल पाने का सबसे बड़ा कारण स्वयं उनकी जाति ही है। अगर जनता में मायावती के खिलाफ वैसा गुस्सा नहीं पनप रहा जैसा चार साल पहले मुलायम सिंह की सरकार के खिलाफ पनपा था तो उसका भी कारण साफ है। मुलायम सिंह के कार्यकाल में आम जनता में रोष का प्रमुख कारण उनकी जाति रही। पूरे प्रदेश में छांट-छांट कर यादव दरोगा तैनात किए गए जिन्होंने अपने जुल्मों से मुलायम सरकार की खूब किरकिरी कराई। मुलायम सरकार में सारे महत्वपूर्ण पदों पर अधिकारी यादव थे। इसलिए भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ जनता का गुस्सा एक जाति विशेष के खिलाफ गुस्से में तब्दील हो गया। यही कारण हैं कि प्रदेश में बढ़ते अपराध, भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के बावजूद जनता में मायावती के खिलाफ वैसा गुस्सा नहीं देखा जा रहा जो होना चाहिए था।
देखने में आया है कि पिछले कुछ समय में सपा के संघर्ष की धार भी कंुद हुई है। पिछले लगभग एक दशक में समाजवादी पार्टी के चरित्र में जो सबसे बड़ा अंतर आया, वह यह है कि अब वो पहले जैसे समाजवादी नहीं रहे और पिछले चार सालों में उसने जिस तरीके से सिर्फ मायावती सरकार के जुल्मों को ही मुद्दा बनाया है उससे भी जनता में यह संदेश गया कि यह मायावती और मुलायम सिंह की आपसी लड़ाई है। जबकि पिछले चार सालों में नोएडा से लेकर बलिया तक पूरे प्रदेश में सरकार किसानों की जमीन छीनकर पूंजीपतियों को देती रही और समाजवादी पार्टी ने एक भी बार इसे अपना मुद्दा नहीं बनाया। जबकि वह दावा किसानों की पार्टी होने का करती है। ऐसा बेतमलब नहीं हुआ। दरअसल जो बड़े पूंजीपति प्रदेश की लूट में लगे हुए हैं वे सब असली मित्र तो मुलायम सिंह के ही हैं। इसलिए समाजवादी पार्टी ने किसानों के मसले पर वैसी तत्परता नहीं दिखाई जैसी सपा कार्यकर्ताओं पर लगे फर्जी मुकदमों के मसले पर दिखाई। इसी तरह सरकार की बहुत सी नीतियां जनविरोधी रहीं लेकिन सपा उन नीतियों के खिलाफ कहीं भी सड़क पर दिखाई नहीं दी और जो मूलभूत अंतर उसके चरित्र में आया वो यह कि अब मुलायम सिंह के युवा वारिस भी स्वयं को युवराज समझ बैठे हैं।
आखिर इस चीज़ को समझना होगा कि गांधी खानदान में राहुल की यह दूसरी पीढ़ी है जिसका जनता, गरीब, मजदूर, किसान और आम आदमी के सरोकार से कोई लेना देना नहीं रहा। सब जानते हैं कि किसानों के मसले पर, दलितों के मसले पर मायावती सरकार के जुल्मों के मसले पर राहुल गांधी नौटंकी कर रहे हैं लेकिन लोगों को लग तो रहा है कि वह कुछ कर रहे हैं। पिछले एक साल में जब राहुल गांधी भट्टा पारसौल, टप्पल, निघासन और बाराबंकी की पगडंडियां नाप रहे थे तब समाजवादी युवराज दिल्ली और नौएडा में वातानुकूलित कमरों में बैठकर मायावती के घर फोड़ने में लगे थे। जबकि होना यह चाहिए था कि किसानों के मसले पर धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव के वारिस को मैदान में उतरकर लड़ाई की कमान राहुल गांधी से छीन लेते। लेकिन वह ऐसा नहीं कर सके।
ऐसे में मायावती से नाराज़ लोगों के सामने विकल्पहीनता की स्थिति भी है। समाजवादी पार्टी की साइकिल पर जिस तरीके से बसपा के हाथी से उतरकर गुण्डे सवार हो रहे हैं और हर जिले में मौजूद उसके यादव मैनेजर अपनी पुरानी रंगत में लौट रहे हैं उससे यह मतदाता सशंकित है। उधर राहुल गांधी भले ही मायावती का विकल्प बनने की कोशिश कर रहे हों लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि उनके पास प्रदेश में चुनाव लड़ने के लिए 403 गंभीर उम्मीदवार भी नहीं हैं।
ऐसे में कांग्रेस भी तीसरा विकल्प नहीं बन सकती और भाजपा भी उत्तर प्रदेश में लकवाग्रस्त है। जिस तरह कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह की लड़ाई ने भाजपा को गर्त में धकेल दिया उससे उसका उभर पाना अभी करीब दस साल तक संभव नहीं है। मध्य प्रदेश से आयात कर लाई गईं उमा भारती भी भाजपा को कोई संजीवनी नहीं दे सकतीं। पहली बात तो यह है कि उमा भारती का सारा आभा मंडल भाजपा खुद ही नष्ट कर चुकी हैं और पिछले कुछ वर्षों में अडवाणी से लेकर जेटली तक भाजपा नेतृत्व ने उमा भारती के साथ जो व्यवहार किया वह उत्तर प्रदेश की जनता की आंखों में धूल नहीं झोंक सकता। दूसरा भाजपा को भी लगता है कि रामलला में अब वोट दिलाने की ताकत नहीं रह गई इसलिए अभी उसके पास भी कोई ठोस मुद्दा नहीं है। ऐसे में लगता तो यही है कि मायावती से नाराज होकर मतदाता हर विधान सभा क्षेत्र में अलग रणनीति बनाएगा और जो बसपा को हरा सके उस प्रत्याशी को वोट देगा। यही परिणाम स्वरूप 2012 में उत्तर प्रदेश में फिर से ”हंग असेम्बली“ होगी और जो आज तक के हालात हैं उसमें लगता यही है कि मायावती भाजपा के सहयोग से फिर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनेंगी। हां अगर समय रहते समाजवादी पार्टी को अकल आ जाए और अभी भी उसका ध्यान बसपा का घर तोड़ने के बजाए अपना घर दुरूस्त करने और जनता के सवालों पर सड़क पर उतरने में लगाए तो पासा पलट भी सकता है लेकिन इसके लिए पार्टी को हर जिले में मौजूद अपने यादव मैनेजरों की लगाम कसनी होगी और असली समाजवादी सोच वाले कार्यकर्ताओं का सम्मान करना सीखना होगा। जिसके लिए अभी मुलायम सिंह यादव तैयार नहीं हैं। इसलिए आइए नेता जी अभी तो भाजपा की बैसाखी के सहारे ही सही बहन जी की ताजपोशी के लिए ताली बजाते हैं।


